बेरोजगारी की शर्म... ‘जेन जी’ के पास ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ है

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में विवेक सुरेंद्रन ने लिखा है कि एक देश, जो कभी छात्र क्रांतिकारियों को पैदा करता था, आज गुमनाम प्रोफाइल तस्वीरों और अनिद्रा से ग्रस्त मीम एडमिनिस्ट्रेटर्स पैदा कर रहा है. इंस्टाग्राम पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के फॉलोअर्स का आंकड़ा पहले ही करोड़ को पार कर चुका है. युवा भारतीय स्वेच्छा से खुद को कॉकरोच कह रहे हैं, और वह भी उसी उत्साह के साथ जो पिछली पीढ़ियाँ इंजीनियरिंग कॉलेजों, क्रिकेट या राष्ट्रवाद के लिए बचाकर रखती थीं.

इस पूरी बात में कुछ ऐसा है जो शर्मिंदगी महसूस कराता है. और वह शर्मिंदगी मायने रखती है.

विडंबना यह है कि इसकी शुरुआत देश के सबसे शक्तिशाली संस्थानों में से एक सुप्रीम कोर्ट से हुई. जब भारत के मुख्य न्यायाधीश से जुड़ी टिप्पणियां इंटरनेट पर प्रसारित होने लगीं, जिसमें हताश युवाओं की तुलना कॉकरोच से की गई थी, तो इंटरनेट ने असाधारण गति से प्रतिक्रिया दी. लाखों लोगों ने केवल अपमानित महसूस नहीं किया, बल्कि उन्हें लगा कि उनके अस्तित्व को पहचान मिल गई है.

यह भावनात्मक अंतर सीजेपी की घटना को किसी भी राजनीतिक विश्लेषण से बेहतर तरीके से समझाता है. एक कॉकरोच विपरीत और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रहता है. वह तिरस्कार के बीच ढलना सीख जाता है. वह अदृश्य रहना सीख लेता है. वह व्यवस्थाओं के करीब रहता है, लेकिन फिर भी उनके द्वारा अवांछित बना रहता है.  अस्थिर रोजगार, पारिवारिक दबाव, अकेलेपन, घटते ध्यान और स्थायी आर्थिक अनिश्चितता के बीच जीवित रहने की कोशिश कर रहे शिक्षित युवा भारतीयों के एक बड़े हिस्से के लिए, यह उपमा परेशान करने वाली सटीकता के साथ फिट बैठी.

सालों से, देश एक बहुत ही खास तरह के बच्चे तैयार कर रहा है: जिन्हें ज़रूरत से ज़्यादा कोचिंग दी जाती है और जिनका भावनात्मक प्रबंधन केवल उनके प्रदर्शन के आंकड़ों के आधार पर होता है. ऐसे बच्चे, जिनकी यादें बनने से पहले ही उनके शौक उनके रेज़्यूमे की सामग्री बन गए.  जिन्हें 11 साल की उम्र में कोडिंग कैंप, 13 साल में पब्लिक-स्पीकिंग वर्कशॉप, 15 साल में आईआईटी-जेईई कोचिंग और वयस्क होने से पहले ही लिंक्डइन इंटर्नशिप के लिए भेज दिया गया.

योग्यता के मिथक पर पली-बढ़ी यह पीढ़ी एक ऐसे श्रम बाजार में दाखिल हुई जो एक कभी न खत्म होने वाले एलिमिनेशन राउंड (बाहर होने के दौर) जैसा दिखता था. प्रवेश परीक्षाएं सार्वजनिक सजा की तरह भावनात्मक रूप से प्रताड़ित करने वाली बन गईं. भर्ती के इंटरव्यू ऐसे लगने लगे मानो चमचमाते दफ्तरों के भीतर किसी रियलिटी टेलीविजन शो के ऑडिशन चल रहे हों. डिग्रियों की ज़रूरतें बढ़ती गईं, लेकिन सैलरी पैकेज जस के तस रहे. युवा भारतीयों ने 'विकास' के बारे में धाराप्रवाह बोलना तो सीख लिया, लेकिन वे खुद से यह सवाल भी पूछने लगे कि क्या वयस्क होना ही आर्थिक रूप से असंभव हो गया है.

'कॉकरोच' वाली टिप्पणी ऐसे समय में आई जब वे यह सीख चुके थे कि व्यंग्य बहुत काम की चीज़ है. व्यंग्य गरिमा की रक्षा करता है क्योंकि यह बचने का एक रास्ता छोड़ देता है. यदि ईमानदारी या गंभीरता टूटती है, तो बोलने वाला हास्य के पीछे छिप सकता है. एक मीम आपको अपनी भावनात्मक बात से मुकरने की छूट देता है, जबकि उम्मीद ऐसा नहीं करने देती. यही वृत्ति अब भारतीय इंटरनेट संस्कृति के एक बड़े हिस्से के नीचे बैठी हुई है. कई युवा भारतीय अपनी राजनीतिक भावनाएं तो व्यक्त करते हैं, लेकिन राजनीति पर भरोसा नहीं करते. इसे अक्सर उनकी उदासीनता समझ लिया जाता है, लेकिन अगर आप करीब से देखें, तो यह उनकी अत्यधिक थकावट है.

उम्मीद के बाद की पीढ़ी

मिलेनियल्स (1981-1996 के बीच जन्मे लोग) को उस देश से उम्मीद की कुछ झलकियाँ विरासत में मिली थीं, जो अभी भी आर्थिक विकास को एक अनिवार्य सच्चाई के रूप में पेश कर रहा था. उन्होंने विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया, याचिकाओं पर हस्ताक्षर किए, संवैधानिक नैतिकता के बारे में फेसबुक पर लंबे पोस्ट लिखे, और उनका मानना था कि भागीदारी से विचार प्रक्रियाओं पर असर पड़ता है. लेकिन जल्द ही वे इस भ्रम से बाहर आ गए और उन्हें घोर निराशा हाथ लगी.

इसके बाद की पीढ़ी, जेन जी (Gen Z), सार्वजनिक रूप से आदर्शवाद को बिखरते हुए देखते हुए बड़ी हुई. उनकी राजनीतिक स्मृति वहीं से शुरू होती है जहां मिलेनियल्स की उम्मीदें खत्म हुई थीं. कोई भी घटना उस भावनात्मक बदलाव को 'आम आदमी पार्टी' के उदय और उसके बदलते रूप से अधिक स्पष्ट रूप से नहीं दर्शाती. आज के समय में यह समझाना मुश्किल है कि 2011 और 2013 के बीच भारतीय शहरों में शुरुआती 'आप' आंदोलन कैसा महसूस कराता था—चुनावी तौर पर नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक तौर पर. एक संक्षिप्त अवधि के लिए ऐसा लगा कि राजनीति से पुरानी सड़न की बू आना बंद हो गई है.

जिन युवा पेशेवरों ने राजनीति को दूषित मानकर उससे दूरी बना रखी थी, वे अचानक पूरी शिद्दत के साथ इसके लिए काम करने लगे. भ्रष्टाचार विरोधी नारों में एक सामूहिक शुद्धि की भावनात्मक ऊर्जा थी.  इस आंदोलन ने शिक्षित शहरी नागरिकों को यह अहसास कराकर भारतीय मध्यम वर्ग को गौरवान्वित किया कि वे ईमानदारी और नैतिक स्पष्टता के माध्यम से देश को सुधार सकते हैं.

लेकिन सत्ता के संपर्क में आते ही वह कल्पना टिक नहीं सकी. पुराने ढर्रे वापस आ गए, और एक पूरी शहरी पीढ़ी को राजनीतिक रूप से गहरा सदमा लगा. भारतीय मध्यम वर्ग, जो रोमांस के अलावा किसी और चीज़ के लिए खुलकर अपना दिल टूटने का दिखावा करने से मना करता है, उसने अपनी निराशा को कटाक्ष और करियर प्लानिंग की ओर मोड़ दिया. 'आप' के बाद कुछ ऐसा था जो अनसुलझा रह गया. भावनात्मक लेन-देन पूरा होने से पहले ही देश आगे बढ़ गया.

शर्म के बाद की राजनीति

समकालीन भारत के भावनात्मक ताने-बाने में, 'शर्म' राजनीति के केंद्र में आ गई है. बेरोजगारी की शर्म. तीस साल की उम्र में वापस माता-पिता के घर लौट आने की शर्म. स्कूल के दोस्तों से कम कमाने की शर्म. समय पर जीवन में 'सफल' न हो पाने की शर्म. 'कॉकरोच जनता पार्टी' की घटना इस मानहानि और अपमान को स्वाभाविक रूप से समझती है.  और यही कारण है कि यह जंगल की आग की तरह फैल गई.

पारंपरिक राजनीतिक संदेश आज भी यह मानकर चलते हैं कि नागरिकों को प्रेरणा चाहिए. जबकि युवा भारतीयों का एक बड़ा हिस्सा चाहता है कि उनकी थकावट और महत्वाकांक्षी भारतीय जीवन के नीचे दबी भावनात्मक हिंसा को स्वीकार किया जाए और पहचाना जाए. अधिकांश राजनीतिक दल इंटरनेट संस्कृति को समझने में भूल करते हैं क्योंकि वे मीम्स को भावनात्मक संकेतों के बजाय केवल मार्केटिंग टूल के रूप में देखते हैं. इंटरनेट का असली हास्य सामूहिक असहजता से ही पैदा होता है.

राजनीतिक संस्कृति के भीतर से गंभीरता का खत्म होना इसलिए मायने रखता है क्योंकि यह संस्थानों में घटते भावनात्मक विश्वास का संकेत है. नेपाल में हालिया राजनीतिक उथल-पुथल युवा आबादी के बीच सालों की संस्थागत थकान के बाद ही सामने आई थी. चुनावी व्यवधान से बहुत पहले ही जनता में निराशा और अविश्वास आ चुका था. संस्थान शायद ही कभी उस पल को पहचान पाते हैं जब लोग भावनात्मक रूप से उनका सम्मान करना बंद कर देते हैं.

बिखराव से पहले का मज़ाक

हो सकता है कि 'कॉकरोच जनता पार्टी' कुछ ही महीनों में गायब हो जाए. इंटरनेट के आंदोलन अक्सर बड़ी तेजी से सुलगते हैं और बिना किसी बड़े परिणाम के खत्म हो जाते हैं. लेकिन इसे पूरी तरह से खारिज कर देना मूर्खता होगी, क्योंकि इस बेतुकेपन में कुछ ऐसा है जो ऐतिहासिक रूप से वास्तविक महसूस होता है.

सत्ता प्रतिष्ठान शायद पूरी तरह से यह भांप न पाए कि सतह के नीचे क्या आकार ले रहा है, क्योंकि शुरुआत में यह बेहद गैर-गंभीर दिखाई देगा. राजनीतिक मिजाज अक्सर कॉमेडी का रूप धरकर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करता है, क्योंकि कॉमेडी समाज की रक्षात्मक दीवारों को कमजोर कर देती है. लोग यह महसूस करने से पहले ही हंस देते हैं कि वे वास्तव में अपने भीतर के किसी सच को कबूल कर रहे हैं.

एक देश, जो कभी आदर्शवादियों को पैदा करता था, आज थके हुए और हताश युवाओं को पैदा कर रहा है, जो ऑनलाइन खुद को कॉकरोच कह रहे हैं.

यह सुनने में बेहद हास्यास्पद लगता है.

तब तक, जब तक कि अचानक यह गंभीर नहीं हो जाता.

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