जी. एन. देवी के अनुसार, भाषा विज्ञान में 'नियोलॉजिम' (नूतन-शब्द) का अर्थ पूरी तरह से किसी नए शब्द की रचना है. इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण महात्मा गांधी द्वारा 1906 में 'सत्य' और 'आग्रह' को मिलाकर गढ़ा गया शब्द 'सत्याग्रह' है, जिसने एक नैतिक-राजनीतिक और अहिंसक कार्रवाई को जन्म दिया. इसी प्रकार, जूलियस सीज़र द्वारा 49 ईसा पूर्व में इस्तेमाल किया गया "बेलम सिविल" (गृहयुद्ध) भी इतिहास का एक प्रसिद्ध शब्द है. हालांकि, व्याकरण की दृष्टि से 'बेलम' कोई नया शब्द नहीं था, बल्कि यह एक 'एंटीफ्रेसीस' (व्यंग्योक्ति) था—यानी शाब्दिक अर्थ (सुंदर या मनमोहक) के बिल्कुल विपरीत युद्ध की भीषण हिंसा को दर्शाने वाला एक तीखा विरोधाभास.
इतिहास गवाह है कि सभी विरोध प्रदर्शन न तो क्रांतियों में बदलते हैं और न ही गृहयुद्धों में. 1789 की फ्रांसीसी क्रांति की शुरुआत एक साधारण प्रदर्शन से हुई थी, जो दमन के बाद क्रांति में बदल गया. इसी तरह 1917 का सेंट पीटर्सबर्ग का आंदोलन भी ज़ार के दमन के बाद समाजवादी क्रांति बना. इतिहास में 1642 का इंग्लैंड का संघर्ष, 1860 के दशक का अमेरिकी गृहयुद्ध और 1930 के दशक का स्पेनिश संघर्ष इसके प्रमुख उदाहरण हैं, जिन्हें 'एंटीबेलम' कहा गया है. इसके विपरीत, दक्षिण अफ्रीका का रंगभेद-विरोधी संघर्ष और अमेरिका का नागरिक अधिकार आंदोलन सत्याग्रह से प्रेरित थे. सत्याग्रह आत्म-नियंत्रित होता है और इसका उद्देश्य सुलह व नैतिक रूपांतरण है, जबकि सामान्य विरोध प्रदर्शन जिद और आक्रामकता से भरे होते हैं.
आधुनिक समय में, दुनिया ने सोमालिया, रवांडा, यमन, और श्रीलंका जैसे देशों में गृहयुद्ध और आपसी संघर्ष देखे हैं. वहीं 2011 का 'अरब स्प्रिंग' (अरब वसंत) या अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद उपजा जन-आक्रोश न तो गृहयुद्ध था और न ही क्रांति, बल्कि यह एक प्रकार की व्यंग्योक्ति (एंटीफ्रेसीस) थी.
देवी कहते हैं कि भारत की ओर रुख करते हुए और सत्याग्रह की संभावना पर विचार करते हुए, संविधान के मसौदे को स्वीकार किए जाने से ठीक एक दिन पहले दिए गए बी.आर. अंबेडकर के 'तीन चेतावनियों वाले भाषण' को याद करना आवश्यक है. उन तीन चेतावनियों में से एक यह थी कि ब्रिटिश शासन के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले विरोध के तरीके संवैधानिक लोकतंत्र के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं. उन्होंने कहा था, "यदि हम लोकतंत्र को केवल रूप में ही नहीं, बल्कि वास्तव में भी बनाए रखना चाहते हैं, तो हमें क्या करना होगा? मेरी राय में सबसे पहली चीज़ जो हमें करनी चाहिए, वह है अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों से मजबूती से जुड़े रहना. इसका मतलब है कि हमें क्रांति के खूनी तरीकों को त्याग देना होगा. इसका मतलब है कि हमें सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह के तरीकों को छोड़ देना चाहिए. जब आर्थिक और सामाजिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों का कोई रास्ता नहीं बचा था, तब असंवैधानिक तरीकों के पक्ष में बहुत कुछ कहा जा सकता था. लेकिन जहाँ संवैधानिक तरीके खुले हैं, वहाँ इन असंवैधानिक तरीकों के लिए कोई औचित्य नहीं हो सकता. ये तरीके अराजकता के व्याकरण (ग्रामर ऑफ एनार्की) के सिवा और कुछ नहीं हैं और इन्हें जितनी जल्दी छोड़ दिया जाए, हमारे लिए उतना ही अच्छा है." वाक्यांश "अराजकता का व्याकरण" का इस्तेमाल बार-बार भारतीय जनता पार्टी द्वारा युवाओं और विपक्ष के आंदोलन को बदनाम करने के लिए किया गया है. हालांकि, वे यह भूल जाते हैं कि अंबेडकर ने जे.एस. मिल को उद्धृत करते हुए यह भी पूछा था, "...लोकतंत्र को बनाए रखने में रुचि रखने वाले सभी लोग" अपने स्वतंत्रता को "किसी महान व्यक्ति के चरणों में भी न रखें, और न ही उसे ऐसी शक्ति सौंपें जो उसे उनकी संस्थाओं को नष्ट करने में सक्षम बनाए... भारत के मामले में यह सावधानी किसी भी अन्य देश की तुलना में कहीं अधिक आवश्यक है. राजनीति में, भक्ति या व्यक्ति-पूजा पतन और अंततः तानाशाही का एक निश्चित मार्ग है."
आज के भारत में जिस प्रकार के राजनीतिक और सामाजिक घटनाक्रम देखने को मिल रहे हैं—जिनमें देश भर में व्याप्त गहरा असंतोष, विभिन्न महानगरों और नगरों में रोज़मर्रा के प्रदर्शन, कई राज्यों में उठ रहे सरकार विरोधी स्वर, बड़े पैमाने पर नागरिकों के मताधिकार छीने जाने को लेकर सुलगता हुआ गुस्सा, जंग खा चुकी परीक्षा और लचर शिक्षा प्रणाली के खिलाफ युवाओं का रोष, संवैधानिक और स्वायत्त निकायों के शीर्ष पर बैठे लोगों द्वारा खुलेआम की जा रही मनमानी और अवैध गतिविधियां, विपक्षी आवाज़ों का सुनियोजित गला घोंटना, प्रदर्शन स्थलों की अचानक अधिसूचनाएं रद्द करना और सबसे बढ़कर, ग्रामीण आजीविका व बस्तियों का लगातार होता हुआ गहरा पतन शामिल है—वे स्पष्ट रूप से इस बात की ओर इशारा करते हैं कि आज देश में चल रही इस पूरी ज़मीनी स्थिति को बयां करने के लिए एक सटीक ऐतिहासिक, राजनीतिक और समाजशास्त्रीय नाम की आवश्यकता है.
इस दौर में पहले से चले आ रहे पारंपरिक लेबल—चाहे वह गृहयुद्ध हो, क्रांति हो, विरोध प्रदर्शन हो या सत्याग्रह—अब मौजूदा परिस्थितियों के सामने काफी पुराने और अपर्याप्त प्रतीत होते हैं. इस संदर्भ में, यदि हम गहराई से विचार करें तो राहुल गांधी द्वारा गढ़ा गया शब्द "अभिव्यक्ति" (इक्स्प्रेशन) एक अत्यंत सार्थक और उपयुक्त विकल्प प्रतीत होता है. आज भारत की जनता ने संविधान को उसके मूल स्वरूप से भटकाए जाने और उसके दुरुपयोग से बचाने के लिए सामूहिक रूप से और एक प्रकार से अचेतन रूप से इसी 'अभिव्यक्ति' का सहारा लिया है.
यह 'अभिव्यक्ति' कोई शास्त्रीय नियोलॉजिम (नूतन-शब्द) नहीं है, बल्कि यह एक सधी हुई 'एंटीफ्रेसीस' (व्यंग्योक्ति) है, जो देश के भीतर आवाज़ों के अत्यधिक दमन, नागरिकों पर रखी जा रही डिजिटल व भौतिक निगरानी और राजनीतिक डराने-धमकाने के खौफनाक माहौल की विडंबना को उजागर करती है. निश्चित रूप से, अंबेडकर और गांधी दोनों को इस तरीके और इसके नाम दोनों से खुशी हुई होगी.
(जी. एन. देवी एक लेखक और सांस्कृतिक आलोचक हैं. अंग्रेजी में उनके मूल लेख को हिंदी में अनूदित और संपादित कर यहां पेश किया गया है.)

