गोदी मीडिया का पतन: स्वतंत्र पत्रकारिता कैसे सरकार के नैरेटिव को चुनौती दे रही है

‘काउंटरकरंट्स’ में मोहम्मद जियाउल्लाह खान लिखते हैं कि भाजपा सरकार के ‘अच्छे दिन’ का वादा पूरा नहीं हुआ है, लेकिन एक बदलाव उम्मीद जगाता है. अब अधिक भारतीय पारंपरिक टेलीविजन स्टूडियो से बाहर खबरें तलाश रहे हैं. वर्षों तक प्राइम टाइम में भारत को विश्वगुरु बनने की ओर बढ़ता देश और उसके नेतृत्व को अजेय बताया गया. रोजगार, शिक्षा, महंगाई और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों के बजाय हिंदू-मुस्लिम संबंधों, राष्ट्रवाद और पाकिस्तान पर बहस को अधिक जगह मिली.

इसी पत्रकारिता शैली के कारण कई समाचार संस्थानों को आलोचकों ने ‘गोदी मीडिया’ कहना शुरू किया. इसका अर्थ यह नहीं कि हर टेलीविजन पत्रकार समझौता कर चुका है या सरकार के पक्ष में हर खबर प्रचार है. असली सवाल यह है कि क्या मीडिया सत्ता में बैठे लोगों की भी उतनी ही कठोरता से जांच करता है, जितनी विपक्ष की. लोकतंत्र में पत्रकारों की भूमिका सरकार का समर्थन करना नहीं, बल्कि उसके कामकाज पर स्वतंत्र निगरानी रखना है.

डिजिटल मीडिया की बढ़ती भूमिका

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की डिजिटल न्यूज रिपोर्ट 2026 के अनुसार, भारत के सर्वेक्षण में शामिल 44 प्रतिशत लोगों ने खबरों के लिए टेलीविजन का इस्तेमाल किया. संस्थान की 2025 की रिपोर्ट में 55 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने यूट्यूब से खबरें देखने और 43 प्रतिशत ने समाचारों पर भरोसा करने की बात कही थी.

हालांकि, ये आंकड़े मुख्य रूप से अंग्रेजी बोलने वाले ऑनलाइन समाचार उपभोक्ताओं पर आधारित हैं और पूरे भारत की आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं करते. फिर भी, वे डिजिटल माध्यमों की बढ़ती भूमिका दिखाते हैं. स्वतंत्र पत्रकार सरकारी आदेशों का विश्लेषण कर सकते हैं, आर्थिक आंकड़े समझा सकते हैं और उन घटनाओं की पड़ताल कर सकते हैं जिन्हें प्राइम टाइम में पर्याप्त जगह नहीं मिलती.

दर्शक वीडियो रोक सकते हैं, दोबारा देख सकते हैं और अलग-अलग स्रोतों से जानकारी की तुलना कर सकते हैं. इससे खबरों के चयन पर कुछ टेलीविजन स्टूडियो का एकाधिकार कमजोर होता है. हालांकि, हर डिजिटल पत्रकार इस अवसर का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करे, यह जरूरी नहीं है.

टेलीविजन कारोबार और विश्वसनीयता का संकट

जी एंटरटेनमेंट के जून 2026 में समाप्त तिमाही के नतीजों पर रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी का शुद्ध लाभ सालाना आधार पर 46.9 प्रतिशत घटकर 76.3 करोड़ रुपये रह गया और विज्ञापन राजस्व में 11.5 प्रतिशत की गिरावट आई. वित्त वर्ष 2025-26 में जारी परिचालन से उसका समेकित कर-पश्चात लाभ भी लगभग 60.5 प्रतिशत घटा.

हालांकि, इन आंकड़ों से यह साबित नहीं होता कि दर्शकों ने विशेष रूप से उसके समाचार चैनलों को देखना छोड़ दिया. कंपनी का कारोबार मनोरंजन और प्रसारण के दूसरे क्षेत्रों में भी फैला है. एनडीटीवी, आज तक और नेटवर्क18 के वित्तीय प्रदर्शन को भी उनके अलग-अलग कारोबारी ढांचे के संदर्भ में समझना चाहिए.

फिर भी, मीडिया संस्थानों के सामने सवाल है कि क्या बड़े स्टूडियो और चर्चित एंकर दर्शकों का भरोसा बनाए रखने के लिए पर्याप्त हैं. डिजिटल पत्रकार कम संसाधनों में भी किसी मुद्दे की पड़ताल और व्याख्या कर सकते हैं. समाचार संस्थानों के लिए विश्वसनीयता अब महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्धी पूंजी बन गई है.

राष्ट्रवाद और पत्रकारिता के बीच अंतर

सरकार की आलोचना को देश की आलोचना बताना एक गंभीर समस्या है. भारत भाजपा नहीं है, सरकार संविधान नहीं है और प्रधानमंत्री स्वयं देश नहीं हैं. रोजगार के आंकड़ों, चुनावी प्रक्रियाओं, सांप्रदायिक हिंसा या प्रदर्शनकारियों के साथ व्यवहार पर सवाल उठाना अपने आप राष्ट्रविरोधी गतिविधि नहीं बन जाता.

डिजिटल मीडिया पर भी गलत सूचनाओं का खतरा मौजूद है. रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की 2025 की रिपोर्ट में 53 प्रतिशत भारतीय उत्तरदाताओं ने व्हाट्सऐप को गलत या भ्रामक सूचनाओं के बड़े खतरे वाले माध्यम के रूप में पहचाना. लेकिन गलत सूचना का खतरा टेलीविजन को जांच से छूट नहीं देता. महंगे स्टूडियो में प्रसारित दावा भी बिना सबूत के विश्वसनीय नहीं हो जाता.

स्वतंत्र मीडिया की जिम्मेदारी

रवीश कुमार, अभिसार शर्मा और ध्रुव राठी जैसे पत्रकारों तथा ‘द वायर’, ‘स्क्रोल’, ‘न्यूजलॉन्ड्री’ और ‘द क्विंट’ जैसे मंचों ने दर्शकों के सामने वैकल्पिक समाचार और विश्लेषण उपलब्ध कराए हैं. इनकी संपादकीय दृष्टि और कार्यशैली अलग-अलग है. इनके दावों की भी तथ्य-जांच जरूरी है.

स्वतंत्र पत्रकारिता की ताकत सरकारी नीतियों की पड़ताल करने, सार्वजनिक दस्तावेज सामने लाने और उन लोगों की आवाज उठाने में है जिन्हें मुख्यधारा के विमर्श में जगह नहीं मिलती. इसके लिए पारदर्शी स्रोत, तथ्य-जांच, गलतियों में सुधार और आलोचना स्वीकार करने की क्षमता आवश्यक है.

स्वतंत्र मीडिया का उद्देश्य एक निर्विवाद सत्ता की जगह दूसरी निर्विवाद सत्ता स्थापित करना नहीं है. उसकी असली भूमिका नागरिकों को जानकारी के अधिक स्रोत देना और सत्ता से सवाल पूछने के अवसर बढ़ाना है. अच्छी पत्रकारिता की कसौटी सरकार का समर्थन या विरोध नहीं, बल्कि यह है कि वह लोगों को घटनाओं और उनके महत्व को समझने में कितनी मदद करती है.

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