समान नागरिक संहिता : सहमति बनाम फ़रमान

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का प्रस्ताव रखने वाले प्रारूप अनुच्छेद पर 23 नवंबर, 1948 को बहस हुई थी, और यह संविधान सभा में सबसे तीखी बहसों में से एक साबित हुई. के.एम. मुंशी और अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर ने इस प्रावधान का बचाव करते हुए इसे राष्ट्रीय एकीकरण और लैंगिक न्याय के लिए आवश्यक बताया. बी.आर. अंबेडकर ने सिद्धांत का समर्थन करने के साथ ही इसके व्यावहारिक अनुप्रयोग को लेकर उल्लेखनीय सावधानी बरती. मुहम्मद इस्माइल साहिब, नज़ीरुद्दीन अहमद और बी. पोकर साहिब बहादुर जैसे सदस्यों ने इसका कड़ा विरोध किया. उनका तर्क था कि कई समुदायों के लिए पर्सनल लॉ धार्मिक आचरण से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है और किसी भी संहिता को सहमति के बिना समुदायों पर नहीं थोपा जाना चाहिए. इसके बाद जो समझौता निकलकर आया, वह संरचनात्मक था: यूसीसी को भाग III में एक वाद-योग्य (न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय) मौलिक अधिकार के रूप में नहीं, बल्कि भाग IV में राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत रखा गया.

गुलाम यज़दानी और शशांक शेखर के अनुसार, भारत में पर्सनल लॉ की विविधता कभी भी केवल धर्म के आधार पर तय नहीं हुई है. मातृसत्तात्मक उत्तराधिकार व्यवस्था आज भी केरल और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में पारिवारिक कानून को आकार देती है; नागा प्रथागत कानून को अनुच्छेद 371A द्वारा संरक्षण प्राप्त है; पूर्वोत्तर के ईसाई समुदायों और मध्य भारत के आदिवासी समूहों के अपने उत्तराधिकार और विवाह के नियम हैं, जिनमें से कई को पांचवीं और छठी अनुसूची द्वारा सुरक्षा प्राप्त है. मुख्य रूप से समुदायों के एक विशेष समूह के लिए बने खाके से तैयार की गई एक एकल राष्ट्रीय संहिता इन समूहों के साथ वही करने का जोखिम उठाती है, जिसका आरोप सुधारक मौजूदा पर्सनल लॉ पर उनके भीतर की महिलाओं के साथ करने का लगाते हैं - यानी बिना सहमति के एकरूपता थोपना.

उत्तराखंड के यूसीसी ने अनुसूचित जनजातियों को अपने दायरे से बाहर रखा, जिसका सीधा अर्थ है कि एक तथाकथित 'समान' संहिता पूरे भारत के सामाजिक परिदृश्य पर एक समान लागू नहीं हो सकती. इस छूट के तर्क को 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू करके देखें, तो ईमानदार निष्कर्ष यही निकलता है कि एकरूपता यदि आती भी है, तो इसे केवल घोषित करने के बजाय धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से जोड़कर बनाना होगा.

संघवाद भारत को ठीक इसी समस्या से निपटने के लिए एक अनुकूल तंत्र प्रदान करता है. समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 राज्यों को विवाह, तलाक, गोद लेने और उत्तराधिकार पर कानून बनाने की अनुमति देती है, और इसी रास्ते पर उत्तराखंड तथा गुजरात आगे बढ़े हैं. राज्य-दर-राज्य दृष्टिकोण प्रत्येक विधायिका को उन समुदायों के साथ अपने समझौते पर बातचीत करने की अनुमति देता है जिन पर वह वास्तव में शासन करती है, वास्तविक मुकदमों और सामाजिक प्रतिक्रियाओं के आधार पर कानून का परीक्षण करने देती है, और सफल मॉडलों को हुक्मनामे के बजाय अनुकरण के माध्यम से फैलने का अवसर देती है.

यह काफी हद तक उसी दिशा की ओर इशारा करता है जिसकी ओर स्वयं अंबेडकर ने संकेत दिया था, जब उन्होंने एक ऐसी संहिता की संभावना उठाई थी जो बाध्यता के बजाय सहमति से काम करे. जो राज्य अपने यूसीसी में गलती करता है, उसे उसके अपने मतदाताओं और उसके अपने उच्च न्यायालय द्वारा सुधारा जा सकता है. लेकिन धार्मिक और प्रथागत विविधताओं से भरे इस उपमहाद्वीप में एक ही विधायी झटके में थोपी गई राष्ट्रीय संहिता को संतुलित करना बेहद कठिन है.  और यदि यह 1985 के शाह बानो विवाद के बाद उभरे आक्रोश जैसी प्रतिक्रिया को जन्म देती है, तो इसे वापस लेना और भी भारी पड़ सकता है — यह इस बात की याद दिलाता है कि कितनी जल्दी पर्सनल लॉ सुधार लैंगिक-न्याय की लड़ाई के बजाय बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक के मुकाबले में बदल सकता है.

केंद्रीय गृह मंत्री ने खुद अलग-अलग मौकों पर कहा है कि उत्तराखंड मॉडल की सामाजिक और कानूनी समीक्षा होनी चाहिए, और किसी भी राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने से पहले बहस जरूरी है. इस मंशा को एक अनिवार्य केंद्रीय कानून से पहले का महज़ औपचारिक ठहराव मानने के बजाय इसके वास्तविक अर्थ में लिया जाना चाहिए. वास्तविक परामर्श का अर्थ यह है कि 22वें और 23वें विधि आयोगों की परामर्श प्रक्रियाओं को अलग-अलग राज्य स्तरीय मसौदों को आकार देना चाहिए.

राज्य-दर-राज्य निर्मित, उत्तराखंड और गुजरात के वास्तविक अनुभवों के आधार पर परखी गई, मुकदमों के माध्यम से परिष्कृत, और केवल वहीं लागू की गई जहाँ विधायिकाओं और समुदायों को दरकिनार करने के बजाय सहमत किया गया हो — ऐसी समान नागरिक संहिता अनुच्छेद 44 की आकांक्षा और उस सावधानी दोनों का सम्मान करेगी जिसने इसे अदालतों के सीधे हस्तक्षेप से बाहर रखा था.

(लेखक गुलाम यज़दानी जामिया मिलिया इस्लामिया के विधि संकाय के डीन हैं. शशांक शेखर लॉयड लॉ कॉलेज में सहायक प्राध्यापक हैं.)

Previous
Previous

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में ट्रम्प की करारी शिकस्त: डेमोक्रैट्स ने अमेरिकी कांग्रेस पर जमाया कब्जा

Next
Next

एक इंजीनियर की आत्महत्या, 2 करोड़ रुपये की रिश्वत: केरल करेगा ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जाँच