भारत की राजनीति में जवाबदेही को लेकर एक नई बहस तेज होती दिख रही है. सवाल सिर्फ सरकार के फैसलों का नहीं है, बल्कि उस पूरे लोकतांत्रिक ढांचे का है, जिसमें नागरिक, संस्थाएं और सत्ता तीनों के बीच संतुलन बनता है.
हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग विस्तार से चर्चा कर रहे हैं हाल के दिनों में संसद में प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति, विपक्ष के आरोप, जांच एजेंसियों की भूमिका, भारत की विदेश नीति, ट्रेड पॉलिसी एवं इकोनमिक पॉलिसी के बारे में.
उन्होंने ने इस चर्चा में बताया कि कैसे अमेरिका में नीतिगत फैसलों पर सवाल उठने लगे हैं. यहां तक कि शीर्ष पदों से इस्तीफे भी हुए हैं. इसी संदर्भ में सवाल उठता है कि क्या भारत में भी विदेश नीति, खासकर ईरान और इज़राइल के बीच संतुलन को लेकर, सरकार से जवाबदेही तय की जानी चाहिए?
इस बातचीत में यह भी समझने की कोशिश की गई है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते वर्षों के शासन में क्या लोकतांत्रिक संस्थाएं जैसे संसद, न्यायपालिका और सरकारी संस्थाएं अपनी भूमिका निभा पा रही हैं या नहीं. साथ ही, संसद और राजनीतिक संवाद के गिरते स्तर, भारत में आपातकाल जैसी स्थिति की आशंका, और पश्चिम बंगाल को एक “राजनीतिक प्रयोगशाला” के रूप में देखे जाने जैसे सवाल भी इस चर्चा के केंद्र में रहे.
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