26 जनवरी को उत्तराखंड के कोटद्वार में एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरे देश में बहस छेड़ दी. एक 71 वर्षीय मुस्लिम दुकानदार की दुकान का नाम बदलवाने पहुँची भीड़ के सामने एक युवक खड़ा हो गया. जब उससे उसका नाम पूछा गया, तो उसने जवाब दिया, “मोहम्मद दीपक.” इस एक वाक्य ने न केवल उस भीड़ को चुनौती दी, बल्कि उस माहौल को भी जिसमें पहचानें धर्म और राजनीति के आधार पर तय की जा रही हैं.
इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ हम विस्तार से चर्चा करते हैं कि यह सिर्फ एक व्यक्ति का साहस नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक संकेत की तरह क्यों देखा जाना चाहिए. दीपक के जिम की सदस्य संख्या 150 से घटकर 15 रह गई, उन्हें धमकियाँ मिलीं, ₹10 लाख की सुपारी तक की घोषणा हुई, लेकिन इसके बावजूद कुछ लोग उसके साथ खड़े रहे. क्या यह संकेत है कि समाज पूरी तरह से ध्रुवीकृत नहीं हुआ है?
हम मथुरा के उस मामले पर भी बात करते हैं जहाँ एक मुस्लिम प्रधानाचार्य के समर्थन में 200 से अधिक हिंदू अभिभावक सड़कों पर उतरे, और महाराष्ट्र के एक गांव के “कास्ट-फ्री” घोषित होने की घटना पर भी चर्चा करते हैं. क्या एक “सिंगल एक्ट ऑफ ब्रेवरी” समाज में सकारात्मक गुणा प्रभाव पैदा कर सकता है? क्या सत्ता चाहे तो नफरत की राजनीति रुक सकती है?
यह चर्चा किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस सवाल की है जो हम सबके सामने खड़ा है, क्या हम पहले हिंदू या मुसलमान हैं, या पहले इंसान?
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