मुस्लिम मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ता दबाव: इस्तखार अली की यात्रा ने क्या दिखाया? इस्तिखार अली #harkara

हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने जेएनयू से जुड़े शोधकर्ता और मुस्लिम मानसिक स्वास्थ्य पर काम कर रहे इस्तिखार अली से बातचीत की. चर्चा का केंद्र था उनका हालिया लेख और वह मोटरसाइकिल यात्रा, जिसके दौरान उन्होंने दिल्ली से केरल तक जाकर विभिन्न राज्यों, विश्वविद्यालयों, सामाजिक संगठनों और आम लोगों से बातचीत की. इस्तिखार अली का कहना है कि भारत में मुसलमानों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर चर्चा तो होती रही है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य के सवाल को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. उनके अनुसार लगातार बढ़ती असुरक्षा, सोशल मीडिया पर नफरत, सार्वजनिक जीवन में भेदभाव और पहचान को लेकर पैदा हुआ दबाव कई लोगों के भीतर गहरा मानसिक तनाव पैदा कर रहा है. करीब 4200 किलोमीटर की अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने पाया कि बहुत से लोग अपनी पहचान को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतते हैं. कई लोग सार्वजनिक जगहों पर अपना नाम, धार्मिक पहचान या विचार खुलकर व्यक्त करने से बचते हैं. उनके मुताबिक यह केवल आर्थिक या राजनीतिक सवाल नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा का भी प्रश्न है. इस्तिखार अली ने बताया कि युवाओं, महिलाओं और बच्चों में यह चिंता अधिक दिखाई दी. कई परिवारों में बच्चों की पढ़ाई, नौकरी और सार्वजनिक जीवन में सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त भय महसूस किया जा रहा है. उनका कहना था कि यह तनाव केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे कई गैर-मुस्लिम लोग भी हैं जो अपने दोस्तों और परिचितों के साथ होने वाले भेदभाव से परेशान हैं. बातचीत में उत्तर और दक्षिण भारत के अनुभवों का भी जिक्र आया. इस्तिखार के अनुसार दक्षिण भारत में उन्हें अपेक्षाकृत अधिक आत्मविश्वास और सामाजिक खुलापन दिखाई दिया, जबकि उत्तर भारत के कई इलाकों में पहचान को लेकर अधिक संकोच और असुरक्षा महसूस हुई. उन्होंने कहा कि समाज में बढ़ती दूरी और अलगाव का असर बच्चों और युवाओं पर पड़ रहा है. जब अलग-अलग समुदायों के बीच संपर्क और संवाद कम होता है, तब पूर्वाग्रह और अविश्वास को बढ़ाना आसान हो जाता है. इस्तिखार अली का निष्कर्ष था कि मानसिक स्वास्थ्य का सवाल केवल इलाज या चिकित्सा का नहीं है. यह सामाजिक माहौल, सम्मान, बराबरी और सुरक्षा की भावना से भी गहराई से जुड़ा हुआ है. उनके अनुसार इन अनुभवों और संकेतों को समझे बिना समाज के भीतर पैदा हो रहे मानसिक दबावों को ठीक से नहीं समझा जा सकता.

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