सुलेमान पठान की मॉब लिंचिंग के एक साल बाद भी मुकदमा शुरू नहीं, 10 में से 7 आरोपी जमानत पर

महाराष्ट्र के जलगांव जिले में 20 वर्षीय सुलेमान पठान की मॉब लिंचिंग के एक साल बाद भी मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हुई है. मामले में 10 गिरफ्तार आरोपियों में से सात को जमानत मिल चुकी है, जबकि एक आरोपी अब भी फरार है. ‘आर्टिकल 14’ में कुनाल पुरोहित की रिपोर्ट के मुताबिक, न्याय मिलने में हो रही देरी और आरोपियों से कथित धमकियों के कारण सुलेमान का परिवार निराशा और असुरक्षा के बीच जी रहा है.

11 अगस्त 2025 को जामनेर कस्बे में सुलेमान को उस कैफे से बाहर खींच लिया गया, जहां वह एक हिंदू लड़की के साथ बैठा था. इसके बाद लोहे की छड़ों और लकड़ी के डंडों से लैस भीड़ ने उसे पीटा. हमलावर उसे एक वैन में अलग-अलग जगहों पर ले गए और रास्ते में कई बार उसकी पिटाई की. हमले के दौरान उसके परिवार ने उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन उन पर भी हमला किया गया. करीब पांच घंटे तक चली हिंसा के बाद उसी शाम सुलेमान की मौत हो गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसके शरीर पर 62 चोटों के निशान दर्ज किए गए.

सुलेमान पुलिस में भर्ती होने की तैयारी कर रहा था और अपने गांव बेतावड़ खुर्द में गणपति उत्सव आयोजित करने वाली समिति का प्रमुख था. गांव में करीब 600 हिंदू परिवारों के बीच केवल चार मुस्लिम परिवार रहते थे. रिपोर्ट के अनुसार, हमलावरों में सुलेमान के कुछ करीबी बचपन के दोस्त भी शामिल थे.

पुलिस ने आरोपपत्र में 11 लोगों को आरोपी बनाया, जबकि परिवार का दावा है कि उसने हमले में कम से कम 17 लोगों की पहचान की थी. चार आरोपियों को नवंबर 2025 में निर्धारित 90 दिनों के भीतर आरोपपत्र दाखिल नहीं होने के कारण डिफॉल्ट जमानत मिली. मई और अगस्त 2026 में बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने दो अन्य आरोपियों को भी जमानत दी. जलगांव की अदालत में 48 सुनवाइयां हो चुकी हैं, लेकिन आरोप तय नहीं हुए और मुकदमे को फास्ट-ट्रैक अदालत में भी नहीं भेजा गया.

परिवार का आरोप है कि आरोपियों की रिहाई से गवाहों पर दबाव पड़ने का खतरा है. जनवरी 2026 में रहीम खान ने दो जमानत पर बाहर आए आरोपियों पर धमकी देने का आरोप लगाया. पुलिस ने उनकी शिकायत पर एफआईआर दर्ज करने के बजाय गैर-संज्ञेय रिपोर्ट दर्ज की. परिवार ने महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून के तहत कार्रवाई की मांग भी की, लेकिन पुलिस सहमत नहीं हुई. इस संबंध में बॉम्बे हाईकोर्ट में दायर याचिका पर कई सुनवाइयों के बावजूद फैसला नहीं आया.

सुलेमान के पिता रहीम खान और उनकी पत्नी दिसंबर 2025 में अपना 150 साल पुराना पुश्तैनी घर छोड़कर पड़ोसी बुलढाणा जिले में किराये के मकान में रहने लगे. परिवार अब तक कानूनी खर्चों पर 50 हजार रुपये से अधिक खर्च कर चुका है. उनकी तीन एकड़ की सोयाबीन की खेती अब भी पुराने गांव के पास है, इसलिए रहीम खान को वहां जाना पड़ता है. परिवार का कहना है कि पुराने पड़ोसियों ने भी उनका साथ नहीं दिया. न्याय की उम्मीद बनाए रखने के बावजूद परिवार को डर है कि मुकदमे में देरी और आरोपियों की रिहाई से उनकी लड़ाई कमजोर पड़ सकती है.

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