कर्ज, भूख और बंधुआ मजदूरी का नरक: तेलंगाना की ईंट भट्टियों से 100 बच्चों समेत 400 मजदूर मुक्त
‘साउथ फर्स्ट’ के मुताबिक, तेलंगाना के निजामाबाद जिले में गोदावरी नदी के बैकवॉटर क्षेत्र में फैली ईंट भट्टियों से 400 से अधिक मजदूरों को मुक्त कराया गया है. इनमें 100 से ज्यादा बच्चे भी शामिल हैं. अधिकारियों के अनुसार ये मजदूर वर्षों से अमानवीय परिस्थितियों में रह रहे थे और कथित तौर पर कर्ज, धमकी और शोषण के जाल में फंसे हुए थे.
यह कार्रवाई 19 मई को तेलंगाना राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा प्रधान जिला न्यायाधीश भरत लक्ष्मी की निगरानी में चलाए गए संयुक्त अभियान के दौरान की गई. बचाव अभियान आलूर, आर्मूर और नंदीपेट मंडलों के डेगांव, मगदी और सिद्धापुर गांवों की ईंट भट्टियों में चलाया गया.
कर्ज जो मौत से भी भारी
बताया गया कि कार्रवाई तब शुरू हुई जब एक मजदूर किसी तरह एक भट्ठे से भाग निकलने में सफल हुआ और उसने अधिकारियों को प्रवासी मजदूर परिवारों की अवैध कैद, शोषण और उत्पीड़न की जानकारी दी. ये मजदूर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा से लाए गए थे.
जब अधिकारी और पुलिस टीम भट्ठों में पहुंची तो उन्होंने पाया कि मजदूर बेहद तंग अस्थायी झोपड़ियों में रह रहे थे, जहां न पीने का साफ पानी था और न ही शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं. कई महिलाएं और बच्चे कुपोषित दिखाई दिए. छोटे बच्चे मिट्टी और राख के ढेरों के बीच घूम रहे थे, जबकि बड़े लोग भीषण गर्मी में ईंटें बनाने के काम में लगे हुए थे.
प्रारंभिक जांच में मजदूरों ने बताया कि उन्हें मजदूरी के बजाय राशन कूपन दिए जाते थे. कई मजदूरों ने आरोप लगाया कि उन्हें आने-जाने और खाने के लिए छोटी रकम अग्रिम दी गई थी, जो बाद में अंतहीन कर्ज में बदल गई. इसी कर्ज के बहाने पूरे परिवारों को ईंट भट्ठों में बंधक बनाकर रखा गया.
खुली धमकियां, खामोश चीखें
तमिलनाडु के शिवकाशी से आए एक मजदूर ने अधिकारियों को बताया कि वह लगभग चार वर्षों से भट्ठे में काम कर रहा था, लेकिन उसे कभी सीधे पैसे नहीं दिए गए. उसके परिवार को केवल सप्ताह में एक बार लगभग 200 रुपये मूल्य के राशन कूपन दिए जाते थे.
मजदूरों ने मारपीट, धमकी, यौन हिंसा और भागने की कोशिश करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियों के आरोप भी लगाए. जांच के दौरान भट्ठों से जुड़ी संदिग्ध मौतों के आरोप भी सामने आए हैं, जिससे मामला और गंभीर हो गया है. बचाव अभियान के बाद तीन लोगों को हिरासत में लिया गया है.
इस घटना ने निजामाबाद जिले में गोदावरी नदी क्षेत्र में तेजी से फैल रहे ईंट भट्ठा उद्योग और उसके नियमन पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
अराजकता की भट्टियां
अधिकारियों का अनुमान है कि जिले में 225 से अधिक ईंट भट्टियां संचालित हो रही हैं, जिनमें से अधिकांश नदी और बैकवॉटर क्षेत्रों में स्थित हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से एक भी भट्ठा खनन विभाग में पंजीकृत नहीं पाया गया.
जांच में यह भी सामने आया कि कृषि बिजली कनेक्शनों का व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा रहा था और गोदावरी बेसिन से बिना अनुमति बड़े पैमाने पर मिट्टी की खुदाई की जा रही थी. अधिकारियों के अनुसार यह कारोबार हर महीने करोड़ों रुपये का है.
सिद्धापुर, मगदी और सीएच कोंडूर जैसे गांवों में नदी की खुदाई से निकली मिट्टी के विशाल ढेर अब पूरे इलाके की तस्वीर बदल चुके हैं.
जब कानून डराने का पुतला भी न रह जाए
घटना के बाद श्रम, खनन, राजस्व और बिजली विभागों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं. आलोचकों का कहना है कि वर्षों से सैकड़ों प्रवासी मजदूरों और बच्चों की मौजूदगी के बावजूद किसी विभाग ने कार्रवाई क्यों नहीं की.
जिला खनन अधिकारियों ने कहा है कि 10 ईंट भट्ठा मालिकों को नोटिस जारी किए गए हैं और बाकी इकाइयों की जांच जारी है.
एक अधिकारी ने कहा, “बिना अनुमति चलने वाली ईंट भट्टियों को बख्शा नहीं जाएगा. बंधुआ मजदूरी जैसी प्रथाओं को हर हाल में रोका जाएगा.”

