भीड़ का हमला, अधिकारियों के झूठे वादे और फिर बहिष्कार: महाराष्ट्र के एक गाँव में 11 मुस्लिम परिवारों की दास्तान

महाराष्ट्र के सांगली जिले के अराला गाँव में एक मामूली विवाद (बर्तन के ढक्कन) ने भीषण सांप्रदायिक रूप ले लिया. इसके बाद न्याय न मिलने और पक्षपातपूर्ण पुलिस कार्रवाई के विरोध में पीड़ित मुस्लिम परिवारों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया. हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि मुस्लिम दुकानदारों का व्यापार ठप हो गया है और वे गाँव छोड़कर पलायन करने को मजबूर हैं. 11 पीड़ित परिवारों का आरोप है कि उन्हें न्याय देने के बजाय उल्टे सजा भुगतने पर मजबूर किया जा रहा है.

दुकानदारों के मुताबिक, पिछले कई हफ़्तों से आरला गाँव में मुस्लिमों की कुछ दुकानें सूनी सड़कों के बीच खुल रही हैं. उनके पुराने और नियमित ग्राहकों ने आना बंद कर दिया है. एक दुकानदार का कहना है कि वह हमेशा के लिए अपनी दुकान का शटर गिराने और काम की तलाश में गाँव छोड़ने की तैयारी कर रहा है.

इस संकट के केंद्र में रहे परिवार के सदस्य आबिद डांगे ने दावा किया कि यह एक सामाजिक बहिष्कार का नतीजा है. उन्होंने कहा, "अब हमारी दुकानों पर कोई नहीं आता. हफ़्तों से हमारा कोई कारोबार नहीं हुआ है... मैं अपनी किराने की दुकान बंद करने और काम की तलाश में गाँव छोड़ने की योजना बना रहा हूँ. हम पर इसलिए हमला किया गया क्योंकि हम मुस्लिम हैं, लेकिन न्याय मिलने के बजाय, कीमत हमें ही चुकानी पड़ रही है."

‘न्यूज़ लॉन्ड्री’ में प्रतीक गोयल की काफी लंबी और विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि यह पूरा मामला 28 अप्रैल को तब शुरू हुआ, जब पीड़ित हुसैन डांगे ने अपनी चिकन की दुकान से बर्तन उधार ले जाने वाले पड़ोसी पडाली गाँव के कुछ युवकों से बर्तन का ढक्कन और चम्मच वापस मांगा. युवक अत्यधिक नशे में थे और उन्होंने बहस शुरू कर दी.  कुछ ही देर में बात बढ़ गई और युवकों ने दुकान में रखे मीट क्लीवर (कसाई के छुरे) से हमला करने की कोशिश की. हुसैन के भाई द्वारा वीडियो रिकॉर्डिंग करने पर वे वहाँ से चले गए.

मामला यहीं शांत हो सकता था, लेकिन तभी 'श्री शिवप्रतिष्ठान हिंदुस्तान' (संभाजी भिड़े का संगठन) से जुड़े केदार परगावकर नामक स्थानीय कार्यकर्ता ने हस्तक्षेप किया. आरोप है कि उसने भीड़ को उकसाते हुए सांप्रदायिक माहौल बनाया और देखते ही देखते 40-50 लोगों की हिंसक भीड़ इकट्ठा हो गई.

लाठियों और पत्थरों से लैस इस भीड़ ने दुकान पर धावा बोल दिया. पुलिस की मौजूदगी के बावजूद केदार परगावकर ने हुसैन की गर्दन पर छुरे से जानलेवा वार किया. खुद को बचाने के प्रयास में हुसैन का बायाँ हाथ लगभग कट गया, जिससे उसकी नसें और मुख्य धमनी फट गईं.  अस्पताल ने इन चोटों को बेहद गंभीर और जानलेवा बताया.

डांगे परिवार का मुख्य आरोप पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर है: एफआईआर में देरी: पुलिस ने घायल पीड़ित को घंटों थाने में बैठाए रखा और मुख्य आरोपियों को बचाने का प्रयास किया. धाराओं के साथ हेरफेर: शुरुआत में एफआईआर में हत्या के प्रयास (धारा 109) को शामिल नहीं किया गया था. उच्च अधिकारियों (एसपी) के हस्तक्षेप पर इसे जोड़ा गया, लेकिन 12 जून को दाखिल की गई चार्जशीट से इसे चुपचाप हटाकर केवल गंभीर चोट की मामूली धारा लगा दी गई.

क्रॉस एफआईआर दर्ज करना: पुलिस ने पीड़ितों की सुरक्षा करने के बजाय, आरोपियों की शिकायत पर पीड़ित परिवार के सदस्यों के खिलाफ ही मारपीट का एक काउंटर केस दर्ज कर लिया.

आरोपियों को कोर्ट से जमानत मिलने के बाद गाँव में डीजे बजाकर और मुस्लिम विरोधी आपत्तिजनक नारे लगाते हुए विजय जुलूस निकाला गया. इससे डरे और परेशान 11 मुस्लिम परिवारों ने न्याय की मांग को लेकर 7 जून को बॉम्बे हाई कोर्ट की कोल्हापुर बेंच की तरफ पैदल मार्च शुरू किया.

प्रशासन ने रास्ते में ही उन्हें सुरक्षा, उचित जांच और जांच अधिकारी बदलने का लिखित आश्वासन देकर वापस भेज दिया. लेकिन इस मार्च के तुरंत बाद, 9 जून को 'सकल हिंदू समाज' ने गाँव में जुलूस निकालकर इन मुस्लिम परिवारों के पूर्ण सामाजिक बहिष्कार की घोषणा कर दी.  इसके बाद 12 जून को पुलिस ने वादे के विपरीत पुरानी धाराओं के साथ ही चार्जशीट कोर्ट में जमा कर दी.

स्थानीय निवासियों और पीड़ितों का कहना है कि यह हमला अचानक नहीं हुआ, बल्कि जुलाई 2023 से ही गाँव में 'कट्टर हिंदू सेना' की बैठकों और नफरती भाषणों के जरिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया जा रहा था.  रामनवमी जैसे त्योहारों पर मस्जिद के सामने आपत्तिजनक नारे लगाए जाते थे, जिससे गाँव का पुराना हिंदू-मुस्लिम सौहार्द समाप्त हो गया.

वर्तमान में, हालांकि पुलिस प्रशासन का दावा है कि गाँव में स्थिति सामान्य है और पूरे समुदाय का नहीं बल्कि केवल घटना से जुड़े परिवारों का बहिष्कार हुआ है, लेकिन हकीकत में मुस्लिम परिवारों के लिए गरिमा और सुरक्षा के साथ जीना अत्यंत कठिन हो गया है. कुछ धर्मनिरपेक्ष ग्रामीणों का कहना है कि नफरत फैलाने वाले कुछ लोग ही इस बहिष्कार को बढ़ावा दे रहे हैं, जबकि अधिकांश ग्रामीण शांति चाहते हैं. प्रतीक गोयल की अंग्रेजी में पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है.

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