भारत में 11 लाख से अधिक महिलाएं एचआईवी के साथ जी रहीं, घरेलू हिंसा की भी शिकार.

मेरठ में महिला अपने बेटे के साथ एआरटी दवाएं लेने पहुंचीं. 

भारत में एचआईवी को अक्सर केवल एक स्वास्थ्य समस्या के रूप में देखा जाता है, लेकिन हजारों महिलाओं के लिए यह बीमारी घरेलू हिंसा, सामाजिक भेदभाव और आर्थिक निर्भरता से गहराई से जुड़ी हुई है. यह रिपोर्ट बताती है कि एचआईवी से संक्रमित कई महिलाओं की सबसे बड़ी लड़ाई केवल वायरस से नहीं, बल्कि अपने ही घर के भीतर होने वाली हिंसा और अपमान से भी है.

जयश्री कुमार की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के मेरठ स्थित लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज के एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) केंद्र में हर महीने सैकड़ों महिलाएं दवाइयां लेने पहुंचती हैं. इनमें से कई महिलाएं वर्षों से एचआईवी का इलाज करा रही हैं, लेकिन उनके जीवन की कठिनाइयां केवल बीमारी तक सीमित नहीं हैं.

32 वर्षीय एक महिला, जिसकी पहचान गोपनीय रखी गई है, पिछले 12 वर्षों से अपने बेटे के साथ एआरटी दवाएं ले रही हैं. उन्हें एचआईवी संक्रमण का पता तब चला जब वह लंबे समय तक बीमार रहीं. बाद में उनके बेटे की जांच भी एचआईवी पॉजिटिव निकली. उनका आरोप है कि उनके पति शराब पीते थे, मारपीट करते थे और यौनकर्मियों के पास जाते थे. एक दिन वह घर छोड़कर चले गए और फिर कभी वापस नहीं लौटे. पति के गायब होने के बाद ससुराल वालों ने उन्हें बीमारी के लिए दोषी ठहराकर घर से निकाल दिया.

राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के अनुसार, भारत में 11 लाख से अधिक वयस्क महिलाएं एचआईवी के साथ जीवन जी रही हैं. वहीं, यूएनएड्स की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक एचआईवी से संक्रमित विवाहित महिलाओं में लगभग हर चौथी महिला ने अपने साथी द्वारा हिंसा का सामना किया है. कई अध्ययनों में यह प्रतिशत इससे भी अधिक पाया गया है.

रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू हिंसा और एचआईवी का गहरा संबंध है. कई पुरुष अपने विवाहेतर संबंध, यौन व्यवहार या नशीले पदार्थों के इस्तेमाल की जानकारी पत्नी से छिपाते हैं. महिलाओं को अक्सर बीमारी का पता तब चलता है जब उनकी तबीयत गंभीर रूप से बिगड़ चुकी होती है. कई मामलों में संक्रमण बच्चों तक भी पहुंच जाता है.

मेरठ और आसपास के जिलों में एआरटी केंद्रों के साथ काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों का कहना है कि इलाज के दौरान बड़ी संख्या में महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकायत करती हैं. परामर्शदाता बताते हैं कि वे महिलाओं की बातें सुनते हैं, लेकिन कानूनी सहायता, आश्रय गृह या आर्थिक सहयोग जैसी सुविधाओं का अभाव है. ऐसे में वे बीमारी का इलाज तो कर पाते हैं, लेकिन हिंसा से उन्हें नहीं बचा पाते.

रिपोर्ट में कई महिलाओं ने बताया कि पति या ससुराल वालों के डर से वे अपनी दवाइयां छिपाकर रखती हैं. कुछ महिलाएं बच्चों तक से अपनी बीमारी छिपाती हैं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि समाज उन्हें गलत नजर से देखेगा. कई महिलाएं केवल इसलिए हिंसक विवाह में बनी रहती हैं क्योंकि उनके पास रहने या आजीविका का कोई दूसरा सहारा नहीं होता.

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के एचआईवी नियंत्रण कार्यक्रम ने उपचार और दवाओं की उपलब्धता में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, लेकिन घरेलू हिंसा और लैंगिक असमानता को अभी भी पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है. उनका कहना है कि एआरटी केंद्रों को कानूनी सहायता, मनोसामाजिक परामर्श, आश्रय सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ना जरूरी है, ताकि महिलाओं को केवल दवा ही नहीं, सुरक्षित जीवन का अवसर भी मिल सके.

यह रिपोर्ट बताती है कि एचआईवी से जूझ रही अनेक भारतीय महिलाओं के लिए सबसे बड़ा संघर्ष बीमारी से नहीं, बल्कि उस हिंसा, भेदभाव और चुप्पी से है, जो उनके अपने घरों के भीतर मौजूद है.

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