बुलडोजर से बरी होने तक: 11 मुस्लिम आरोपियों के खिलाफ रामनवमी हिंसा का मामला बिना सबूत के खड़ा किया गया
मध्य प्रदेश के खड़गोन में अप्रैल 2022 की रामनवमी हिंसा से जुड़े बहुचर्चित मामले में 27 जुलाई 2026 को स्थानीय सत्र अदालत ने सभी 11 मुस्लिम आरोपियों को बरी कर दिया. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया था, वही हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ में शामिल थे. अदालत ने यह नहीं कहा कि हिंसा नहीं हुई, बल्कि स्पष्ट किया कि अपराध और आरोपी की पहचान दो अलग-अलग बातें हैं और केवल हिंसा साबित हो जाने से किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.
‘आर्टिकल 14’ के मुताबिक, 10 अप्रैल 2022 को रामनवमी जुलूस के दौरान खड़गोन के तालाब चौक इलाके में पथराव के बाद सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई थी. इस हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हुई, 24 से अधिक लोग घायल हुए तथा कई घरों, दुकानों और वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया. पूरे शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया. दो दिन बाद एफआईआर दर्ज हुई और 12 व 13 अप्रैल को पुलिस ने 11 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार कर दंगा, आगजनी, घर में घुसकर हमला करने और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम सहित कई गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर दिया.
करीब चार साल चली सुनवाई के बाद चौथे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश मुकेश नाथ ने सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया. फैसले ने सिर्फ इस मुकदमे की जांच पर सवाल नहीं उठाए, बल्कि यह भी दिखाया कि किसी गंभीर अपराध में आरोप तय करने, गिरफ्तारी करने और लंबे समय तक जेल में रखने के लिए जांच कितनी मजबूत और निष्पक्ष होनी चाहिए.
गवाहों और फोरेंसिक जांच में क्या खामियां मिलीं?
फैसले में अदालत ने जांच की कई गंभीर कमियों की ओर संकेत किया. अभियोजन पक्ष ने कुल 13 गवाह पेश किए. इनमें से दो गवाह प्रत्यक्षदर्शी नहीं थे, जबकि 11 को प्रत्यक्षदर्शी बताया गया. अदालत में 11 में से आठ गवाह किसी भी आरोपी की पहचान नहीं कर सके. उन्हें शत्रुतापूर्ण घोषित किया गया, लेकिन अभियोजन की जिरह के बाद भी उन्होंने आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस बयान नहीं दिया.
पूरा मामला अंततः एक महिला गवाह की गवाही पर टिक गया, जिसने अदालत में सभी 11 आरोपियों की पहचान की. लेकिन अदालत ने उसकी गवाही को विश्वसनीय नहीं माना. फैसले के अनुसार उसका नाम छह शिकायतों या एफआईआर में प्रत्यक्षदर्शी के रूप में दर्ज नहीं था. घटना के 51 दिन बाद उसका पुलिस बयान दर्ज किया गया और इस देरी का कोई कारण नहीं बताया गया. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पुलिस ने कभी पहचान परेड कराई ही नहीं. अदालत ने माना कि बिना पहचान परेड के अदालत में पहली बार की गई पहचान पर भरोसा नहीं किया जा सकता.
महिला गवाह के पिता और भाई ने भी अदालत में कहा कि उन्होंने जिन लोगों को देखा था, उनके चेहरे कपड़े से ढके हुए थे और वे किसी आरोपी की पहचान नहीं कर सकते. ऐसे में केवल एक गवाह के आधार पर सभी आरोपियों को दोषी ठहराना संभव नहीं था.
फोरेंसिक जांच ने भी अभियोजन के मामले को कमजोर किया. पुलिस का आरोप था कि आरोपियों ने पेट्रोल बम का इस्तेमाल किया था. लेकिन जब्त किए गए बोतलों के टुकड़ों और राख की जांच में पेट्रोल, डीजल या मिट्टी के तेल के कोई अवशेष नहीं मिले. अदालत ने कहा कि इससे आगजनी की घटना झूठी साबित नहीं होती, लेकिन पेट्रोल बम के आरोप को समर्थन देने वाला वैज्ञानिक साक्ष्य मौजूद नहीं है. घटनास्थल की तस्वीरों में भी कोई आरोपी दिखाई नहीं दिया और उन्हें कानून के अनुसार प्रमाणित नहीं किया गया था.
सबसे बड़ा सवाल: 11 लोगों के नाम जांच में कैसे जुड़े?
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पुलिस जांच पर उठे सवाल हैं. एफआईआर में छह लोगों के नाम थे, लेकिन मुकदमा 11 लोगों के खिलाफ चलाया गया. अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह समझा जा सके कि बाकी पांच लोगों के नाम जांच में कैसे जोड़े गए. लगभग 50 लोगों की भीड़ में से इन्हीं 11 लोगों को किस आधार पर चुना गया, इसका संतोषजनक उत्तर अभियोजन नहीं दे सका.
अदालत ने यह भी दोहराया कि भीड़ का हिस्सा होना साबित किए बिना किसी व्यक्ति पर सामूहिक दायित्व का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता. किसी दंगे में भीड़ का होना और किसी विशेष व्यक्ति की उसमें मौजूदगी, दोनों को अलग-अलग साक्ष्यों से सिद्ध करना आवश्यक है. अदालत के अनुसार हिंसा का होना और किसी आरोपी की पहचान साबित होना, दोनों अलग-अलग कानूनी कसौटियां हैं.
लंबी न्यायिक हिरासत, बुलडोजर कार्रवाई और उठते सवाल
इस मामले में सभी आरोपियों ने एक वर्ष से अधिक समय जेल में बिताया. दो आरोपियों ने 827 दिन, जबकि बाकी ने 462 से 567 दिन तक जेल में गुजारे. आरोप तय होने में कई महीने लगे और गवाहों के बयान शुरू होने में गिरफ्तारी के लगभग 16 महीने बाद का समय लग गया. बाद में जब कई गवाह अदालत में आरोपियों की पहचान नहीं कर सके, तब कुछ आरोपियों को जमानत मिली. लेकिन अंतिम फैसला आने तक कई लोग वर्षों तक जेल में रहे. अदालत का फैसला इस प्रश्न को भी सामने लाता है कि यदि मुकदमे के अंत में सबूत पर्याप्त नहीं मिले, तो वर्षों की न्यायिक हिरासत की भरपाई कैसे होगी.
खड़गोन हिंसा के बाद राज्य सरकार ने बुलडोजर कार्रवाई भी की थी. हिंसा के अगले दिन लगभग 16 मकानों और 29 दुकानों को गिरा दिया गया. प्रशासन ने इसे अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई बताया, जबकि प्रभावित परिवारों और अधिकार समूहों ने इसे पक्षपातपूर्ण बताया. इस कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिकाएं अब भी मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में लंबित हैं. हालांकि इस मुकदमे में अदालत ने बुलडोजर कार्रवाई पर कोई निर्णय नहीं दिया, लेकिन यह मामला उस व्यापक बहस का हिस्सा बन गया है जिसमें यह सवाल उठता है कि क्या किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि से पहले ही प्रशासन उसे अपराधी मान सकता है.
खड़गोन का फैसला यह नहीं कहता कि पुलिस ने जानबूझकर झूठा मामला बनाया या हिंसा नहीं हुई. अदालत ने केवल इतना कहा कि अभियोजन आरोपियों के खिलाफ संदेह से परे अपराध सिद्ध नहीं कर सका. लेकिन यह फैसला जांच एजेंसियों के लिए एक स्पष्ट संदेश भी देता है कि सांप्रदायिक हिंसा जैसे संवेदनशील मामलों में गिरफ्तारी केवल संदेह के आधार पर नहीं, बल्कि स्वतंत्र पहचान, वैज्ञानिक साक्ष्य और निष्पक्ष जांच पर आधारित होनी चाहिए. अन्यथा वास्तविक अपराधी बच सकते हैं और निर्दोष लोगों को वर्षों तक मुकदमे और जेल की सजा भुगतनी पड़ सकती है.

