कश्मीर में अधिकांश पेलेट गन पीड़ित एक दशक बाद भी मुआवज़े के इंतज़ार में

जुलाई 2016 में कश्मीर में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान 14 वर्षीय इंशा मुश्ताक की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई. अपने घर की खिड़की खोलते ही सुरक्षा बलों द्वारा दागे गए पेलेट उनकी आंखों में लगे और उनकी दृष्टि चली गई. करीब दस साल बाद जम्मू-कश्मीर सरकार ने उन्हें 41 लाख रुपये का मुआवज़ा देने की घोषणा की है. लेकिन घाटी में पेलेट गन से प्रभावित हजारों अन्य पीड़ित आज भी न्याय, पुनर्वास और आर्थिक सहायता का इंतज़ार कर रहे हैं.

‘स्क्रोल’ के मुताबिक, इंशा उन 6,000 से अधिक लोगों में शामिल थीं जो 2016 में हिज्बुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद भड़के विरोध प्रदर्शनों के दौरान पेलेट गन से घायल हुए थे. उस समय सुरक्षा बलों ने भीड़ नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पर पेलेट गन का इस्तेमाल किया था. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 728 लोगों की आंखों में पेलेट लगीं और कम से कम 54 लोगों की दृष्टि स्थायी रूप से प्रभावित हुई. हालांकि मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि स्थायी रूप से दृष्टिहीन होने वालों की संख्या इससे कहीं अधिक है.

इंशा के पिता मुश्ताक अहमद लोन बताते हैं कि 2017 में तत्कालीन महबूबा मुफ्ती सरकार ने उनकी बेटी के नाम पर गैस एजेंसी देने की घोषणा की थी. लेकिन योजना वर्षों तक अधूरी रही. अब उमर अब्दुल्ला सरकार ने 41 लाख रुपये जारी कर इस वादे को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया है. हालांकि उनका कहना है कि कोई भी मुआवज़ा उनकी बेटी की आंखों की रोशनी वापस नहीं ला सकता.

पुलवामा के रहने वाले मोहम्मद अशरफ वानी भी 2016 में पेलेट का शिकार हुए थे. दोनों आंखों की रोशनी खो चुके वानी अब तक नौ सर्जरी करा चुके हैं, जिन पर लगभग 9 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं. उनका कहना है कि वे इंशा को मिले मुआवज़े के विरोध में नहीं हैं, लेकिन यदि सैकड़ों लोग स्थायी रूप से दृष्टिहीन हुए हैं तो केवल एक व्यक्ति को राहत देना न्यायसंगत नहीं है. उनके अनुसार अधिकांश पीड़ित आज भी आर्थिक कठिनाइयों और मानसिक आघात के साथ जीवन बिता रहे हैं.

कश्मीर में पहली बार 2010 में माछिल फर्जी मुठभेड़ के बाद हुए प्रदर्शनों के दौरान पेलेट गन का इस्तेमाल किया गया था. इसे भीड़ नियंत्रण का "गैर-घातक" हथियार बताया गया, लेकिन इसके गंभीर परिणाम सामने आए. 2016 में इसका सबसे व्यापक इस्तेमाल हुआ. संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2016 से अगस्त 2017 के बीच पेलेट चोटों से 17 नागरिकों की मौत हुई.

जनवरी 2017 में तत्कालीन सरकार ने दृष्टिहीन हुए लोगों को सरकारी नौकरी और आर्थिक सहायता देने की घोषणा की थी. लेकिन विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार केवल 13 लोगों को नौकरी और 22 लोगों को आर्थिक सहायता मिल सकी. बड़ी संख्या में प्रभावित लोग सरकारी मदद से वंचित रह गए.

2017 में पेलेट पीड़ितों ने एक ट्रस्ट बनाकर आपसी सहयोग से राहत पहुंचाने की कोशिश की. ट्रस्ट में करीब 1,600 पीड़ित पंजीकृत थे और 2024 तक लगभग 9 लाख रुपये की सहायता वितरित की गई. लेकिन 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद कई पीड़ितों ने आरोप लगाया कि सरकारी एजेंसियों की बढ़ती निगरानी और पूछताछ के कारण उनका अभियान ठप पड़ गया.

हाल के दिनों में दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शन के दौरान भी पेलेट गन के इस्तेमाल का आरोप लगा है, जिसमें कई लोग घायल हुए और एक युवक की एक आंख की रोशनी चली गई. इस घटना के बाद पेलेट गन के इस्तेमाल पर फिर बहस शुरू हो गई है. कश्मीर के पीड़ितों का कहना है कि यह उनके दर्द को दोबारा सामने लाने का अवसर है और सरकार को सभी प्रभावित लोगों के पुनर्वास पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.

अब 24 वर्ष की हो चुकी इंशा मुश्ताक ने अपनी दृष्टि खोने के बावजूद पढ़ाई नहीं छोड़ी. ब्रेल और स्क्रीन रीडर की मदद से उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी और वर्तमान में स्नातक की पढ़ाई कर रही हैं. उनका मानना है कि पेलेट गन ने हजारों लोगों की जिंदगी बदल दी है और ऐसे हथियारों के इस्तेमाल पर पूरे देश में पुनर्विचार होना चाहिए. इंशा को मिला मुआवज़ा एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन कश्मीर के अधिकांश पेलेट पीड़ित आज भी समान न्याय और सम्मानजनक पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रहे हैं.

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