सितंबर में भारत की थोक मुद्रास्फीति उम्मीद से अधिक तेज़ी से बढ़कर 11.4% पर पहुँची
ऊर्जा आपूर्ति में लगातार आ रही बाधाओं के बीच तेल की कीमतों में आए उछाल के चलते, भारत की वार्षिक थोक मुद्रास्फीति सितंबर में उम्मीद से अधिक तेज़ी से बढ़कर 11.39% हो गई. ‘रॉयटर्स’ में शिवांगी आचार्य की रिपोर्ट है कि भारत में थोक कीमतें खुदरा कीमतों की तुलना में अधिक तेज़ी से बढ़ी हैं, क्योंकि सरकारी ईंधन खुदरा विक्रेताओं ने बढ़ी हुई ऊर्जा लागत का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही उपभोक्ताओं पर डाला है. इसके अलावा, खुदरा मुद्रास्फीति भी बढ़ने लगी है और सितंबर में केंद्रीय बैंक के सहनशीलता दायरे (टॉलरेंस बैंड) के ऊपरी छोर के करीब पहुँच गई है.
खुदरा मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने वाले भारतीय रिजर्व बैंक ने मूल्य के बढ़ते दबावों का हवाला देते हुए, पिछले सप्ताह लगभग चार वर्षों में पहली बार बेंचमार्क रेपो रेट बढ़ाने के मामले में अपने वैश्विक समकक्षों का अनुसरण किया.
‘रॉयटर्स’ के एक सर्वेक्षण में अर्थशास्त्रियों के 10.18% के औसत अनुमान और अगस्त में दर्ज 9.92% की वृद्धि के मुकाबले सितंबर में थोक मुद्रास्फीति अधिक रही. यह आँकड़ा जून में शुरू हुई उस नई श्रृंखला के तहत सबसे अधिक है, जिसमें आधार वर्ष (बेस ईयर) 2022-23 को बनाया गया है.
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के मुख्य economist (अर्थशास्त्री) देवेंद्र पंत ने कहा कि खुदरा मुद्रास्फीति की तरह ही थोक मुद्रास्फीति भी व्यापक होती जा रही है. उन्होंने यह भी जोड़ा कि थोक कीमतों पर दबाव अगले साल तक बना रहेगा.
पंत ने कहा, "हमें आशंका है कि अक्टूबर 2026 में थोक मुद्रास्फीति बढ़कर 12% से अधिक हो जाएगी, और इसके कम से कम फरवरी 2027 तक दो अंकों में बने रहने की संभावना है.

