मतपत्र और राजनीतिक सत्ता के बीच: क्या लोकतंत्र अपनी आवाज खो रहा है?
'काउंटरकरंट्स' में एडवोकेट सुधाकर शनमुगम ने लिखा है कि भारत में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर हुए प्रदर्शनों ने संवैधानिक अधिकारों, राजनीतिक सत्ता और लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं. विपक्षी दलों, छात्रों और नागरिक समाज संगठनों ने मतदाता सूची से पात्र नागरिकों के नाम हटाए जाने की आशंका जताते हुए पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग की है. इस बीच, प्रदर्शनों पर पुलिस की पाबंदियों और गिरफ्तारियों ने शांतिपूर्ण सभा तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को चर्चा के केंद्र में ला दिया है.
निर्वाचन आयोग का कहना है कि मतदाता सूची की समीक्षा चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जरूरी है. हालांकि, आलोचकों को आशंका है कि इससे पात्र नागरिक लोकतांत्रिक भागीदारी से वंचित हो सकते हैं. इस विवाद का समाधान राजनीतिक टकराव के बजाय पारदर्शी जांच और संस्थागत जवाबदेही के जरिए होना चाहिए.
संविधान सत्ता को मनमानी का अधिकार नहीं देता
भारत का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा की रक्षा करता है. अनुच्छेद 19(1)(क) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अनुच्छेद 19(1)(ख) शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने के अधिकार और अनुच्छेद 21 जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है. इन अधिकारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन उन्हें संवैधानिक कसौटियों पर खरा उतरना चाहिए.
1973 में हिमतलाल के. शाह बनाम पुलिस आयुक्त मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य सार्वजनिक सभाओं को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन एकत्र होने के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता. इसी तरह, 2015 के श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ फैसले ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व को मजबूत किया. शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग, मनमानी हिरासत और सार्वजनिक सभाओं पर अनुचित प्रतिबंध लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चिंता पैदा करते हैं.
मानवीय गरिमा और असहमति का अधिकार
संवैधानिक लोकतंत्र में असहमति केवल राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों का हिस्सा है. 1978 के मेनका गांधी बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली प्रक्रियाएं निष्पक्ष, न्यायसंगत और तर्कसंगत होनी चाहिए. 2017 के न्यायमूर्ति के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ मामले में निजता, व्यक्तिगत स्वायत्तता और मानवीय गरिमा के संवैधानिक महत्व को स्वीकार किया गया.
ये सिद्धांत अदालतों तक सीमित नहीं हैं. जब नागरिकों को अपनी राय व्यक्त करने से डर लगता है या प्रदर्शनकारियों को अपमानित किया जाता है, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद कमजोर होती है. सरकार की वैधता केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने से नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करने से भी तय होती है.
सड़कें भी लोकतंत्र का मंच हैं
संसद जनता का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन लोकतांत्रिक भागीदारी केवल संसद या चुनावों तक सीमित नहीं है. सड़कें, विश्वविद्यालय, कार्यस्थल और सार्वजनिक स्थान भी नागरिकों की आवाज उठाने के महत्वपूर्ण मंच हैं. हालांकि, शांतिपूर्ण सभा के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन जरूरी है. 2020 के अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकालीन कब्जे की सीमाओं को रेखांकित किया था.
मतपेटी से आगे
लोकतंत्र का क्षरण हमेशा संवैधानिक संस्थाओं को भंग करने से नहीं होता. यह धीरे-धीरे अनुचित प्रतिबंधों, संस्थागत चुप्पी और नागरिकों की उदासीनता के जरिए भी हो सकता है. चुनावी बहुमत मौलिक अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकता. न्यायपालिका, विधायिका, कानून लागू करने वाली एजेंसियों, नागरिक समाज और स्वतंत्र प्रेस की जिम्मेदारी है कि वे संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करें.
अंततः लोकतंत्र का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि सरकारें कैसे चुनी जाती हैं, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि चुनावों के बीच नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार होता है. मतपेटी सरकारों को सत्ता देती है, जबकि संविधान नागरिकों के अधिकारों की गारंटी देता है. लोकतंत्र की शुरुआत जनता के वोट से होती है, लेकिन उसे जीवित जनता की आवाज रखती है.
(एडवोकेट सुधाकर शनमुगम का यह लेख मूल अंग्रेजी लेख हिन्दी में अनुदित है.)

