दिल्ली में छात्रों पर पुलिस बर्बरता: अमित शाह को इन 12 सवालों के जवाब देने चाहिए
दिल्ली में 20 जुलाई को प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं. दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आती है, जबकि प्रदर्शन के दौरान तैनात रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल का हिस्सा है और वह भी गृह मंत्रालय के अंतर्गत आती है. ऐसे में पुलिस और सुरक्षा बलों की कार्रवाई को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की जवाबदेही पर सवाल उठाए जा रहे हैं.
‘वायर’ की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग के कई वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बाद पुलिस कार्रवाई के तरीके, इस्तेमाल किए गए हथियारों, हिरासत में लिए गए छात्रों और महिला प्रदर्शनकारियों के साथ व्यवहार को लेकर विवाद बढ़ा है. इन घटनाओं को लेकर गृह मंत्रालय की ओर से अब तक विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आने के कारण कई सवाल अनुत्तरित हैं.
1. वाटर कैनन का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया?
भारत में भीड़ नियंत्रण के दौरान सामान्य तौर पर कम नुकसान पहुंचाने वाले उपायों को पहले इस्तेमाल करने की व्यवस्था है. इसमें भीड़ को तितर-बितर करने के लिए वाटर कैनन का इस्तेमाल भी शामिल है. सवाल है कि 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सीधे शारीरिक बल के इस्तेमाल से पहले वाटर कैनन जैसे विकल्प का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया.
2. कील लगी लाठियों के इस्तेमाल के आरोपों की सच्चाई क्या है?
प्रदर्शन स्थल से सामने आई कुछ तस्वीरों और दावों में सुरक्षा कर्मियों के पास ऐसी लाठियां होने का आरोप लगाया गया, जिनमें कीलें लगी थीं. यदि ऐसा हुआ है तो यह सामान्य भीड़ नियंत्रण उपकरण को गंभीर चोट पहुंचाने वाले हथियार में बदलने जैसा है. सवाल है कि क्या ऐसी लाठियों का वास्तव में इस्तेमाल किया गया और अगर हां, तो इसकी अनुमति किसने दी.
3. पैलेट गन चलाने का आदेश किसने दिया?
प्रदर्शन के बाद कुछ घायलों के शरीर में धातु के छर्रे मिलने के दावे सामने आए हैं. पैलेट गन गंभीर चोट और आंखों की रोशनी तक प्रभावित करने के लिए विवादित रही हैं. दिल्ली पुलिस की ओर से इसके इस्तेमाल से इनकार किए जाने की बात भी सामने आई है.
ऐसे में सवाल है कि क्या आरएएफ या किसी अन्य सुरक्षा बल ने पैलेट गन का इस्तेमाल किया था. अगर किया गया, तो इसका आदेश किस स्तर पर दिया गया और इसके बाद संबंधित अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई.
4. महिला प्रदर्शनकारियों पर पुरुष पुलिसकर्मियों ने बल क्यों प्रयोग किया?
प्रदर्शन के कई वीडियो में पुरुष पुलिसकर्मियों को महिला प्रदर्शनकारियों के साथ बल प्रयोग करते हुए दिखाए जाने के आरोप लगे हैं. कुछ वीडियो में लाठी से मारने और कपड़े खींचे जाने जैसी घटनाओं के दावे भी किए गए हैं.
महिला प्रदर्शनकारियों से निपटने में महिला पुलिसकर्मियों की भूमिका और निर्धारित प्रक्रियाओं को देखते हुए सवाल है कि पुरुष पुलिसकर्मियों ने महिला छात्रों के खिलाफ बल क्यों प्रयोग किया और वहां मौजूद वरिष्ठ अधिकारियों ने इसे रोकने के लिए क्या किया.
5. सादे कपड़ों में छात्रों को पीटते लोग कौन थे?
प्रदर्शन के वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से दावा किया गया कि वर्दीधारी पुलिसकर्मियों के साथ कुछ लोग सादे कपड़ों में भी लाठियां लेकर छात्रों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे थे.
यदि वे पुलिसकर्मी थे तो उनकी पहचान स्पष्ट क्यों नहीं थी और यदि वे पुलिस से जुड़े नहीं थे तो उन्हें पुलिस की मौजूदगी में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग करने की अनुमति कैसे मिली. उनकी पहचान और भूमिका स्पष्ट किए जाने की मांग की जा रही है.
6. पुलिसकर्मियों की वर्दी पर नाम क्यों नहीं थे?
पुलिसकर्मियों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए वर्दी पर नाम की पट्टी महत्वपूर्ण मानी जाती है. प्रदर्शन के दौरान कई पुलिसकर्मियों की वर्दी पर नाम दिखाई नहीं देने के आरोप लगे हैं.
ऐसे में सवाल है कि क्या पुलिसकर्मियों को बिना नाम की पट्टी के तैनात किया गया था. यदि ऐसा हुआ तो क्या इसके लिए कोई आदेश जारी किया गया था और इसकी जिम्मेदारी किसकी है.
7. महिला प्रदर्शनकारी को मारते दिखे वरिष्ठ अधिकारी पर क्या कार्रवाई हुई?
एक वायरल वीडियो में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी संदीप लांबा बताए जा रहे एक अधिकारी को महिला प्रदर्शनकारी पर बल प्रयोग करते दिखाए जाने का दावा किया गया है. इसे लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में सवाल उठे हैं.
ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच, निलंबन या किसी अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गई है या नहीं.
8. कितने आंसू गैस के गोले दागे गए?
जंतर-मंतर और पार्लियामेंट स्ट्रीट जैसे इलाकों में आंसू गैस के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठे हैं. यह इलाका घनी आबादी वाला है और आसपास बड़ी संख्या में आम लोग भी मौजूद रहते हैं.
सरकार और पुलिस को स्पष्ट करना चाहिए कि उस दिन कुल कितने आंसू गैस के गोले दागे गए और किन-किन स्थानों पर उनका इस्तेमाल किया गया. इससे यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि बल का इस्तेमाल भीड़ को नियंत्रित करने के लिए किया गया या प्रदर्शनकारियों को पीछे हटाते हुए भी कार्रवाई जारी रही.
9. क्या पुलिस बैरिकेड में बिजली का करंट था?
जंतर-मंतर पर लगाए गए पुलिस बैरिकेड में कथित तौर पर बिजली का करंट होने के आरोप भी सामने आए हैं. यदि स्वतंत्र जांच में इसकी पुष्टि होती है तो यह मामला सामान्य भीड़ नियंत्रण से कहीं अधिक गंभीर हो जाता है.
सवाल है कि क्या बैरिकेड में वास्तव में बिजली का प्रवाह था. अगर था तो यह किसके आदेश पर किया गया और प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था की गई थी.
10. कितने लोगों को हिरासत में लिया गया और उन पर कौन-सी धाराएं लगाई गईं?
कार्रवाई के बाद बड़ी संख्या में छात्रों को हिरासत में लिए जाने के दावे किए गए हैं. उनके परिवारों और कानूनी प्रतिनिधियों को हिरासत में लिए गए लोगों की स्थिति और ठिकाने की जानकारी मिलने में परेशानी होने के आरोप भी सामने आए हैं.
दिल्ली पुलिस को स्पष्ट करना चाहिए कि कुल कितने लोगों को हिरासत में लिया गया, उन्हें कहां रखा गया, किन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया और उन पर कौन-सी धाराएं लगाई गईं.
11. क्या विभागीय या मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए गए हैं?
प्रदर्शन के दौरान गंभीर चोट, सिर में चोट और पैलेट से घायल होने जैसे आरोपों के बाद स्वतंत्र जांच की मांग उठ रही है. सवाल है कि क्या पूरे घटनाक्रम की विभागीय, मजिस्ट्रेट या न्यायिक जांच के आदेश दिए गए हैं.
स्वतंत्र जांच से यह पता लगाया जा सकता है कि बल प्रयोग का आदेश किस स्तर पर दिया गया, क्या निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन हुआ और कार्रवाई परिस्थितियों के अनुपात में थी या नहीं.
12. गृह मंत्रालय की ओर से अब तक बयान क्यों नहीं आया?
सबसे बड़ा सवाल केंद्रीय गृह मंत्रालय की प्रतिक्रिया को लेकर है. दिल्ली पुलिस और आरएएफ दोनों केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन हैं. ऐसे में इतने गंभीर आरोपों और राजनीतिक विवाद के बावजूद मंत्रालय की ओर से विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण नहीं आना सवाल खड़े करता है.
यदि सरकार का मानना है कि दिल्ली पुलिस और आरएएफ की कार्रवाई कानून और निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुरूप थी, तो उसे इससे जुड़े तथ्य सार्वजनिक करने चाहिए. वहीं, यदि कार्रवाई के दौरान नियमों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी स्वतंत्र जांच और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए.
20 जुलाई की घटनाओं को लेकर उठ रहे सवाल केवल पुलिस की कार्रवाई तक सीमित नहीं हैं. मामला यह भी है कि राष्ट्रीय राजधानी में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ बल प्रयोग के फैसले कैसे लिए गए, किस स्तर से आदेश आए और कार्रवाई के बाद जवाबदेही तय करने के लिए क्या कदम उठाए गए. इन सवालों के स्पष्ट जवाब आने तक दिल्ली में छात्रों के खिलाफ हुई कार्रवाई पर विवाद बना रहेगा.

