‘न्याय में देरी ने उसकी जान ले ली’: 14 साल बाद भी गुजरात के परिवार जवाब तलाश रहे हैं
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में ब्रेंडन डाभी और परिमल ए डाभी की यह रिपोर्ट 2012 के बहुचर्चित थानगढ़ (सुरेंद्रनगर, गुजरात) पुलिस गोलीबारी मामले और न्याय के इंतजार में घुट-घुट कर दम तोड़ते पीड़ित दलित परिवारों की त्रासदी को रेखांकित करती है. लगभग 14 साल बीत जाने के बाद भी पीड़ितों को न्याय न मिलने के कारण अब यह मामला सामाजिक दुख और कानूनी विफलता का प्रतीक बन चुका है. यह घटना, उस वक्त की है जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. लेकिन पीड़ितों की हालत बद से बदतर हो गई है.
थानगढ़ घटनाक्रम और मौतों की पृष्ठभूमि
सितंबर 2012 में थानगढ़ के प्रसिद्ध तरनेतर मेले के दौरान दलित और गैर-दलित युवकों के बीच झड़प हुई थी. भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने गोलियाँ चलाईं, जिसमें तीन दलित युवक — पंकज सुमरा (16), मेहुल राठौड़ (17) और प्रकाश परमार (26) मारे गए, जबकि एक अन्य युवक घायल हो गया. सीआईडी जाँच में यह बात सामने आई कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर एके-47 जैसी असाल्ट राइफलों का इस्तेमाल किया था.
न्याय में देरी और परिवारों का मानसिक-शारीरिक बिखराव
न्याय न मिलने की हताशा ने पीड़ित परिवारों को तोड़कर रख दिया है:
पंकज सुमरा के 53 वर्षीय पिता अमर्शी सुमरा ने 26 अगस्त को ट्रेन से कटकर संदिग्ध रूप से आत्महत्या कर ली. उनका शव उसी बुद्ध विहार स्मारक के पास रेलवे ट्रैक पर मिला, जो उनके बेटे और अन्य दो युवकों की याद में बनाया गया था.
2015 में प्रकाश परमार के पिता बाबूभाई की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी. अमर्शी की मौत के बाद अब तीनों पीड़ित पिताओं में से केवल मेहुल राठौड़ के पिता वालजी राठौड़ ही जीवित बचे हैं.
त्योहारों पर बढ़ता दर्द: रक्षाबंधन और तरनेतर मेले के आयोजन के समय परिवार का दर्द और बढ़ जाता है. न्याय प्रक्रिया की सुस्ती और अपनों के जाने के ग़म ने परिवारों को आर्थिक और मानसिक रूप से तबाह कर दिया है.
प्रशासनिक जाँच और कानूनी स्थिति
संजय प्रसाद जाँच रिपोर्ट: 2012 में सरकार ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजय प्रसाद के नेतृत्व में जाँच के आदेश दिए थे. 2013 में सौंपी गई यह रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की गई है, क्योंकि यह 'जाँच आयोग' के तहत नहीं आती थी. गुजरात विधानसभा में बार-बार पूछे जाने पर सरकार का यही जवाब रहा कि रिपोर्ट विचारधीन है.
एसआईटी का गठन और चार्जशीट: भारी जनविरोध के बाद 2016 में आईपीएस अनुपम सिंह गहलोत की अध्यक्षता में एसआईटी बनी. एसआईटी ने केवल पंकज सुमरा की हत्या के मामले में चार्जशीट दाखिल की, जिसकी सुनवाई सुरेंद्रनगर अदालत में पिछले 5 सालों से रेंग रही है.
मामलों का बंद होना: मेहुल राठौड़ और प्रकाश परमार की मौतों से जुड़े मामलों में एसआईटी ने कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की और सबूत/गोलियाँ न मिलने की बात कहकर केस बंद कर दिए, जिससे परिवारों में भारी आक्रोश है.
विरोध और परिजनों का संघर्ष
पीड़ित परिवारों ने न्याय पाने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, दिल्ली-गांधीनगर में विरोध प्रदर्शन किए और अनगिनत याचिकाएँ दीं. मेहुल के पिता वालजी राठौड़ ने सांकेतिक विरोध दर्ज कराने के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव में गांधीनगर सीट से निर्दलीय चुनाव भी लड़ा था.
रिपोर्ट का सार कहता है कि 14 साल बीत जाने के बावजूद, किसी भी मुख्य दोषी की गिरफ्तारी न होना और प्रशासनिक रिपोर्टों का ठंडे बस्ते में पड़े रहना गुजरात के इस संवेदनशील मामले पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है.

