अडानी कंपनियों ने हिंडनबर्ग मामले से जुड़े उल्लंघनों के निपटान के लिए 1.5 करोड़ रुपये का भुगतान किया

‘रॉयटर्स’ के अनुसार, भारत के बाजार नियामक (सेबी) ने मंगलवार को कहा कि अडानी ग्रुप की प्रमुख कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज सहित चार अडानी कंपनियों और समूह की एक पूर्व फर्म ने कथित डिस्क्लोजर (जानकारी उजागर करने) उल्लंघनों से जुड़ी कार्यवाही के निपटान (सेटलमेंट) के लिए 1.51 करोड़ रुपये (1,57,966.31 डॉलर) का भुगतान किया है.

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने अपने आदेश में कहा कि अडानी एंटरप्राइजेज कथित तौर पर मार्च 2013 को समाप्त वर्ष के लिए अपनी वार्षिक रिपोर्ट में एक 'संबंधित-पक्ष लेन-देन' (रिलेटेड-पार्टी ट्रांजैक्शन) का खुलासा करने में विफल रही थी.

अन्य कंपनियों, जिनमें एडब्ल्यूएल एग्री बिजनेस लिमिटेड (पूर्व में अडानी विल्मर लिमिटेड) शामिल है, के बारे में पाया गया कि उन्होंने कुछ ऐसी ऑडिट या समीक्षा रिपोर्ट दाखिल की थीं, जिन पर ऐसी फर्मों के हस्ताक्षर थे जिनके पास उस समय वैध 'पियर रिव्यू सर्टिफिकेट' नहीं था.

सेबी ने 2024 में अपने आरोपों की रूपरेखा तैयार करते हुए इन कंपनियों को कारण बताओ नोटिस भेजे थे. कंपनियों ने अपने अपराध को स्वीकार या अस्वीकार किए बिना ही इस मामले को सुलझा (सेटल कर) लिया.

ये मामले उन 24 मामलों का हिस्सा थे जिनकी जांच नियामक ने जनवरी 2023 में शॉर्ट-सेलर हिंडनबर्ग रिसर्च द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद की थी. हिंडनबर्ग ने आरोप लगाया था कि गौतम अडानी के नेतृत्व वाले समूह ने टैक्स हेवन (कर छूट वाले देशों) के उपयोग के माध्यम से अपने शेयरों की कीमतों में हेरफेर किया था.

क्या यह सभी लंबित मुकदमों का निपटारा करता है, इस पर रॉयटर्स के टिप्पणी के अनुरोध का अडानी के प्रवक्ता ने तुरंत जवाब नहीं दिया. समाचार एजेंसी के मुताबिक, यह समझौता हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद अडानी समूह पर मंडरा रही नियामक अनिश्चितता को और कम करता है.

पिछले एक साल में, सेबी ने समीक्षा से उत्पन्न कई जांचों में निपटान की अनुमति दी है, जिनमें डिस्क्लोजर उल्लंघन, कथित इनसाइडर ट्रेडिंग और ऑडिट-अनुपालन शामिल हैं.इसने एक अलग मामले में भी कार्यवाही बंद कर दी, जिसमें यह जांच की गई थी कि क्या अंतर-कंपनी ऋणों को इस तरह से मोड़ा गया था जिससे संबंधित-पक्ष लेन-देन छिप जाए.

हालांकि, इस बात की जांच अभी भी लंबित है कि क्या कुछ विदेशी (ऑफशोर) निवेशकों का इस्तेमाल भारतीय नियमों को दरकिनार करने के लिए किया गया था (जिनके तहत सार्वजनिक शेयरधारकों द्वारा 25% शेयर रखा जाना अनिवार्य है) और क्या अडानी समूह के शेयरों के कारोबार में हेरफेर किया गया था?

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