100% अमेरिकी शुल्क की धमकी: क्या भारत के नए व्यापार समझौते अमेरिका पर निर्भरता घटा सकते हैं?
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने एक नया विधेयक पारित किया है जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूसी तेल-गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने के व्यापक अधिकार देता है. यह कदम भारतीय निर्यात को एक बार फिर संकट में डाल सकता है. ट्रंप की वापसी के बाद से टैरिफ दरों और नियमों में लगातार बदलाव हुए हैं, जिससे भारतीय निर्यातकों के सामने गंभीर अनिश्चितता पैदा हो गई है. चूंकि ट्रंप प्रशासन ने भारतीय वस्तुओं पर बार-बार टैरिफ (शुल्क) में बदलाव किए हैं, इसलिए नई दिल्ली तेजी से व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर कर रही है. लेकिन क्या 100% टैरिफ का सामना करते हुए ये नए बाजार अमेरिका पर भारत की निर्भरता को सार्थक रूप से कम कर सकते हैं? ‘द हिंदू’ में अरीना अरोड़ा और गंदला स्नेहा ने इसी सवाल का व्यापक विश्लेषण किया है.
अमेरिकी शुल्क व्यवस्था और रूसी तेल का गणित
यह विश्लेषण कहता है कि ट्रंप प्रशासन ने रूसी तेल की खरीद पर भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगाए. हालांकि दिसंबर 2025 में भारत के कुल तेल आयात में रूसी हिस्सेदारी घटी थी, लेकिन पश्चिम एशिया संकट के चलते अप्रैल 2026 में यह आयात 11 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया. जुलाई 2025 में भारत के तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 51% से अधिक दर्ज की गई.
अमेरिका में शुल्क नीतियां लगातार बदलती रही हैं—कभी 10% अधिभार, तो कभी धारा 301 के तहत 10% से 12.5% तक के नए शुल्क. वर्तमान में अमेरिका जाने वाले लगभग 55% भारतीय निर्यात पर यह अतिरिक्त शुल्क लागू है, जबकि जेनेरिक दवाएं और स्मार्टफोन जैसी वस्तुएं इससे बाहर हैं. जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर बिस्वजीत धर के अनुसार, इन अनियमित बदलावों से निर्यातकों के लिए अपेक्षित कमाई का अनुमान लगाना कठिन हो गया है.
अमेरिका पर बढ़ती निर्भरता और निर्यात बास्केट का बदलाव
विश्लेषण के अनुसार, पिछले दो दशकों में भारत के निर्यात ढांचे में बड़ा बदलाव आया है. 2005 वह वक्त था, जब निर्यात में उपभोक्ता वस्तुओं (52.1%), बहुमूल्य पत्थरों (24.7%) और वस्त्रों (21.3%) का दबदबा था. 2015-2020 के दौरान फार्मास्यूटिकल्स और निर्मित वस्तुओं की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी. 2025 में इलेक्ट्रिकल मशीनरी सबसे बड़ी श्रेणी बन गई, जो अमेरिका को होने वाले कुल निर्यात का 28% (2005 में केवल 2.6%) थी.
मौजूदा स्थिति बताती है कि भारतीय उद्योग अमेरिकी बाजार पर बेहद निर्भर हैं. 2025 में भारत से निर्यात इलेक्ट्रिकल मशीनरी का 48.1%, कालीन का 55%, और दवाओं का 37.3% हिस्सा केवल अमेरिका गया. 2025 तक भारत के कुल मर्चेंडाइज निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़कर 20.8% हो गई (जो 2010 में 24 अरब डॉलर से बढ़कर 92 अरब डॉलर तक पहुंची).
भारत ने 2021 के बाद से यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ईएफटीए (यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ), ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के साथ 9 व्यापार समझौते किए हैं तथा यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ बातचीत पूरी की है. इन करारों के तहत भारतीय वस्तुओं को शून्य-शुल्क पहुंच मिल रही है.
हालांकि, नए मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के बावजूद अमेरिकी बाजार का महत्व कम नहीं हुआ है. यूएई, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के साथ द्विपक्षीय व्यापार बढ़ा है, लेकिन व्यक्तिगत रूप से ये अमेरिका (20.8%) या ईयू (17.6%) की तुलना में काफी छोटे बाजार हैं.
इस मामले में व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं. मसलन, शुल्क मुक्त पहुंच मिलने का मतलब यह नहीं है कि निर्यात तुरंत नए बाजारों में शिफ्ट हो जाएगा. निर्यातकों को नए खरीदार खोजने, वितरण नेटवर्क स्थापित करने और कड़े नियामक मानकों को पूरा करने में समय और निवेश लगता है.
जहां तक चीन का प्रश्न है तो उसने ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान ही अमेरिकी बाजार पर अपनी निर्भरता घटाकर नए बाजार विकसित कर लिए थे. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि भारत मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाए, तो वह भी अमेरिका पर अपनी निर्यात निर्भरता को कम कर सकता है.
यद्यपि, हालिया अमेरिकी विधेयक से 100% टैरिफ स्वतः लागू नहीं होगा, लेकिन यह राष्ट्रपति को ऐसा करने का अधिकार देता है. नए व्यापार समझौते भारत को व्यापक बाजार तो प्रदान करते हैं, लेकिन अमेरिकी निर्भरता तभी कम होगी जब भारतीय निर्यात वास्तव में इन नए गंतव्यों की ओर स्थानांतरित होना शुरू होगा.

