भारत का नेट एफडीआई 2 साल में $28 अरब से $1 अरब पर कैसे पहुँच गया

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में ऋचा गांधी ने विस्तार से बताया है कि दो साल में भारत का प्रत्यक्ष विदेश निवेश कैसे 28 अरब डॉलर से घटकर 1 अरब डॉलर अपर पहुँच गया. ऋचा लिखती हैं: यह माना जाता था कि एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) विदेशी धन का एक भरोसेमंद जरिया है — ऐसा धन जो कारखाने बनाता है, तकनीक लाता है और लंबे समय तक टिका रहता है. दूसरी ओर, एफपीआई (विदेशी पोर्टफोलियो निवेश) को उस चंचल रिश्तेदार की तरह देखा जाता था, जो बाजार का रुख बदलते ही तुरंत बाहर निकल जाता है. लेकिन अब भारत का नेट एफडीआई घटकर एक छोटी सी धारा (नाममात्र) रह गया है, क्योंकि बढ़ते रीपेट्रिएशन (पूँजी वापस ले जाना) और विनिवेश ने मजबूत इनफ्लो (आने वाले निवेश) के असर को खत्म कर दिया है. आखिर क्या बदल गया?

$74 अरब अंदर आए, $71 अरब बाहर गए

वित्तीय वर्ष 2025-26 के नौ महीनों में देश में केवल $3 अरब का नेट एफडीआई आया. 2024-25 में यह आंकड़ा महज $1 अरब था — जिसमें $81 अरब का इनफ्लो (आगमन) और $80 अरब का आउटफ्लो (बहिर्गमन) हुआ था.

2021 के बाद शेयर बाजार में आई तेजी के कारण कई विदेशी कंपनियां भारतीय बाजारों में लिस्ट हुईं. लिस्टिंग के बाद, जुटाई गई रकम का एक बड़ा हिस्सा 'रीपेट्रिएशन और विनिवेश' के रूप में उनके गृह देश में ट्रांसफर कर दिया गया. इसी तरह का आउटफ्लो तब भी होता है जब भारतीय कंपनियां विदेशों में निवेश करती हैं. इन सबके बीच इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि ग्रॉस एफडीआई इनफ्लो (कुल आगमन) गिरा नहीं है, बल्कि 2023-24 के बाद असल में बढ़ा ही है.  

नेट एफडीआई घटने की बड़ी वजह

बड़ा आउटफ्लो (पूँजी का बाहर जाना) भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में निवेश करने के कारण नहीं, बल्कि रीपेट्रिएशन और विनिवेश के कारण है — यानी वह पैसा जो विदेशी निवेशक मुनाफा कमाने, बाजार से बाहर निकलने या अपनी हिस्सेदारी बेचने के बाद वापस अपने देश ले जाते हैं. अप्रैल-दिसंबर 2025 के बीच अकेले यही आंकड़ा $44.6 अरब रहा.

विदेशी निवेशक भारत में मुख्य रूप से सर्विसेज, सॉफ्टवेयर, मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेडिंग पर दांव लगा रहे हैं. वहीं, विदेशों में निवेश करने वाली भारतीय कंपनियां फाइनेंस, बिजनेस सर्विसेज, मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड में अधिक पैसा लगा रही हैं — जिससे पता चलता है कि आने वाली और बाहर जाने वाली पूँजी अलग-अलग अवसरों की तलाश में है.

एफडीआई का एक बड़ा हिस्सा लगातार सिंगापुर और मॉरीशस के रास्ते आ रहा है. ये देश केवल स्रोत नहीं हैं; ये टैक्स नियमों, संधियों और कॉर्पोरेट स्ट्रक्चरिंग के कारणों से कंपनियों द्वारा उपयोग किए जाने वाले वैश्विक रूटिंग हब हैं.

एफडीआई पूरे देश में समान रूप से नहीं फैला है. महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, तमिलनाडु और हरियाणा अकेले 80% से अधिक इनफ्लो को आकर्षित करते हैं, जो उनके मजबूत बुनियादी ढांचे, बेहतर बिजनेस इकोसिस्टम और निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है.

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