भारत में गो-संरक्षण: शासन के भीतर के अंतर्विरोध
फैजान मुस्तफा और अब्दुल समद ने ‘द हिंदू’ में प्रकाशित एक लेख में भारत में गो-संरक्षण नीतियों और उनके व्यावहारिक तथा आर्थिक परिणामों के बीच गहरे अंतर्विरोधों को उजागर किया है. हम यहां उनके लंबे लेख का हिंदी में अनुदित सारांश प्रस्तुत कर रहे हैं. लेखकद्वय के अनुसार, हाल ही में राजस्थान के जैसलमेर में भारी मात्रा में गायों के कंकाल मिलने और छत्तीसगढ़ में गायों की भूख से हुई सामूहिक मौतों जैसी घटनाओं ने इस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. इसके अतिरिक्त, पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार द्वारा 13 मई 2026 को 'पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950' के तहत कड़े प्रतिबंधात्मक नियम लागू किए गए. कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इस नोटिस को वैध माना, जिसके तहत अब बिना सरकारी "फिटनेस प्रमाणपत्र" के किसी भी मवेशी (गाय, बैल, सांड या भैंस) का वध नहीं किया जा सकता. हालांकि, इसमें 14 वर्ष से अधिक आयु की गायों के वध की अनुमति दी गई है, जिससे हिंदुत्व समर्थकों में असंतोष है. वर्तमान में भारत के 20 से अधिक राज्यों में गोवध विरोधी कानून लागू हैं, जबकि पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों और केरल में ऐसे प्रतिबंध नहीं हैं.
गो-संरक्षण ऐतिहासिक रूप से एक बड़ा राजनीतिक और भावनात्मक मुद्दा रहा है. केवल भाजपा ही नहीं, बल्कि कांग्रेस ने भी अतीत में इसका राजनीतिक लाभ उठाया था; यहाँ तक कि 'गाय और बछड़ा' लंबे समय तक कांग्रेस का चुनाव चिन्ह भी रहा. ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड लांसडाउन ने टिप्पणी की थी कि गो-संरक्षण आंदोलन ने कांग्रेस को एक साधारण बहस करने वाली संस्था से एक वास्तविक राजनीतिक शक्ति में बदल दिया था. वर्तमान समय में, जब भी भाजपा किसी राज्य में सत्ता में आती है, तो गोवध विरोधी कानूनों को और अधिक कठोर बनाना उसकी प्राथमिकता होती है. उदाहरण के लिए, गुजरात के 2017 के कानून में उम्रकैद का प्रावधान है, जिसके तहत 2025 में तीन लोगों को सजा भी सुनाई गई.
लेखक प्राचीन धार्मिक ग्रंथों और इतिहासकारों के तर्कों के आधार पर यह स्पष्ट करते हैं कि गाय के प्रति अत्यधिक श्रद्धा के बावजूद इसे 'अनिवार्य धार्मिक प्रथा' के कड़े कानूनी पैमाने पर नहीं कसा जा सकता. इतिहासकार डी.एन. झा के अनुसार, प्राचीन धर्मशास्त्रों में खान-पान की विविधता मिलती है और गाय को पूरी तरह "पवित्र" दर्जा बहुत बाद में मिला; यहाँ तक कि ग्रंथों में गोवध को 'महापातक' (बड़ा अपराध) के बजाय 'उपपातक' (छोटा पाप) माना गया था. प्रमुख हिंदुत्व विचारक विनायक दामोदर सावरकर के विचार भी वर्तमान के कार्यकर्ताओं से भिन्न थे. दूसरी ओर, मोहम्मद हनीफ कुरैशी बनाम बिहार राज्य (1958) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि बकरा-ईद पर गोवध करना इस्लाम की कोई अनिवार्य प्रथा नहीं है. ऐतिहासिक रूप से बाबर और जहांगीर जैसे मुस्लिम शासकों ने भी हिंदुओं और जैनियों की भावनाओं का सम्मान करते हुए पशु वध पर प्रतिबंध लगाए थे. संविधान सभा की बहसों के दौरान भी कई मुस्लिम सदस्यों ने इसे नीति निर्देशक सिद्धांतों में रखने के बजाय मौलिक अधिकारों में शामिल कर स्पष्ट प्रतिबंध लगाने की वकालत की थी. अंततः डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने इसे संविधान के अनुच्छेद 48 के तहत गैर-वादयोग्य नीति निर्देशक सिद्धांतों का हिस्सा बनाया.
पशुगणना के आंकड़े और कड़े कानूनों की विफलता
लेख का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पशुगणना के आंकड़ों के माध्यम से कड़े कानूनों की विफलता को प्रमाणित करता है. आंकड़ों के अनुसार, 1951 के बाद से देश में गायों की आबादी में केवल 49.63% की वृद्धि हुई है, जबकि इसके विपरीत बिना संरक्षण वाली भैंसों की आबादी 153.8% और मादा भैंसों की संख्या 161.9% तक बढ़ गई है.
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सख्त कानूनों के बावजूद 'गो-पट्टी' (काउ-बेल्ट) वाले राज्यों में नर मवेशियों (बैल/सांड) की संख्या में भारी गिरावट आई है—गुजरात में 38.3%, महाराष्ट्र में 31.4% और उत्तर प्रदेश में 58.27% की कमी देखी गई. इसके ठीक विपरीत, पश्चिम बंगाल में (जहाँ कड़े कानून नहीं थे) यह गिरावट केवल 22.8% थी. सख्त कानूनों के कारण उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के किसान गायों के बजाय भैंस पालन की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे वहां मवेशी-भैंस का अनुपात 1997 के 105:100 से गिरकर 2019 में 56:100 रह गया. वहीं बंगाल में यह अनुपात 144:1 से बढ़कर 295:10 हो गया. यह स्पष्ट करता है कि केवल कागजी कानून बनाने से गायों का संरक्षण संभव नहीं है.
मवेशियों की आबादी चक्रवृद्धि रूप से बढ़ती है. एक गाय लगभग तीन साल में पहले बछड़े को जन्म देती है और हर 14-16 महीने में पुनः बच्चे देती है. यदि किसी भी मवेशी का वध न किया जाए, तो जैविक पूर्वानुमान मॉडल के अनुसार 5 वर्षों में उनकी आबादी 2.5 से 3 गुना बढ़ जाएगी. भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और चारे की भारी कमी को देखते हुए इतनी बड़ी संख्या को पालना आर्थिक रूप से पूरी तरह असंभव और टिकाऊ नहीं है.
जब किसानों को अनुत्पादक मवेशियों को हटाने की कानूनी स्वतंत्रता होती है, तो वे अपनी आजीविका और अन्य पारिवारिक खर्चों (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, विवाह) के लिए अतिरिक्त धन अर्जित करते हैं. उदाहरण के लिए, 2012 से 2019 के बीच पश्चिम बंगाल के किसानों ने मवेशियों की वैध बिक्री से लगभग ₹35,000 करोड़ की अतिरिक्त आय अर्जित की. इसके विपरीत, जिन राज्यों में सख्त कानून हैं, वहां भी किसानों ने मवेशी बेचे (जो उनकी घटती आबादी से सिद्ध होता है), परंतु अवैध मार्ग, बिचौलियों और रिश्वतखोरी के कारण उन्हें बहुत कम दाम मिले. इस प्रकार ये कानून कसाइयों को नहीं, बल्कि सीधे गरीब किसानों को आर्थिक चोट पहुँचाते हैं.
लेख में के.एस. पुट्टास्वामी (2017) के ऐतिहासिक निजता के फैसले का संदर्भ दिया गया है, जिसमें न्यायमूर्ति चेलमेश्वर और न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने स्पष्ट किया था कि कोई व्यक्ति क्या खाता है या क्या पहनता है, यह उसका व्यक्तिगत मामला है और संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार) के तहत निजता का हिस्सा है, जिसमें राज्य को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.
लेखक अंत में सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देने की वकालत करते हैं. राजनीतिक विवादों से बचने के लिए बंगाल के मुसलमानों ने समझदारी दिखाते हुए ईद पर गोवध से परहेज किया है. जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मौलाना अरशद मदनी ने भी गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग की है. लेखकों का निष्कर्ष है कि सांप्रदायिक नफरत को रोकने और मवेशियों की वास्तविक सुरक्षा के लिए पूरे भारत के मुसलमानों को एक ऐसे केंद्रीय कानून का समर्थन करना चाहिए जो गोवध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए और विशेष रूप से मुनाफाखोरी के लिए गाय बेचने वालों को कड़ी सजा दे.
(फैजान मुस्तफा, चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, पटना, बिहार के कुलपति हैं और अब्दुल समद, पूर्व डीन, मुंबई वेटरनरी कॉलेज हैं)

