'द रिपोर्टर्स कलेक्टिव' में मेहर कौर, दीक्षा कोइराला और निदा फातिमा मोमिन की रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान में भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान करीब 8.75 लाख मतदाताओं को मृत घोषित किया था. हालांकि, राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग (एसईसी) ने इनमें से 1,82,440 लोगों को पंचायत चुनावों की मतदाता सूची में जीवित और मतदान के योग्य पाया है. इसका मतलब है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों की मतदाता सूची से मृत बताकर हटाए गए ये लोग पंचायत चुनावों में मतदान कर सकते हैं.
दो आयोगों की मतदाता सूचियों में बड़ा अंतर
ईसीआई ने अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच राजस्थान में एसआईआर की प्रक्रिया पूरी की थी. इसके परिणामस्वरूप राज्य की मतदाता सूची से कुल करीब 32.31 लाख नाम हटाए गए. दिसंबर 2025 में राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग ने भी पंचायत चुनावों के लिए मतदाता सूची के पुनरीक्षण की घोषणा की थी.
दोनों आयोग अलग-अलग चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार करते हैं. ईसीआई लोकसभा और विधानसभा चुनावों की जिम्मेदारी संभालता है, जबकि एसईसी पंचायत और नगर निकाय चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार करता है. दोनों की सूचियां अलग-अलग होती हैं, लेकिन उनमें पात्र मतदाताओं के नाम समान होने चाहिए.
'द रिपोर्टर्स कलेक्टिव' ने ईसीआई की एसआईआर प्रक्रिया के तहत तैयार अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और दोहरी प्रविष्टि (एएसडीडी) सूची की तुलना पंचायत मतदाता सूची से की. इस विश्लेषण में 1,82,440 ऐसे लोग मिले, जिन्हें ईसीआई ने मृत घोषित कर दिया था, लेकिन पंचायत की मतदाता सूची में उनके नाम मौजूद थे.
लगभग एक ही समय पर पूरा हुआ दोनों सूचियों का पुनरीक्षण
दोनों आयोगों ने स्वतंत्र रूप से, लेकिन लगभग एक ही समय पर मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया था. ईसीआई ने 21 फरवरी 2026 को अपनी प्रक्रिया पूरी की और इसके चार दिन बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने भी अपना पुनरीक्षण समाप्त कर दिया. पंचायत की प्रारूप मतदाता सूची ईसीआई द्वारा मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित या दोहरी प्रविष्टि वाला बताकर मतदाताओं के नाम केंद्रीय सूची से हटाए जाने के बाद प्रकाशित की गई थी.
जांचकर्ताओं ने अक्टूबर 2026 में दोनों आयोगों के डेटाबेस डाउनलोड करके उनका विश्लेषण किया. उस समय राजस्थान में चार चरणों में पंचायत चुनाव के लिए मतदान शुरू हो चुका था. मतदान शुरू होने से पहले मतदाता सूचियां अंतिम रूप से बंद कर दी जाती हैं.
इस पड़ताल में दो चरणों में सत्यापन किया गया. पहले ईसीआई के डेटाबेस से संबंधित मतदाताओं के पहचान पत्र और ईपीआईसी नंबर लेकर पंचायत मतदाता सूची में उनका मिलान किया गया. इसके बाद इन मतदाताओं में से कुछ के ईपीआईसी नंबर राज्य निर्वाचन आयोग के अलग ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज करके उनकी जानकारी का दोबारा सत्यापन किया गया. इस पोर्टल पर ईपीआईसी नंबर डालने से संबंधित मतदाता का विवरण सामने आता है.
गढ़ी में सबसे अधिक 4,889 मतदाता जीवित पाए गए
ईसीआई की सूची में मृत घोषित किए गए ऐसे मतदाताओं की सबसे अधिक संख्या गढ़ी विधानसभा क्षेत्र में मिली. यहां 4,889 लोगों को ईसीआई ने मृत बताया था, जबकि राज्य निर्वाचन आयोग की पंचायत मतदाता सूची में वे जीवित और वैध मतदाता के रूप में दर्ज थे. सिरोही विधानसभा क्षेत्र में भी ऐसे 4,624 मतदाता मिले.
यदि ये लोग वास्तव में जीवित हैं, तो वे पंचायत चुनावों में मतदान कर सकते हैं, लेकिन ईसीआई की सूची से नाम हटने के कारण लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अपने प्रतिनिधियों को चुनने के अधिकार से वंचित हो सकते हैं.
अजमेर के किशनगढ़ विधानसभा क्षेत्र की 26 वर्षीय शालू डोलिया इसका एक उदाहरण हैं. ईसीआई की एएसडीडी सूची में उन्हें मृत घोषित किया गया है, जबकि पंचायत मतदाता सूची में उनका नाम मौजूद है.
हालांकि, जांचकर्ताओं ने इन मतदाताओं का जमीनी स्तर पर सत्यापन नहीं किया. इसलिए उन्होंने यह दावा नहीं किया कि दोनों आयोगों में से किसकी सूची सही है. उनके निष्कर्ष दोनों आयोगों के उपलब्ध आंकड़ों के मिलान पर आधारित हैं.
बीएलओ ने मतदाता सूची में विसंगति से किया इनकार
पड़ताल के दौरान तीन बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) से संपर्क किया गया. इनमें से एक ने बात नहीं की. ईसीआई के एसआईआर से जुड़े एक बीएलओ ने दावा किया कि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, जिसका नाम एसआईआर में हटाया गया हो, लेकिन वह पंचायत मतदाता सूची में मौजूद हो. उन्होंने कहा, 'ऐसा तो कोई नहीं है जिसका नाम एसआईआर में कट गया हो.' लोटियाना ग्राम पंचायत के बीएलओ ने भी मतदाताओं के नाम हटाए जाने से जुड़ी ऐसी विसंगति से इनकार किया. हालांकि, दोनों मतदाता सूचियों के मिलान में उनके दावों के विपरीत आंकड़े सामने आए.
ईसीआई के बाद के अपडेट का सत्यापन नहीं हो सका
एसआईआर पूरा होने के बाद भी ईसीआई ने अपनी मतदाता सूची को हर महीने अपडेट किया है, हालांकि इन बदलावों की संख्या कम रही. जांचकर्ता इन बाद के अपडेट का विश्लेषण नहीं कर सके, क्योंकि ईसीआई ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि पहले मृत घोषित कर मतदाता सूची से हटाए गए किसी व्यक्ति को बाद में जीवित मानकर दोबारा शामिल करने पर उसका पुराना मतदाता पहचान पत्र नंबर बदला जाता है या नहीं.
दोनों आयोगों की सूचियों में यह अंतर इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनका पुनरीक्षण लगभग एक ही समय पर पूरा हुआ था. यदि दोनों प्रक्रियाओं के बीच लंबा समय होता, तो कोई भी आयोग यह तर्क दे सकता था कि इस दौरान जमीनी स्थिति बदल गई. लेकिन यहां दोनों आयोगों ने लगभग एक साथ अपनी प्रक्रिया पूरी की थी.
इस विसंगति को लेकर जांचकर्ताओं ने ईसीआई और राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग को विस्तृत सवाल भेजे, लेकिन खबर प्रकाशित होने तक दोनों आयोगों की ओर से कोई जवाब नहीं मिला.

