पश्चिम बंगाल चुनाव कानूनी रूप से वैध नहीं हैं: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने आरोप लगाया है कि पश्चिम बंगाल चुनाव कानूनी रूप से वैध नहीं थे. उन्होंने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग में फैसले बहुमत के आधार पर लिए जाने चाहिए.

कुरैशी ने कहा, "क्या पश्चिम बंगाल चुनाव कानूनी रूप से वैध थे? मेरी राय में, यह वैध नहीं था. मैंने यह कई बार कहा है और मैं इसे फिर से कहूंगा. अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष है; मुझे उम्मीद है कि वे (कोर्ट) सही निर्णय लेंगे." उन्होंने आगे कहा कि इसके कुछ हिस्से वैध हो सकते हैं, लेकिन जिन स्थानों पर बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं को हटाए जाने का संदेह है, उनकी फिर से जांच की जानी चाहिए और यदि आवश्यक हो तो वहां फिर से मतदान कराया जाना चाहिए.

श्रबना चटर्जी की रिपोर्ट के अनुसार, कुरैशी के आरोपों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मंत्री दिलीप घोष ने कहा, "यह सरकार 6-7 महीनों से सत्ता में है. जनता खुश है. लेकिन कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं, शायद इसलिए क्योंकि उन्हें वह परिणाम नहीं मिला जिसकी वे उम्मीद कर रहे थे." उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि जनता के जनादेश और सरकार के चयन को स्वीकार करना ही सही निर्णय है; अन्यथा इसका विरोध करने वालों के लिए आगे की राह "कठिन" होगी.

यह बयान पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा गुरुवार (5 नवंबर 2026) को कोलकाता में हाशिम अब्दुल हलीम मेमोरियल लेक्चर में अपना मुख्य भाषण देने के दौरान पश्चिम बंगाल चुनावों में एसआईआर प्रक्रिया और विसंगतियों के खिलाफ आरोप लगाने के बाद आया है.

कुरैशी ने कहा, "मुख्य चुनाव आयुक्त स्वयं निर्वाचन आयोग नहीं हैं.  नियम पहले सर्वसम्मति से निर्णय लेने का आह्वान करते हैं. यदि वह संभव न हो, तो निर्वाचन आयोग के तीनों सदस्यों के बीच बहुमत-आधारित निर्णय होना चाहिए." उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले निर्वाचन आयोग नहीं होते हैं, और केवल उनका निर्णय अंतिम नहीं हो सकता.

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने यह टिप्पणी 'द इंडियन एक्सप्रेस' की उस रिपोर्ट के संदर्भ में की, जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा कथित रूप से एकतरफा लिए गए विभिन्न निर्णयों पर कम से कम 14 आपत्तियां उठाई थीं.

इस बीच, कुरैशी ने यह भी कहा कि मतदाता को अपने मताधिकार की भीख नहीं मांगनी पड़ती; बल्कि अतीत की परंपरा यह सुनिश्चित करती थी कि वोटर कार्ड प्रत्येक मतदाता के घर तक पहुंचाए जाएं, और उन्हें मतदाता सूची में शामिल होने के लिए मिन्नतें न करनी पड़ें. उन्होंने आरोप लगाया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का उपयोग नागरिकता की चोर दरवाजे से जांच करने की प्रक्रिया के रूप में किया गया था.

कुरैशी ने आगे कहा, "यह न तो सुगम था और न ही पारदर्शी. इतने सारे सवाल उठाए गए जो वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में सुने जा रहे हैं.  अब, जब उनका फैसला आएगा तो चीजें स्पष्ट रूप से सामने आएंगी कि क्या गलत था और क्या सही."

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