दिल्ली में हटाए गए मतदाताओं से कहा जा रहा है: खुद को नया मतदाता घोषित करें, फिर 2002 की सूची से जोड़ें

‘आर्टिकल-14’ में फातिमा खान की रिपोर्ट के अनुसार, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के बाद दिल्ली में लाखों लोगों को दोबारा नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 भरना पड़ रहा है. यह फॉर्म पहली बार मतदाता बनने वालों के लिए है, जिसमें आवेदक को घोषणा करनी होती है कि वह पहली बार मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर रहा है. दशकों से मतदान करते आए लोगों को ऐसी घोषणा करने के लिए मजबूर होना कानूनी जोखिम और प्रशासनिक अनिश्चितता पैदा कर रहा है. इसके अलावा, उन्हें अपना या अपने माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम 2002 की मतदाता सूची से जोड़ने के लिए दस्तावेज भी जुटाने पड़ रहे हैं.

दशकों से मतदान करने वालों के नाम सूची से गायब

दिल्ली के ओखला निवासी 47 वर्षीय मोहम्मद अशरफ ने 18 वर्ष की उम्र से नगर निकाय, विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मतदान किया है. उन्होंने 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी वोट दिया था. इसके बावजूद 31 अगस्त 2026 को प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची में उनका नाम नहीं था.

18 अक्टूबर को ओखला में विभिन्न नागरिक संगठनों द्वारा लगाए गए शिविर में अशरफ को बताया गया कि मतदाता सूची में नाम वापस जुड़वाने के लिए उन्हें फॉर्म-6 भरना होगा. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मरम्मत का काम करने वाले अशरफ ने अनिच्छा के बावजूद फॉर्म भरा. उनका कहना था कि दशकों तक मतदान करने के बाद अब उन्हें यह घोषित करना पड़ रहा है कि वह पहली बार मतदाता बन रहे हैं.

स्वयंसेवक तरुण त्यागी के मुताबिक, चुनाव आयोग ने दूसरा विकल्प नहीं दिया है. घोषणा पर हस्ताक्षर नहीं करने की स्थिति में फॉर्म स्वीकार नहीं किया जाएगा.

चुनाव आयोग का विशेष अभियान और 2002 की सूची की शर्त

चुनाव आयोग ने 1 अक्टूबर 2026 को एसआईआर के दौरान हटाए गए मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने के लिए विशेष अभियान की घोषणा की थी. आयोग ने दिल्ली हाई कोर्ट को भी बताया कि फॉर्म-6 के माध्यम से नाम बहाल किए जा सकते हैं.

लेकिन दिल्ली में इस फॉर्म के साथ अतिरिक्त घोषणा भी जुड़ी है. आवेदकों को बताना होता है कि उनका, उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम 2002 की मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं. कई गरीब, वंचित और बेघर लोगों के पास पुराने दस्तावेज नहीं हैं, जिनसे यह संबंध साबित किया जा सके.

‘आर्टिकल-14’ के अनुसार, दिल्ली के 1.451 करोड़ मतदाताओं में से 47.7 लाख के नाम मसौदा सूची से बाहर थे. इन्हें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरे नाम वाले मतदाताओं के रूप में चिह्नित किया गया था. कुछ मामलों में सत्यापन फॉर्म प्राप्त नहीं होने के कारण भी नाम सूची में शामिल नहीं हुए.

चुनाव आयोग ने उन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा हटा दी, जहां पुनरीक्षण पूरा हो चुका था. लेकिन दिल्ली में प्रक्रिया जारी होने के कारण यह शर्त लागू रही. रिपोर्ट के मुताबिक, पहले से मतदान कर चुके लोगों को नए मतदाता की तरह आवेदन करने की समस्या सितंबर से ही सामने आ रही थी. आयोग द्वारा कुछ नेताओं और अधिकारियों के नाम बहाल किए जाने के बाद प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल उठे.

गलत घोषणा पर मुकदमे का खतरा

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने कहा कि फॉर्म-6 नए मतदाताओं के लिए है और पुराने मतदाताओं से इसे भरवाना कानूनी समस्या पैदा कर सकता है. संवैधानिक कानून विशेषज्ञ और वकील गौतम भाटिया के अनुसार, गलत घोषणा करना जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत अपराध हो सकता है, जिसमें एक वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है.

हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने एक मामले में फॉर्म-6 भरने को लेकर मतदाता की आशंका को अनुचित बताया था. भाटिया ने इस दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी सरकारी प्राधिकरण का आश्वासन कानून में लिखे प्रावधानों को निष्प्रभावी नहीं कर सकता. सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित फॉर्म-6 को न तो मंजूरी दी है और न ही उसे खारिज किया है.

पुराने मतदाता रिकॉर्ड का क्या होगा?

हैदराबाद के ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता शेख सलाउद्दीन ने कहा कि चार राष्ट्रीय और राज्य चुनावों में मतदान करने के बावजूद उनका पुराना रिकॉर्ड मिट गया है. 45 वर्षीय गृहिणी परवीन बेगम ने भी सवाल उठाया कि पिछले चुनावों की मतदाता पर्चियां होने के बावजूद उन्हें नए मतदाता की तरह आवेदन क्यों करना पड़ रहा है.

76 वर्षीय एस.आर. अंसारी अपने 47 वर्षीय बेटे का नाम दोबारा जुड़वाने की जानकारी लेने शिविर पहुंचे. उनका बेटा दुबई में रहता है, लेकिन भारतीय नागरिक और मतदाता है. वहीं, 48 वर्षीय मोहम्मद नईमुद्दीन, जो 1996 से मतदान कर रहे हैं, ने नए मतदाता की घोषणा करने से इनकार करते हुए कानूनी विकल्प अपनाने की बात कही.

वैकल्पिक घोषणापत्र और समयसीमा

वोटर अधिकार मंच जैसे संगठन फॉर्म-6 के साथ अलग स्व-घोषणा पत्र लगाने की तैयारी कर रहे हैं. इसमें आवेदक अपना मतदाता पहचान पत्र नंबर, पहले मतदान करने का विवरण और उन चुनावों की जानकारी दे सकता है, जिनमें उसने वोट दिया है. कुछ बूथ स्तरीय अधिकारी पुराने मतदाता पहचान पत्रों की प्रतियां भी संलग्न करवा रहे हैं. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि निर्वाचन अधिकारी इन अतिरिक्त दस्तावेजों और घोषणाओं को स्वीकार करेंगे या नहीं.

दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की 16 अक्टूबर की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, दावे और आपत्तियों की अवधि शुरू होने के बाद 2.3 लाख से अधिक फॉर्म-6 प्राप्त हुए थे. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक, जमा किए गए 4.5 लाख फॉर्म में से केवल 0.27 प्रतिशत पर ही निर्णय हुआ था. मतदाता सूची में नाम शामिल कराने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर है.

महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने भी चुनाव आयोग से फॉर्म-6 में पहली बार मतदाता होने की घोषणा हटाने का अनुरोध किया है.

रिपोर्ट का केंद्रीय सवाल यह है कि जिन नागरिकों ने वर्षों तक मतदान किया है, उन्हें अपना मताधिकार वापस पाने के लिए पहली बार मतदाता होने की घोषणा क्यों करनी पड़ रही है. दस्तावेजों की कमी, धीमी प्रक्रिया और कानूनी अनिश्चितता के बीच सबसे बड़ा खतरा यह है कि पात्र मतदाता समयसीमा के भीतर अपना नाम दोबारा सूची में शामिल नहीं करा पाएं.

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