मनु जोसेफ | 2014 के बाद भाजपा सबसे गंभीर मुसीबत में

‘लाइव मिंट’ में मनु जोसेफ का यह लेख भारत में शिक्षा, रोज़गार और युवाओं के बीच बने पारंपरिक 'सामाजिक समझौते' के टूटने तथा इसके कारण भारतीय जनता पार्टी के सामने उत्पन्न अभूतपूर्व राजनीतिक संकट का गहन विश्लेषण करता है.

लेख का सारांश कहता है कि दशकों से भारत में युवाओं और व्यवस्था के बीच एक अलिखित समझौता था—प्रवेश परीक्षाएं पास करो और एक सुरक्षित व बेहतर जीवन हासिल करो. यह एक प्रकार से "उम्मीदों का निजीकरण" था, जिसके तहत युवाओं ने अपनी जवानी कठिन परीक्षाओं की तैयारी में बिता दी. हालाँकि, परीक्षा में धांधली और प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं ने इस विश्वास को पूरी तरह झकझोर दिया है.

लेखक के अनुसार, असली समस्या केवल पेपर लीक या नौकरियों की कमी नहीं है, बल्कि यह है कि उच्च शिक्षा स्वयं एक असत्य धारणा पर टिकी है. ऐतिहासिक रूप से, उच्च शिक्षा ने नौकरियां इसलिए नहीं दिलाईं कि लोग शिक्षित थे, बल्कि इसलिए दिलाईं क्योंकि यह समाज में मौजूद असमानता के बीच एक "कृत्रिम फ़िल्टर" का काम करती थी. अब जब शिक्षा का विस्तार हुआ है और अधिक लोग इसे प्राप्त कर रहे हैं, तो नियोक्ताओं के पास इतनी नौकरियां ही नहीं हैं.

सरकार का यह मानना कि संस्थानों और डिग्रियों की संख्या बढ़ाने से रोज़गार पैदा होंगे, एक भ्रम साबित हुआ है. आज लाखों स्नातक बेरोज़गार हैं क्योंकि विशेषज्ञता हमेशा असमान समाज का उप-उत्पाद रही है. यहाँ तक कि कॉर्पोरेट और तकनीकी नौकरियों में भी केवल डिग्री नहीं, बल्कि सामाजिक पृष्ठभूमि, रूप-रंग और आत्मविश्वास जैसे वर्ग-आधारित गुण मायने रखते हैं.

पुरानी व्यवस्था में एलीट वर्ग डिग्रियां हासिल कर आगे बढ़ जाता था और सीमित अवसरों पर उनका कब्ज़ा रहता था. लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और उच्च शिक्षा के सर्वव्यापी प्रचार ने अब एक ऐसा दौर ला दिया है जहाँ बहुत से लोग 'योग्य' हो चुके हैं. इसके परिणामस्वरूप, जो 10% लोग सफल भी हुए हैं, उनका मोहभंग भी एक बड़ी सामाजिक व राजनीतिक उथल-पुथल का रूप ले रहा है.

प्रदर्शन, दमन और बीजेपी की बदलती छवि

जब युवाओं ने परीक्षा धांधली और अनिश्चित भविष्य को लेकर सड़कों पर उतरकर विरोध दर्ज कराया, तो सरकार ने हमेशा की तरह कठोर बल प्रयोग और दमन की नीति अपनाई. लेकिन इस बार इसका विपरीत असर पड़ा. भारतीय समाज अपने बच्चों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है. वे बुनियादी सुविधाओं या खराब बुनियादी ढाँचे को सहन कर सकते हैं, लेकिन अपने बच्चों के भविष्य पर मँडराते खतरे को बर्दाश्त नहीं करते. पुलिस द्वारा युवाओं पर की गई हिंसा ने अभिभावकों के दिलों को गहराई से चोट पहुँचाई है.

इसके चलते बीजेपी के सामने एक नई और बेहद खतरनाक ब्रांडिंग का संकट खड़ा हो गया है. 1990 के दशक में जहाँ पार्टी पर 'सांप्रदायिक' होने का ठप्पा लगा था, वहीं आज यह पहली बार "युवाओं की विरोधी" और बुजुर्गों के ऐसे समूह के रूप में देखी जा रही है जो नई पीढ़ी के अवसरों को नुकसान पहुँचा रहा है.

स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि लंबे समय से मौन रहने वाली हस्तियाँ भी अब सरकार की आलोचना में अपनी आवाज़ उठा रही हैं. यह सब ऐसे समय में हुआ है जब डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीयों के लिए अमेरिका भागना बहुत जोखिम भरा बना दिया है. आधुनिक भारत की यह पहली पीढ़ी है जिसके पास बाहर भागने का कोई विकल्प नहीं बचा है; उन्हें यहीं रहकर व्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में, युवाओं का यह आक्रोश और अनिश्चित भविष्य की चिंता बीजेपी के लिए 2014 के बाद का सबसे गंभीर राजनीतिक संकट बनकर उभरी है.

(मनु जोसेफ पत्रकार, उपन्यासकार और नेटफ्लिक्स सीरीज़ 'डिकुपल्ड' के निर्माता हैं)

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