वीवीपी शर्मा | जंतर-मंतर पर अपनी आवाज़ धीमी करने को तैयार नहीं थीं ये युवा महिलाएं

मैंने वर्षों में इतने विरोध प्रदर्शन देखे हैं कि इतना तो जानता हूं कि यह आंदोलन कुछ अलग था. मुझे ऐसा कोई दूसरा छात्र आंदोलन याद नहीं आता, जिसमें युवा महिलाओं ने सिर्फ भीड़ की संख्या नहीं, बल्कि पूरे आंदोलन का मिजाज भी तय किया हो.

आपने उन्हें टेलीविजन पर देखने से पहले अपने फोन की स्क्रीन पर देखा. एक लड़की, जो मुश्किल से अपनी किशोरावस्था से बाहर निकली होगी, सीधे कैमरे में देखते हुए हंस रही थी और सरकार पर ऐसी भाषा में तीखे हमले कर रही थी, जिसे हमारा तथाकथित सभ्य समाज महिलाओं के लिए स्वीकार्य नहीं मानता. दूसरी लड़की बेहद सहजता से समझा रही थी कि छात्रों ने जंतर-मंतर पर कब्जा क्यों जमाया है. कोई मंत्री का मजाक उड़ा रही थी. इनमें से कोई भी इस बात को लेकर झिझकती हुई नहीं दिखी कि लोग उनके बारे में क्या सोचेंगे.

कॉकरोच आंदोलन को उसकी भीड़, व्यंग्य, पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक असर के लिए याद किया जाएगा. लेकिन इसकी सबसे लंबे समय तक याद रहने वाली तस्वीरों में वे युवा महिलाएं भी होंगी, जो हाथों में फोन लिए सब कुछ रिकॉर्ड कर रही थीं, समझा रही थीं, मजाक कर रही थीं और बहस कर रही थीं.

महिलाओं ने पहले भी आंदोलनों का नेतृत्व किया है. भारत ने ऐसा कई बार देखा है. लेकिन यह कुछ अलग था.

जंतर-मंतर पर युवा महिलाएं आंदोलन की सबसे दिखाई देने वाली आयोजकों, टिप्पणीकारों और कहानी कहने वालों में शामिल थीं. वे आंदोलन की बातचीत को दिशा दे रही थीं. रील्स स्क्रॉल कीजिए और वे हर जगह दिखाई देती हैं. एक लड़की प्रिवेंटिव डिटेंशन यानी एहतियाती हिरासत का मतलब समझाने की कोशिश कर रही थी, जबकि कैमरे के पीछे उसकी सहेलियां लगातार हंस रही थीं और बीच में टोक रही थीं. दूसरी एक बर्तन में चाय चलाते हुए मजाक कर रही थी कि सरकार ने छात्रों को इसलिए कम आंका क्योंकि उसने कभी हॉस्टल की रसोई नहीं देखी. तीसरी ने एक मंत्री को गाली दी, फिर सीधे कैमरे में देखा और खुद अपनी बात पर जोर से हंस पड़ी.

वहां हास्य था. बेपरवाही थी.

कई पोस्टर ऐसे लग रहे थे, जैसे उन्हें उन लोगों ने बनाया हो जिन्होंने छात्र संघ के दफ्तरों से ज्यादा वक्त इंस्टाग्राम पर बिताया है. किसी पोस्टर पर भगत सिंह का उद्धरण था, तो कोई पूरी तरह जेन-ज़ी के कटाक्ष से भरा था. आंदोलन के भाषण जितनी तेजी से फैल रहे थे, उसके मजाक भी लगभग उतनी ही तेजी से लोगों तक पहुंच रहे थे.

लेकिन कई लोगों को सबसे ज्यादा हैरानी हास्य से नहीं हुई. छात्र राजनीति कभी शालीन भाषा के लिए नहीं जानी गई. हैरानी इस बात की थी कि युवा महिलाएं ठीक उसी तरह बोल रही थीं, जैसे वे बोलना चाहती थीं. उन्हें इसकी चिंता नहीं थी कि उनकी भाषा “लड़कियों जैसी” या “शालीन” लग रही है या नहीं. कुछ ने गालियां दीं. कुछ ने खुलेआम मंत्रियों का मजाक उड़ाया. कुछ ने मुस्कुराते हुए टेलीविजन एंकरों को खारिज कर दिया. इसके बाद जो नाराजगी सामने आई, वह अपने आप में बहुत कुछ कहती थी. कई आलोचकों, खासकर दक्षिणपंथी खेमे के लोगों के लिए, इन महिलाओं की भाषा उस मुद्दे से ज्यादा आपत्तिजनक लग रही थी, जिसके लिए वे प्रदर्शन कर रही थीं.

उन रील्स को देखते हुए मेरा ध्यान उनकी भाषा से ज्यादा उनकी झिझक की गैरमौजूदगी पर गया. भारतीय सार्वजनिक जीवन का बड़ा हिस्सा आज भी महिलाओं से उम्मीद करता है कि वे अपना हर शब्द नाप-तौलकर बोलें. इन महिलाओं ने ऐसा नहीं किया. वे हंसीं, उन्होंने मजाक उड़ाया और जब मन हुआ तो गालियां भी दीं. उन्होंने इस चिंता को पीछे छोड़ दिया था कि उन्हें “सभ्य” दिखाई देना है.

आज उन रील्स को देखिए तो एक और बात साफ नजर आती है. उनमें हंसी है, थकान है, बहस है, गाने हैं, अफवाहें हैं और डर भी है. लेकिन उनमें एक ऐसी चीज भी दर्ज है, जिसे टेलीविजन अक्सर नहीं पकड़ पाता—किसी आंदोलन की रोजमर्रा की जिंदगी.

जब पुलिस ने कार्रवाई शुरू की, तो वही महिलाएं जो दोपहर तक मजाक और इंटरव्यू रिकॉर्ड कर रही थीं, अचानक लाठीचार्ज, हिरासत और अफरातफरी को कैमरे में कैद करने लगीं. प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर दुर्व्यवहार और अपमानजनक व्यवहार के आरोप लगाए. लेकिन उनमें से कई अगले दिन फिर लौट आईं. हाथों में दोबारा फोन थे और वे फिर हर चीज रिकॉर्ड कर रही थीं.

जंतर-मंतर की ये महिलाएं उस पीढ़ी से आती हैं, जिसने निर्भया देखा, फिर कठुआ, फिर हाथरस और फिर मणिपुर. राजनीति में आने से बहुत पहले उन्होंने समझ लिया था कि महिलाओं के लिए सार्वजनिक जगहों का क्या अर्थ हो सकता है.

जानबूझकर या सहज रूप से, वे इस पारंपरिक अपेक्षा से बेपरवाह दिखीं कि महिलाओं को सार्वजनिक रूप से कैसे बोलना चाहिए. वे ऐसे बोल रही थीं, मानो उन्हें पहले से मालूम हो कि यह जगह उनकी भी है.

और यह सिर्फ भारत में नहीं हो रहा है. चिली से ईरान और हाल के वर्षों में बांग्लादेश तक, युवा महिलाएं विरोध आंदोलनों के सबसे रचनात्मक चेहरों में शामिल हुई हैं. राजनीति अलग है, इतिहास अलग है, लेकिन एक पैटर्न बार-बार दिखाई देता है—युवा महिलाएं हास्य, व्यंग्य और सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ आंदोलनों का प्रचार करने के लिए नहीं, बल्कि उनका स्वरूप तय करने के लिए भी कर रही हैं.

मुद्दा यह नहीं है कि वे पुरुष प्रदर्शनकारियों से ज्यादा बहादुर थीं या नहीं. मुद्दा यह है कि उन्होंने बदल दिया कि यह आंदोलन दिखता कैसा था और सुनाई कैसा देता था.

(लेखक वीवीपी शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं) 

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