जेन जी के मतदान अधिकार अटके, जनवरी 2024 से विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण ठप

'इकोनॉमिक टाइम्स' में अनुभूति बिश्नोई ने लिखा है कि भारत निर्वाचन आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्तों के बीच मतदाता सूचियों के वार्षिक पुनरीक्षण को लेकर मतभेद के कारण 2026-27 के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (एसएसआर) में देरी हो रही है. इसका सीधा असर उन युवाओं पर पड़ सकता है जो 18 वर्ष की उम्र पूरी कर चुके हैं और पहली बार मतदाता बनने के पात्र हैं.

दशकों से राज्यों में अंतिम मतदाता सूची जनवरी के पहले सप्ताह में प्रकाशित होती रही है. लेकिन 2024 के बाद से वार्षिक एसएसआर की प्रक्रिया दोबारा शुरू नहीं हो सकी है. 2025 में बिहार से शुरू हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद कई राज्यों में इसी प्रक्रिया को प्राथमिकता दी गई और वार्षिक एसएसआर पीछे चला गया.

दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने एसएसआर को दोबारा शुरू करने की आवश्यकता पर जोर दिया है. इस मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ने इस वर्ष कानूनी राय भी मांगी थी कि एसआईआर के बीच एसएसआर कराना आवश्यक है या नहीं. कानूनी सलाह मिलने के बाद दोनों चुनाव आयुक्तों ने निर्वाचन आयोग के अपने मतदाता सूची मैनुअल के आधार पर एसएसआर फिर शुरू करने की आवश्यकता पर अपना रुख स्पष्ट किया.

18 साल के नए मतदाताओं के लिए क्यों जरूरी है एसएसआर

एसएसआर का उद्देश्य हर वर्ष 18 वर्ष की उम्र पूरी करने वाले युवाओं को मतदाता सूची में शामिल करना है. इसके अलावा इस प्रक्रिया के दौरान फोटो मतदाता सूचियों को अपडेट करने और नामों या अन्य विवरणों में विसंगतियों की जांच भी की जाती है.

पहले मतदाता बनने के लिए केवल 1 जनवरी को कटऑफ तारीख माना जाता था. इसका मतलब था कि 1 जनवरी के बाद जन्म लेने वाले व्यक्ति को मतदाता बनने के लिए लगभग एक वर्ष इंतजार करना पड़ सकता था. अब साल में चार कटऑफ तारीखें हैं—1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्टूबर. इससे 18 वर्ष की उम्र पूरी करने वाले युवाओं को साल में कई अवसर मिलते हैं.

इसी कारण एसएसआर को समयबद्ध प्रक्रिया माना जाता है, ताकि अधिक से अधिक पात्र 18 वर्षीय युवाओं को मतदाता सूची में शामिल किया जा सके. 2026-27 का एसएसआर अब इसी वजह से महत्वपूर्ण हो गया है.

पूरी प्रक्रिया अस्त-व्यस्त

आमतौर पर निर्वाचन आयोग मई के अंत या जून की शुरुआत तक वार्षिक एसएसआर की घोषणा करता है. इसके बाद राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को निर्देश भेजे जाते हैं और दो से तीन महीने की पूर्व-पुनरीक्षण गतिविधियां होती हैं. अगस्त के अंत से अक्टूबर की शुरुआत के बीच प्रारूप मतदाता सूची प्रकाशित होती है. इसके बाद 30 से 45 दिनों तक दावे और आपत्तियां मांगी जाती हैं.

इस बार यह पूरी प्रक्रिया निर्धारित समय के अनुसार आगे नहीं बढ़ पाई है. चुनावी राज्यों में एसएसआर को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है. उत्तराखंड और पंजाब में अभी एसआईआर चल रहा है, लेकिन उत्तर प्रदेश और गोवा जैसे राज्यों में एसआईआर पूरा हो चुका है और 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले वहां एसएसआर किया जाना जरूरी माना जा रहा है. बिहार में भी पिछले मतदाता पुनरीक्षण को एक वर्ष हो चुका है.

प्रशासनिक असर भी सामने आया

इस गतिरोध का असर निर्वाचन आयोग के प्रशासनिक कामकाज पर भी पड़ा है. 2025-26 में स्थानांतरित किए गए करीब 50 अधिकारियों, जिनमें मुख्य निर्वाचन अधिकारी और उप निर्वाचन आयुक्त भी शामिल हैं, की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट यानी एसीआर पर हस्ताक्षर नहीं हो सके हैं.

बताया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों को इन रिपोर्टों पर एक साथ हस्ताक्षर करने होते हैं. सामूहिक रूप से मंजूरी नहीं मिलने के कारण कई अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों से अलग-अलग अनुरोध करना पड़ा है. इनमें से कई एसीआर अब भी निर्वाचन आयोग की मंजूरी का इंतजार कर रही हैं.

Previous
Previous

‘सुपर अल नीनो’ से भारत में 15,800 अतिरिक्त गर्मी से मौतों का अनुमान: रिपोर्ट

Next
Next

7 दिनों में 8 ईमेल, फिर भी गोवा के वैध मतदाता सूची से बाहर: चुनाव आयोग की खामियों से भरी व्यवस्था