7 दिनों में 8 ईमेल, फिर भी गोवा के वैध मतदाता सूची से बाहर: चुनाव आयोग की खामियों से भरी व्यवस्था
'द इंडियन एक्सप्रेस' में रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा में 97 ऐसे मतदाता, जिन्हें स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच के बाद मतदाता सूची में शामिल करने योग्य पाया था, अंतिम सूची से बाहर रह गए. खास बात यह है कि गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने सात दिनों के भीतर चुनाव आयोग को आठ बार ईमेल भेजकर इन नामों को शामिल करने के लिए तकनीकी सुविधा उपलब्ध कराने का अनुरोध किया, लेकिन अंतिम सूची जारी होने तक समस्या का समाधान नहीं हुआ.
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची से बाहर होना गोवा में सिर्फ मतदान के अधिकार से वंचित होना नहीं है. राज्य की कुछ सरकारी योजनाओं में पात्रता तय करने के लिए मतदाता सूची में नाम होना जरूरी है.
97 मतदाताओं के नाम क्यों नहीं जुड़ पाए?
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान इन 97 मतदाताओं के नामों में चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने ‘तार्किक विसंगतियां’ चिन्हित की थीं. इसके बाद उन्हें दस्तावेज और आपत्तियां दाखिल करने का अवसर दिया गया. कुल 649 मतदाता दस्तावेजों या आपत्तियों के साथ सामने आए.
गोवा के निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों और सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों ने मामलों की सुनवाई की. 97 मामलों में उन्होंने पाया कि संबंधित मतदाता अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के योग्य हैं और पहले लिया गया नाम हटाने का फैसला वापस लिया जाना चाहिए.
17 फरवरी को, अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने से चार दिन पहले, गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने चुनाव आयोग को 97 लोगों की सूची भेजी. लेकिन समस्या यह थी कि ईसीआईनेट प्रणाली में ईआरओ के स्तर से नाम हटाने के फैसले को वापस लेने की सुविधा उपलब्ध नहीं थी. इस तकनीकी अनुमति का नियंत्रण दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के पास था.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी तकनीकी अड़चन
29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि तार्किक विसंगतियों के आधार पर चिन्हित मतदाताओं के नाम सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित किए जाएं और संबंधित लोगों को दस्तावेज या आपत्ति दाखिल करने के लिए 10 दिन का समय दिया जाए. अदालत ने चुनाव आयोग से एसआईआर वाले सभी राज्यों में इन प्रक्रियात्मक निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने को कहा था.
गोवा में यह प्रक्रिया अपनाई गई. लोगों ने दस्तावेज जमा किए और ईआरओ ने उनकी जांच की. 97 मामलों में निर्णय मतदाताओं के पक्ष में आया. लेकिन जिस सॉफ्टवेयर के माध्यम से अंतिम मतदाता सूची तैयार की जानी थी, उसमें पुराने फैसले को वापस लेने का विकल्प ही उपलब्ध नहीं था.
गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी संजय गोयल ने बताया कि इन मामलों की जानकारी चुनाव आयोग को दी गई थी. उन्होंने कहा कि नाम शामिल न करने का फैसला चुनाव आयोग के स्तर पर हुआ, जबकि ईआरओ के स्तर पर पात्र मतदाताओं को दोबारा शामिल करने की व्यवस्था होनी चाहिए थी.
7 दिनों में 8 अनुरोध, फिर भी कोई कार्रवाई नहीं
22 जनवरी से ही गोवा के अधिकारी ‘रोल बैक’ और दस्तावेज दोबारा अपलोड करने की सुविधा की मांग कर रहे थे. 11 फरवरी को गोवा इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी और तकनीकी सेवा प्रदाता को बताया कि यह सुविधा अभी तक उपलब्ध नहीं कराई गई है.
13 से 17 फरवरी के बीच गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने लगातार ईमेल भेजे और तत्काल कार्रवाई की मांग की. 18 फरवरी को चुनाव आयोग के उप निर्वाचन आयुक्त संजय कुमार ने आईटी महानिदेशक को स्पष्ट किया कि ईआरओ और सहायक ईआरओ को कानून के तहत सुधारात्मक कार्रवाई करने का अधिकार है और सूचना प्रौद्योगिकी प्रणाली सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार जरूरी कार्रवाई को नहीं रोक सकती.
इसके बावजूद 21 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित हुई और सभी 97 नाम उसमें शामिल नहीं थे. 20 सितंबर तक की जांच में भी ये सभी नाम सूची से बाहर पाए गए.
मतदाता सूची से बाहर होने की कीमत
इन 97 लोगों में 65 तलेइगांव विधानसभा क्षेत्र से हैं, जबकि बाकी सेंट क्रूज, कुम्भारजुआ, प्रियोल, मडगांव, बेनाउलिम और वेलिम क्षेत्रों से हैं.
गोवा में मतदाता सूची में नाम होना कुछ सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए भी महत्वपूर्ण है. गोवा मेडिक्लेम योजना के तहत राज्य के मतदाताओं को सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध नहीं होने वाले सुपर-स्पेशियलिटी उपचार के लिए सहायता मिलती है. इसमें डायलिसिस, एंजियोप्लास्टी, ओपन-हार्ट सर्जरी, अंग प्रत्यारोपण, कीमोथेरेपी और कॉक्लियर इम्प्लांट जैसी सुविधाएं शामिल हैं.
अंतिम सूची में नाम नहीं आने के बाद इन लोगों को नए मतदाता के रूप में फॉर्म-6 के जरिए दोबारा आवेदन करने के लिए कहा गया. इस पूरे मामले ने यह सवाल खड़ा किया है कि जब कानून के तहत अधिकार प्राप्त स्थानीय निर्वाचन अधिकारी किसी व्यक्ति को मतदाता सूची में शामिल करने का फैसला कर चुके हों, तो क्या केंद्रीकृत तकनीकी व्यवस्था उस फैसले को लागू होने से रोक सकती है.

