कथनी-करनी में अंतर: 2026 की पहली छमाही में चीन से भारत का आयात उछलकर 80 अरब डॉलर पहुंचा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे नारे दें या लाल किले की प्राचीर से स्वदेशी को प्रमोट करने का आव्हान करें, और सत्ता साकेत में बातें भले ही चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की जाती रही हों; मगर उनके नेतृत्व वाली सरकार इसके उलट काम कर रही है.
चीन के सीमा शुल्क सामान्य प्रशासन द्वारा मंगलवार (14 जुलाई, 2026) को जारी आंकड़ों के अनुसार, 2026 की पहली छमाही में चीन से भारत का आयात 21.8% बढ़कर रिकॉर्ड 79.41 अरब डॉलर पर पहुंच गया है. छह महीनों के बाद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 91.72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 23.6% अधिक है. यह 2025 के रिकॉर्ड 155.62 अरब डॉलर के व्यापारिक आंकड़े को पार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जब चीन एक बार फिर वस्तुओं के मामले में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार था.
‘द हिंदू’ में अनंत कृष्णन की रिपोर्ट है कि वर्ष की पहली छमाही के बाद व्यापार घाटा 67.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है — जो पिछले साल के रिकॉर्ड 116.12 अरब डॉलर के आंकड़े को पार करने की राह पर है — इसके बावजूद, चीन को होने वाले भारतीय निर्यात में भी मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है, जो 37.2% बढ़कर 12.31 अरब डॉलर हो गया है.
सोमवार (13 जुलाई, 2026) को जारी भारत के आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि जून 2026 के महीने में कुल व्यापार घाटा सालाना आधार पर 430% बढ़कर 15.3 अरब डॉलर हो गया. व्यापार घाटे में यह वृद्धि मर्चेंडाइज (व्यापारिक वस्तुओं) के आयात में उच्च वृद्धि और कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा सोने के आयात मूल्य में आई तेजी के कारण हुई है.
भारतीय अधिकारी चीन के साथ व्यापार घाटे की मात्रा (मात्रात्मक आकार) को लेकर उतने चिंतित नहीं हैं, जितने कि आयात की जाने वाली वस्तुओं की प्रकृति (बास्केट ऑफ गुड्स) को लेकर हैं. भारत, चीन से न केवल बड़ी मात्रा में तैयार इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य उपकरण आयात करता है, बल्कि ऐसे मध्यवर्ती सामान (इंटरमीडिएट्स) भी आयात करता है जो भारतीय विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) के लिए आवश्यक हैं और जो भारत के अपने निर्यात को बढ़ावा देते हैं.
विशेष रूप से चिंता का विषय चीन को होने वाले भारत के निर्यात की प्रकृति है, जिसमें अतीत में मुख्य रूप से जैविक रसायन (ऑर्गेनिक केमिकल्स), अयस्क (ओर्स) और समुद्री भोजन (सीफूड) जैसे कम मूल्यवर्धन (लो वैल्यू-एडेड) वाले उत्पादों का दबदबा रहा है.
इस महीने की शुरुआत में, चीन में भारत के राजदूत विक्रम दोरईस्वामी ने चीन को भारतीय निर्यात बढ़ाने की वकालत की थी, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ भारत वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी है, जैसे कि फार्मास्यूटिकल्स (दवा क्षेत्र). बीजिंग में आयोजित एक वार्षिक विदेश नीति मंच 'वर्ल्ड पीस फोरम' में बोलते हुए उन्होंने कहा, “जाहिर है, हम चीन को अधिक निर्यात करने में सक्षम होना चाहेंगे. ऐसा सुझाव देने में कुछ भी अनुचित नहीं है.”
उन्होंने आगे कहा, “हम ऐसे रास्ते कैसे खोजें जिससे भारत और चीन एक-दूसरे से जुड़ सकें, जहाँ वस्तुओं का दायरा (बास्केट ऑफ गुड्स) व्यापक हो जो दोनों पक्ष एक-दूसरे को प्रदान कर सकें? साथ ही, एक ऐसी समझ भी बने कि उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए उचित तंत्र इस तरह से लागू किए जाएं, जिससे भारत उन वस्तुओं को चीन को भी अधिक निर्यात करने में सक्षम हो सके, जिन्हें वह दुनिया के अन्य हिस्सों में निर्यात करता है.”

