जनगणना 2027: भारत की गिनती का दबाव
भारत की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना एक बार फिर देश के घर-घर तक पहुंच चुकी है. करीब 140 करोड़ लोगों की सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय तस्वीर दर्ज करने के लिए 33 लाख से अधिक प्रगणक और सरकारी कर्मचारी मैदान में हैं.
लेकिन विजैता सिंह के मुताबिक, इस विशाल कवायद के साथ कई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं. भीषण गर्मी, सुरक्षा संबंधी चिंताएं, इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या, तकनीकी खामियां और आंकड़ों में कथित बदलाव के दबाव ने जनगणना कर्मियों का काम मुश्किल बना दिया है. देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आ रहे अनुभव बताते हैं कि भारत की आबादी की गिनती केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास, तकनीकी क्षमता और सरकारी जवाबदेही की भी परीक्षा है.
एक विशाल कवायद
दिल्ली के मयूर विहार में सरकारी स्कूल शिक्षिका एम. सौमिना पिछले एक महीने से घर-घर जाकर जनगणना का काम कर रही हैं. उन्हें 17 अपार्टमेंट ब्लॉकों में फैले 150 फ्लैटों का सर्वेक्षण करना था, जहां प्रत्येक परिवार से 33 सवाल पूछे गए. मोबाइल ऐप के जरिए डेटा दर्ज करने के साथ घरों की मैपिंग और जियोटैगिंग भी की गई.
जनगणना 2027 कई मायनों में ऐतिहासिक है. यह भारत की पहली डिजिटल जनगणना है, पहली बार जातिगत आंकड़े जुटाए जाएंगे और नागरिकों को स्वयं अपनी जानकारी दर्ज करने की सुविधा भी मिलेगी. कोविड-19 महामारी के कारण 2021 में होने वाली जनगणना छह साल की देरी से हो रही है. इस वजह से सरकारें अब तक 2011 के आंकड़ों के आधार पर कई नीतियां और कल्याणकारी योजनाएं संचालित करती रही हैं.
जनगणना के पहले चरण, हाउसलिस्टिंग एंड हाउसिंग ऑपरेशंस (एचएलओ), में घरों की स्थिति, परिवार की संरचना, पानी, शौचालय, ऊर्जा स्रोत, संपत्तियों और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी जानकारी जुटाई जा रही है. यही चरण फरवरी 2027 में होने वाली जनसंख्या गणना की नींव तैयार करेगा, जिसमें जाति, धर्म और अन्य व्यक्तिगत सूचनाएं दर्ज की जाएंगी.
अजनबियों से मुलाकात
सौमिना बताती हैं कि बहुमंजिला इमारतों में रहने वाले कामकाजी लोगों तक पहुंचना सबसे कठिन काम था. अधिकांश लोग सुबह काम पर निकल जाते थे, इसलिए उन्हें कई बार सुबह जल्दी या शाम को दोबारा जाना पड़ता था. सुरक्षा कारणों से उनके पति अक्सर उनके साथ रहते थे.
उत्तर प्रदेश के रायबरेली की शिक्षिका मीनू वर्मा का अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा. उन्हें 172 घरों का सर्वेक्षण सौंपा गया था. उनका कहना है कि गांवों में लोगों को पहले जनगणना के महत्व के बारे में समझाना पड़ता था. कई लोगों को यह भी नहीं पता था कि यह प्रक्रिया क्यों की जा रही है. गर्मी के कारण दोपहर बाद गांव लगभग खाली हो जाता था और लोगों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता था.
महिला प्रगणकों का कहना है कि कई बार उन्हें अकेले दूर-दराज के इलाकों में जाना पड़ता है, जिससे सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ जाती हैं. कुछ ने सुझाव दिया कि महिला प्रगणकों को जोड़े में काम कराया जाए या उनके साथ किसी पुरुष सहकर्मी को भेजा जाए.
इस दौरान उत्पीड़न की घटनाएं भी सामने आईं. दिल्ली और बेंगलुरु में महिला प्रगणकों के साथ कथित दुर्व्यवहार और प्रवेश से रोके जाने के मामलों में पुलिस कार्रवाई हुई. कई प्रगणकों ने यह भी शिकायत की कि उन्हें ऊंची आवासीय सोसाइटियों और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों द्वारा सहयोग नहीं मिला. प्रशासन को लोगों को याद दिलाना पड़ा कि जनगणना से जुड़े सवालों का जवाब देना कानूनी दायित्व है.
डिजिटल खाई
हालांकि जनगणना को पूरी तरह डिजिटल बनाया गया है, लेकिन जमीनी स्तर पर तकनीकी चुनौतियां बनी हुई हैं. शहरों में डेटा सीधे मोबाइल ऐप में दर्ज किया जा रहा है, जबकि कई ग्रामीण इलाकों में कमजोर नेटवर्क के कारण पहले कागज पर जानकारी लिखनी पड़ती है और बाद में उसे अपलोड करना पड़ता है.
प्रगणकों का कहना है कि ऐप अक्सर क्रैश होता है और कमजोर नेटवर्क के कारण डेटा अपलोड करने में परेशानी आती है. कई जगह उन्हें अपने निजी मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना पड़ रहा है. एक बार डेटा दर्ज हो जाने के बाद उसमें संशोधन करना भी आसान नहीं होता, जिससे तकनीकी दिक्कतें और बढ़ जाती हैं.
भारत में इंटरनेट की पहुंच बढ़ी है, लेकिन जनगणना जैसे बड़े डिजिटल अभियान ने यह भी दिखाया है कि नेटवर्क की गुणवत्ता और डिजिटल बुनियादी ढांचा अभी भी कई क्षेत्रों में कमजोर है. डिजिटल व्यवस्था ने जहां डेटा संग्रह को तेज बनाया है, वहीं इसने नई चुनौतियां भी पैदा की हैं.
एफआईआर का सामना
उत्तर प्रदेश में सरकारी शिक्षकों की कमी के कारण निजी स्कूलों के शिक्षकों को भी जनगणना कार्य में लगाया गया. लेकिन कई शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन ने इसका विरोध किया और अदालतों का रुख किया. कुछ मामलों में अदालतों ने निजी स्कूलों को अंतरिम राहत भी दी.
महाराष्ट्र में भी निजी और अल्पसंख्यक स्कूलों के संगठनों ने जनगणना कार्य में अपने कर्मचारियों की तैनाती को चुनौती दी. उनका तर्क था कि कानून उन्हें इस कार्य के लिए बाध्य नहीं करता.
दूसरी ओर कुछ राज्यों में जनगणना ड्यूटी से अनुपस्थित रहने वाले प्रगणकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किए जाने की घटनाएं भी सामने आईं. इससे शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच असंतोष बढ़ा है. कई लोगों का कहना है कि अतिरिक्त जिम्मेदारियां पहले से ही दबाव में काम कर रहे शिक्षकों पर और बोझ डाल रही हैं.
डेटा में बदलाव का दबाव
कई प्रगणकों ने आरोप लगाया है कि उनसे शौचालय, पेयजल और एलपीजी जैसी सुविधाओं से संबंधित आंकड़ों में बदलाव करने के लिए कहा गया. कुछ प्रगणकों का दावा है कि वास्तविक स्थिति दर्ज करने के बावजूद अधिकारियों ने उन्हें डेटा संशोधित करने के निर्देश दिए.
राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ प्रगणकों ने आरोप लगाया कि खुले में शौच करने वाले परिवारों को भी शौचालय की सुविधा वाला दिखाने या पेयजल की गुणवत्ता से जुड़े आंकड़ों को बदलने का दबाव बनाया गया. कुछ ने यह भी कहा कि जिन घरों में एलपीजी कनेक्शन तो था लेकिन लोग लकड़ी या उपलों से खाना बना रहे थे, वहां भी एलपीजी को मुख्य ईंधन के रूप में दर्ज करने को कहा गया.
हालांकि प्रशासन का कहना है कि डेटा में दिखाई देने वाली विसंगतियों का सत्यापन किया जा रहा है और जहां आवश्यक हो वहां सुधार किए जा रहे हैं. फिर भी इन आरोपों ने जनगणना की विश्वसनीयता और आंकड़ों की शुद्धता को लेकर सवाल खड़े किए हैं.
जनगणना का उद्देश्य केवल आंकड़े जुटाना नहीं होता. इन्हीं आंकड़ों के आधार पर आने वाले वर्षों में नीतियां बनती हैं, संसाधनों का वितरण होता है और कल्याणकारी योजनाओं की दिशा तय होती है. इसलिए डेटा की गुणवत्ता और निष्पक्षता बेहद महत्वपूर्ण है.
भारत की पहली डिजिटल जनगणना तकनीक, प्रशासन और मानव श्रम का एक अभूतपूर्व संगम है. लेकिन यह भी स्पष्ट है कि आंकड़ों की इस विशाल कवायद के पीछे लाखों प्रगणक भीषण गर्मी, सुरक्षा संबंधी चिंताओं, तकनीकी बाधाओं और प्रशासनिक दबावों के बीच काम कर रहे हैं. ऐसे में जनगणना सिर्फ आबादी की गिनती नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक और प्रशासनिक वास्तविकताओं की भी एक बड़ी परीक्षा बन गई है. आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि यह ऐतिहासिक अभियान देश को कितना सटीक, विश्वसनीय और उपयोगी डेटा उपलब्ध करा पाता है.
यह द हिन्दू में प्रकाशित पत्रकार विजैता सिंह की रिपोर्ट का हिंदी अनूदित अंश है. मूल लेख यहाँ पढ़ा जा सकता है.

