त्रिभुवन | राजस्थान की राजनीति में 2028 का चुनाव एक महत्वपूर्ण पड़ाव होगा
'हरकारा डीप डाइव' में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन के साथ राजस्थान के हालिया नगरीय निकाय चुनावों के नतीजों और उनके जरिए राज्य की आगे की राजनीति के संभावित संकेतों पर चर्चा की. बातचीत में भाजपा और कांग्रेस के वोट शेयर के मामूली अंतर, वार्डों के नतीजों, निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका और दोनों दलों के संगठनात्मक प्रदर्शन को समझने की कोशिश की गई.
त्रिभुवन ने बताया कि राजस्थान में आम तौर पर स्थानीय निकाय चुनावों में सत्तारूढ़ दल को फायदा मिलता रहा है. इसका एक कारण यह धारणा है कि स्थानीय स्तर पर सड़क, नाली और सफाई जैसे विकास कार्यों के लिए सत्ता पक्ष के साथ रहना जरूरी है. इस बार भी भाजपा को कांग्रेस से अधिक वोट और वार्ड मिले, लेकिन दोनों दलों के बीच वोटों का अंतर बहुत बड़ा नहीं रहा. निर्दलीय उम्मीदवारों को मिले वोटों ने मुकाबले को और दिलचस्प बनाया.
उनके मुताबिक, कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण बात यह रही कि अपेक्षाकृत सीमित संगठनात्मक सक्रियता के बावजूद उसे अच्छा जनसमर्थन मिला. पार्टी के अलग-अलग नेता अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय रहे, लेकिन उनके बीच एकजुटता और साझा चुनावी रणनीति दिखाई नहीं दी. इसके विपरीत भाजपा ने चुनाव को संगठन और स्थानीय स्तर की सक्रियता के साथ लड़ा. कई इलाकों में भाजपा के स्थानीय कार्यालय और कार्यकर्ता अधिक सक्रिय दिखाई दिए. यही अंतर कांग्रेस के लिए संगठनात्मक चुनौती को सामने लाता है.
चर्चा में दोनों दलों के बड़े नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों का भी विश्लेषण किया गया. कुछ क्षेत्रों में भाजपा के प्रमुख नेताओं के प्रभाव के बावजूद पार्टी को अपेक्षित बढ़त नहीं मिली, जबकि कुछ जगहों पर कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया. वहीं कई नगर निकायों में त्रिशंकु स्थिति बनी, जिसके कारण निर्दलीय पार्षदों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई. त्रिभुवन ने बताया कि ऐसे मामलों में राजनीतिक दलों के लिए सिर्फ चुनाव जीतना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि जीतने और हारने वाले दोनों पक्षों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को साथ बनाए रखना भी संगठनात्मक क्षमता का हिस्सा है.
सादुल शहर का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि टिकट वितरण से पैदा हुई नाराजगी किस तरह बड़े राजनीतिक परिणाम में बदल सकती है. भाजपा के एक स्थानीय नेता की बगावत के बाद निर्दलीय उम्मीदवारों ने बड़ी संख्या में चुनाव लड़ा और उनमें से अधिकांश जीत गए. बाद में भाजपा ने उनसे संपर्क कर उन्हें वापस अपने साथ जोड़ने की कोशिश की. इस उदाहरण के जरिए स्थानीय राजनीति में असंतोष को संभालने और राजनीतिक नेटवर्क को बनाए रखने की अहमियत सामने आई.
बातचीत का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस की आंतरिक एकजुटता और आने वाले 2028 के विधानसभा चुनाव से जुड़ा रहा. त्रिभुवन के अनुसार, राजस्थान में कांग्रेस के पास कई प्रभावशाली नेता और अलग-अलग सामाजिक समूहों में आधार है, लेकिन नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा और संगठनात्मक दूरी उसकी बड़ी चुनौती बनी हुई है. नगरीय चुनावों के नतीजे यह संकेत देते हैं कि मुकाबला एकतरफा नहीं है, लेकिन चुनावी सफलता के लिए संगठन, रणनीति और नेतृत्व के स्तर पर बेहतर समन्वय महत्वपूर्ण होगा.
आगामी पंचायती राज चुनाव को भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया गया. राजस्थान में शहरी क्षेत्रों में भाजपा और ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस की पारंपरिक स्थिति को देखते हुए पंचायत चुनाव दोनों दलों के लिए अलग राजनीतिक परीक्षा हो सकते हैं. साथ ही स्थानीय निकाय और पंचायती राज चुनावों को एक साथ कराने की प्रक्रिया को भी बातचीत में महत्वपूर्ण प्रशासनिक और राजनीतिक बदलाव के रूप में देखा गया.
अंततः चर्चा इस सवाल पर पहुंचती है कि क्या मौजूदा नतीजों को केवल भाजपा की जीत या कांग्रेस की हार के रूप में देखा जाए, या इनके भीतर राजस्थान की बदलती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संकेत तलाशे जाएं. नगरीय चुनावों का संदेश यह है कि वोटों का अंतर सीमित है, लेकिन संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक एकजुटता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक बने हुए हैं.
पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं.

