मॉब लिंचिंग अब आम बात हो चुकी है: 2014-2024 के दौरान लिंचिंग की घटनाओं को दर्शाती एक रिपोर्ट

लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) और ‘संघ-संबद्ध हिंसा’ का मौजूदा माहौल, जो अक्सर मुसलमानों को निशाना बनाता है, पहले पश्चिम बंगाल, गोवा और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में मौजूद नहीं था. हालांकि, 2014 से 2024 के बीच के दशक पर नजर रखने वाली एक रिपोर्ट दर्शाती है कि यह अब देश के लगभग सभी हिस्सों में फैल चुका है.

अंतरा बरुआ के अनुसार, ‘मॉब लिंचिंग इन इंडिया: ए रिकॉर्ड – 2014-202’  शीर्षक वाली इस रिपोर्ट का संकलन और सम्पादन पत्रकार तथा दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष ज़फरुल-इस्लाम खान द्वारा किया गया है और इसे 'फ़ारोस मीडिया' द्वारा प्रकाशित किया गया है.  यह पूरे भारत में मॉब लिंचिंग के मामलों को दर्ज करती है और 'लिंचिंग' को आम तौर पर जिस तरह परिभाषित और समझा जाता है, उसके दायरे को बढ़ाने का तर्क देती है. हालांकि इसे आमतौर पर स्वयंभू हिंदू गौरक्षकों द्वारा मुसलमानों के खिलाफ लक्षित हिंसा के रूप में चित्रित किया जाता है – जहां मुसलमानों को धार्मिक पहचान के किसी भी प्रकटीकरण या बीफ (गोमांस) के सेवन व बिक्री के संदेह पर निशाना बनाया जाता है. रिपोर्ट में पाया गया है कि यह अब मॉब लिंचिंग की एक संस्कृति में बदल गया है. यह अक्सर जातिगत सीमाओं से भी परे निकल जाता है.

रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि मॉब लिंचिंग अब लगभग आम बात बन गई है. बड़ी संख्या में दर्ज मामले रोड रेज (सड़क पर कहासुनी) और सामान्य विवादों को लिंचिंग के मुख्य कारण के रूप में दर्शाते हैं.

यहां रिपोर्ट द्वारा उजागर किए गए छह महत्वपूर्ण बिंदु दिए गए हैं, जो हिंसा की इस मजबूत होती संस्कृति को दर्शाते हैं:

1. कारण अलग-अलग हैं : रिपोर्ट के अनुसार, 2014 से 2024 तक भारत में बीफ रखने या गोहत्या के संदेह में लिंचिंग की 53 घटनाएं, "धार्मिक पहचान" के कारण 89 घटनाएं, और रोड रेज व झगड़ों के हिंसा में बदलने के कारण 571 घटनाएं दर्ज की गईं. कारण विविध हैं. फरवरी 2020 में सौरव नाम के एक व्यक्ति को गलती से किसी के कंधे से टकरा जाने पर पीट-पीटकर मार डाला गया था.

2. उत्तर प्रदेश सबसे आगे है : दर्ज किए गए दशक (2014-2024) के दौरान, भारतीय जनता पार्टी शासित उत्तर प्रदेश में ऐसी हिंसा के 422 मामले देखे गए, जबकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में 296 मामले दर्ज हुए. बिहार तीसरे स्थान पर आता है, और हरियाणा 100 लिंचिंग मामलों के साथ चौथे स्थान पर है. लेकिन जहां यूपी में 2023 में ऐसी 124 घटनाएं हुईं, वहीं 2024 में यह संख्या घटकर 25 हो गई. वास्तव में, सभी राज्यों में 2023 से 2024 के बीच भारी गिरावट प्रतीत होती है. रिपोर्ट में यह उल्लेख नहीं है कि ऐसा क्यों हुआ. इस बीच, रिपोर्ट के अनुसार, मिजोरम और सिक्किम में पूरे दशक में शून्य मामले देखे गए, जबकि गोवा, असम और नागालैंड में एक-एक मामला सामने आया.

3. मुसलमानों को निशाना बनाया गया : भीड़ द्वारा मुस्लिम नागरिकों को जानबूझकर निशाना बनाया जाता है. अगस्त 2021 में, इंदौर में 25 वर्षीय दुकानदार तसलीम अली का नाम हिंदू गौरक्षकों के एक समूह को पता चलते ही उसकी पिटाई कर दी गई. बाद में यह बताया गया कि उसने एक नाबालिग से छेड़छाड़ की थी और अपनी पहचान "छिपा रहा" था. अली को गिरफ्तार किया गया और फिर सबूतों के अभाव में 2024 में बरी कर दिया गया. मुस्लिम पहचान का कोई भी बाहरी प्रकटीकरण – जैसे टोपी या दाढ़ी – हिंदू भीड़ द्वारा लिंचिंग के मामलों का कारण बना है. कई मामलों में जो बात आम है, वह यह है कि मुस्लिम पुरुषों को पीटा जाता है और डरा-धमकाकर "जय श्री राम" के नारे लगवाए जाते हैं.

4. रोड रेज, प्रतिद्वंद्विता का बड़ा योगदान : लिंचिंग के मामलों में 372 मुसलमानों की हत्या हुई है, जबकि 634 घायल हुए हैं. इसके अलावा, 787 हिंदुओं की हत्या हुई है और 327 घायल हुए हैं. ऐसा इसलिए प्रतीत होता है क्योंकि धार्मिक नफरत दर्ज करने वाली कई घटनाएं जहां मुसलमानों के खिलाफ हैं, वहीं रोड रेज, पारिवारिक प्रतिद्वंद्विता और झगड़ों की कई घटनाएं, जो मौत पर समाप्त हुईं और जिनमें हिंदू लोग शामिल थे, रिपोर्ट के अनुसार सांप्रदायिक हिंसा के मामलों से अधिक हैं.

5. अंतर-धार्मिक विवाह लिंचिंग का कारण बनते हैं : प्रेम संबंधों और अंतर-धार्मिक विवाहों के कारण भी बड़ी संख्या में लिंचिंग के मामले सामने आते हैं. इन कारणों से लिंचिंग के कम से कम 141 मामले हुए हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि इन अपराधों का एक बड़ा हिस्सा मुसलमानों और ईसाइयों पर हमला करने के इरादे से किया जाता है, लेकिन भीड़ खुद ही कानून और कानून निर्माता बन गई है, जो अपने आप में एक पर्याप्त न्यायिक और सामाजिक ताकत है.

6. लिंचिंग जातिवादी है : रिपोर्ट में दलित समुदाय के 85 लोगों के मारे जाने और 115 लोगों के घायल होने का उल्लेख है. इनमें से कई मामलों में अपमानजनक तौर-तरीके शामिल हैं, जैसे पेड़ों से बांधना और जातिवादी गालियां सहना. रिपोर्ट में उजागर किए गए मामलों में गुजरात के चाडासाना में 2024 में अपनी शादी में घोड़ी चढ़ने पर एक दलित व्यक्ति की लिंचिंग और 2022 में राजस्थान के जालोर जिले में पानी के मटके को छूने पर नौ साल के दलित बच्चे की पीट-पीटकर हत्या कर देने की घटना शामिल है.

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