मौजूदा रफ्तार रही तो पश्चिम बंगाल में एसआईआर की अपीलों के निपटारे में लग सकते हैं 21 साल: कलकत्ता हाईकोर्ट 

कलकत्ता हाईकोर्ट ने विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामलों के निपटारे की धीमी रफ्तार पर गंभीर चिंता जताई है. अदालत ने बुधवार को मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि अपीलीय अधिकरण इसी गति से काम करते रहे, तो लंबित अपीलों का निपटारा करने में 21 साल तक लग सकते हैं.

‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के मुताबिक, मामला कूचबिहार निवासी सिराजुल शेख की याचिका से जुड़ा है. उन्होंने अदालत का दरवाजा इसलिए खटखटाया क्योंकि पुलिस सत्यापन के दौरान मतदाता पहचान पत्र का नंबर अमान्य पाए जाने के बाद उनके तत्काल पासपोर्ट के आवेदन पर रोक लगा दी गई थी. उन्होंने बताया कि उन्हें पेट संबंधी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए विदेश जाना है और इसके लिए पासपोर्ट की आवश्यकता है.

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कौशिक चंदा ने कहा कि जब तक किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिक घोषित नहीं किया जाता, तब तक उसे पासपोर्ट जारी नहीं किया जा सकता. हालांकि अदालत ने पासपोर्ट जारी करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया, लेकिन अपीलीय अधिकरण को उनकी अपील पर जल्द सुनवाई करने का निर्देश दिया.

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और पासपोर्ट नियम, 1980 के तहत यदि किसी व्यक्ति की पहचान, पता और जन्मतिथि अन्य दस्तावेजों से प्रमाणित हो जाती है, तो मतदाता पहचान पत्र अनिवार्य दस्तावेज नहीं है. यह भी कहा गया कि मतदाता पहचान पत्र नागरिकता का प्रमाण नहीं होता. सर्वोच्च न्यायालय भी पहले स्पष्ट कर चुका है कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है.

यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब कुछ दिन पहले वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व संपादक आर. राजगोपाल को भी कई महीनों की देरी के बाद पासपोर्ट का नवीनीकरण मिला था. उनका आवेदन भी मतदाता सूची से नाम हटने के कारण लंबित हो गया था. राजगोपाल ने उस समय कहा था कि व्यक्तिगत मामले का समाधान पर्याप्त नहीं है और जब तक इस विषय पर स्पष्ट नीति नहीं बनती, तब तक समस्या बनी रहेगी.

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान चलाया था. फरवरी में प्रकाशित अंतिम सूची से शुरुआत में 61 लाख से अधिक नाम हटा दिए गए थे. इसके बाद पूरक सूचियों और संदिग्ध मामलों की जांच की प्रक्रिया भी जारी रही. छह अप्रैल तक लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा चुके थे, जो पुनरीक्षण शुरू होने से पहले राज्य के कुल मतदाताओं का करीब 11.9 प्रतिशत था.

विधानसभा चुनाव से पहले अपीलीय अधिकरणों के समक्ष लगभग 34 लाख अपीलें लंबित थीं. इनमें से 27 लाख अपीलें उन लोगों ने दायर की थीं, जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे. अब तक केवल 1,607 लोगों के नाम दोबारा मतदाता सूची में जोड़े जा सके हैं.

पिछले एक वर्ष के दौरान बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और केरल सहित कई राज्यों में भी मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण किया गया है. इस प्रक्रिया का तीसरा चरण फिलहाल 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में जारी है.

27 मई को सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को वैध ठहराते हुए कहा था कि यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक व्यवस्था को मजबूत करती है. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम शामिल करने या हटाने की जांच का अधिकार निर्वाचन आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं देता.

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