उत्तर प्रदेश का ‘एनकाउंटर’ मॉडल: 8 साल में मारे गए लोगों में मुसलमान सबसे ज़्यादा, ब्राह्मण तीसरे नंबर पर

पश्चिम बंगाल के बरूईपुर में पुलिस हिरासत से भागने का प्रयास कर रहे बलात्कार और हत्या के एक आरोपी को पुलिस ने "आत्मरक्षा" में मार गिराया. इस घटना ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित 'एनकाउंटर मॉडल' की याद दिला दी है. यूपी में 2020 का कुख्यात विकास दुबे एनकाउंटर हो या हाल ही में फतेहपुर और अंबेडकर नगर में हुई मुठभेड़ें, सभी में पुलिस की कहानी बिल्कुल एक जैसी होती है—"आरोपी ने पुलिस की गाड़ी पलटने या चकमा देने के बाद हथियार छीना, फायरिंग की और पुलिस ने आत्मरक्षा में गोली चला दी."

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश में 17,043 एनकाउंटर हुए हैं, जिनमें 289 अपराधी मारे गए, 11,834 घायल हुए और 34,253 गिरफ्तारियां हुईं. इस दौरान 18 पुलिसकर्मी भी शहीद हुए. यूपी पुलिस में 'ऑपरेशन लंगड़ा' काफी चर्चित है, जिसके तहत आरोपियों के पैर (घुटने के पास) में गोली मारकर उन्हें अपाहिज कर दिया जाता है. पुलिस प्रशासन और राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसे अपराधियों के खिलाफ अपनी "जीरो टॉलरेंस नीति" और 'त्वरित न्याय' के रूप में पेश करते हैं.

उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्णा ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की 2024 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि राज्य की अपराध दर (180.2) राष्ट्रीय औसत (252.3) से काफी कम है. रिपोर्ट के अनुसार, हत्या, बलात्कार, छेड़छाड़ और दंगों के मामले राष्ट्रीय औसत से नीचे हैं. हालांकि, विरोधाभास यह है कि 2024 में कुल 4.30 लाख संज्ञेय अपराधों के साथ यूपी देश में शीर्ष पर था. विपक्ष का आरोप है कि पुलिस थानों को शिकायत दर्ज न करने के "अघोषित निर्देश" हैं, जिससे कागजों पर अपराध कम दिखते हैं.

पीयूष श्रीवास्तव की रिपोर्ट के अनुसार, एनकाउंटर के आंकड़ों पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर सवाल उठ रहे हैं. आलोचकों के अनुसार, 2017 से 2025 के बीच मारे गए अपराधियों में 67 मुस्लिम और 42 गैर-यादव ओबीसी, 20 ब्राह्मण, 18 ठाकुर, 16 यादव और 14 अनुसूचित जाति (एससी) के लोग शामिल हैं. समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने सरकार पर पक्षपात और असली अपराधियों को बचाने का आरोप लगाया है.

इसके अलावा, उरई में एक भाजपा नेता और पुलिसकर्मियों पर छेड़छाड़ का मुकदमा दर्ज होने में पांच महीने का समय लगना और अप्रैल 2023 में पुलिस हिरासत में लाइव टीवी पर अतीक अहमद व अशरफ की हत्या होना, यूपी पुलिस की निष्पक्षता और कानून व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है.  पीड़िता और विपक्ष का मानना है कि सत्ता से जुड़े लोगों और स्वयं पुलिस के अपराधियों पर यह 'एनकाउंटर मॉडल' लागू नहीं होता.

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