न कीटों का हमला, न बीमारी: मध्य प्रदेश में 25 हजार सागौन के पेड़ क्यों सूख गए?

'डाउन टू अर्थ' के मुताबिक, मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के जंगलों में पिछले तीन वर्षों के दौरान 25 हजार से अधिक पुराने सागौन के पेड़ सूख गए हैं. वन विभाग की जांच में लंबे समय तक सूखा पड़ने, अत्यधिक गर्मी और पेड़ों की जल परिवहन प्रणाली में आई खराबी को इसकी संभावित वजह बताया गया है.

वन संरक्षक एवं कार्ययोजना अधिकारी प्रदीप मिश्रा के नेतृत्व में किए गए सर्वेक्षण में पश्चिम बैतूल वन मंडल के पांच वन परिक्षेत्रों में 16,800 हेक्टेयर क्षेत्र में सूखे पेड़ों की पहचान की गई. सर्वेक्षण के दौरान प्रत्येक पेड़ की स्थिति और उसके जीपीएस निर्देशांक दर्ज किए गए.

बैतूल देश के प्रमुख सागौन उत्पादक जिलों में शामिल है. मिश्रा के मुताबिक, यहां लकड़ी की कटाई से हर साल 100 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व प्राप्त होता है. सागौन के पेड़ों को व्यावसायिक रूप से परिपक्व होने में 20 से 25 वर्ष लगते हैं. ऐसे में पुराने पेड़ों का सूखना पर्यावरण और अर्थव्यवस्था, दोनों के लिए चिंता का विषय है.

बीमारी नहीं, पानी की कमी बनी वजह

मिश्रा के मुताबिक, पेड़ों के सूखने की घटनाएं 2023 के आसपास शुरू हुई थीं, लेकिन 2025 और 2026 में इनकी संख्या तेजी से बढ़ी. प्रभावित पेड़ों की उम्र लगभग 40 से 120 वर्ष या उससे अधिक थी. इन पेड़ों पर छेदक कीटों, दीमक या फफूंद के हमले के निशान नहीं मिले. जांच में इनकी लकड़ी भी ठोस पाई गई. उसमें न तो सड़न थी और न ही खोखलापन.

राज्य वन अनुसंधान संस्थान (टीएफआरआई) की फरवरी 2025 में हुई जांच में भी नमूनों में फफूंद या अन्य रोगजनकों के संक्रमण के प्रमाण नहीं मिले. हालांकि, रिपोर्ट में मानसून के दौरान जलभराव और गर्मियों में मिट्टी की नमी कम होने को संभावित कारण बताया गया. जलभराव के कारण जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जबकि बाद में सूखे की स्थिति में उनकी महीन पोषक जड़ें क्षतिग्रस्त हो सकती हैं.

मिश्रा का मानना है कि लंबे समय तक सूखे और अत्यधिक गर्मी के कारण पेड़ों की जल परिवहन प्रणाली प्रभावित हुई है. इस स्थिति को हाइड्रोलिक फेल्योर कहा जाता है. पेड़ों में जड़ों से पत्तियों तक पानी जाइलम नामक ऊतकों के जरिए पहुंचता है. भीषण सूखे के दौरान इन ऊतकों में हवा के बुलबुले बन सकते हैं, जिससे पानी का प्रवाह बाधित हो जाता है. गंभीर क्षति होने पर बारिश लौटने के बाद भी पेड़ अपनी जल आपूर्ति बहाल नहीं कर पाते.

जंगलों के प्रबंधन पर असर

बैतूल में 2026 के मानसून के दौरान सामान्य औसत की तुलना में लगभग 69% बारिश हुई. उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों में 2022-23 से ही वनस्पति और मिट्टी में नमी की कमी के संकेत मिलने लगे थे.

हालांकि, दक्षिण बैतूल में टीएफआरआई की जांच में पेड़ों के सूखने की समस्या कुछ सीमित इलाकों तक ही पाई गई. वहां आसपास के अधिकांश पेड़ स्वस्थ थे या उनमें 5% से कम हिस्से में सूखने के लक्षण दिखाई दिए.

वन अधिकारियों के अनुसार, पेड़ों के सूखने का यह पैमाना पिछले दो दशकों में अभूतपूर्व है. इससे लकड़ी के उपलब्ध भंडार और टिकाऊ कटाई की योजना प्रभावित हो सकती है. प्रदीप मिश्रा ने सूखे पेड़ों को समय पर हटाने की जरूरत पर जोर दिया है, ताकि लकड़ी की गुणवत्ता बनी रहे और जंगलों में आग लगने का खतरा कम किया जा सके.

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