रामकृष्णन | भारत-चीन एलएसी विवाद और पूर्वोत्तर के सीमा संघर्ष

भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव की चर्चा अक्सर होती है, लेकिन पूर्वोत्तर भारत के राज्यों के भीतर और उनके बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद, जातीय संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता भी गंभीर चिंता का विषय हैं. रामकृष्णन अपने लेख में तर्क देते हैं कि चीन के साथ सीमा विवाद की तुलना में पूर्वोत्तर की आंतरिक समस्याओं पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है.

चीन की कथित घुसपैठ की खबरें

जून 2026 में अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की कथित घुसपैठ की खबरें सामने आई थीं. भारतीय सेना ने जून के अंतिम सप्ताह में इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि चीनी सैनिकों की ओर से अतिक्रमण या शिविर स्थापित किए जाने की खबरें गलत और आधारहीन हैं.

स्थानीय निवासियों और नागरिक संगठनों ने दावा किया था कि चीनी सैनिक गांवों के करीब पहुंच रहे हैं. हालांकि, 7 अगस्त को अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी किसी नई घुसपैठ की खबर से इनकार किया. उन्होंने कहा कि सीमा पर तैनात भारतीय सेना क्षेत्र की सुरक्षा कर रही है. साथ ही, उन्होंने स्थानीय संगठन नाह वेलफेयर सोसाइटी की चिंताओं की जांच करने की जरूरत भी बताई. लेखक का आरोप है कि भारत-चीन संबंधों में सुधार और एलएसी पर शांति की कोशिशों के बीच ऐसी खबरें दोनों देशों के बीच अविश्वास बढ़ा सकती हैं.

गलवान और कांग्रेस की राजनीति

लेखक ने कांग्रेस पर चीन से जुड़ी खबरों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है. कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर 'डीडीएलजे' यानी इनकार करना, ध्यान भटकाना, झूठ बोलना और सही ठहराना जैसी नीति अपनाने का आरोप लगाया था. उन्होंने 15 जून 2020 को गलवान घाटी में 20 भारतीय सैनिकों की शहादत का मुद्दा भी उठाया.

रामकृष्णन का तर्क है कि गलवान की घटना को बार-बार उठाने से भारत-चीन संबंधों में सुधार की कोशिशों को नुकसान पहुंच सकता है. वह श्रीलंका में भारतीय शांति सेना (आईपीकेएफ) की तैनाती का उदाहरण देते हुए कांग्रेस की विदेश नीति की आलोचना करते हैं. लेख में राहुल गांधी के उस दावे का भी उल्लेख है, जिसमें उन्होंने कहा था कि चीन ने भारत की 2,000 किलोमीटर से अधिक जमीन पर कब्जा कर लिया है. लेखक के अनुसार, इस बयान पर सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में उन्हें बिना आधार के दावा करने को लेकर फटकार लगाई थी.

असम-अरुणाचल सीमा विवाद

20 अप्रैल 2023 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच 51 साल पुराने सीमा विवाद को सुलझाने के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए. समझौता 123 विवादित गांवों से संबंधित था. दोनों राज्यों ने तय किया कि इन गांवों को लेकर भविष्य में कोई नया दावा नहीं किया जाएगा और भारतीय सर्वेक्षण विभाग विस्तृत सर्वे करेगा.

अमित शाह ने इसे ऐतिहासिक समझौता बताया था. हालांकि, लेखक का सवाल है कि इस प्रक्रिया में असम ने अपने सीमा संबंधी दावे छोड़ दिए और सुप्रीम कोर्ट में 1989 में दायर मुकदमा वापस लेने पर सहमति जताई. उनके मुताबिक, समझौते की आधिकारिक घोषणा में इस पहलू को स्पष्ट रूप से सामने नहीं रखा गया.

पूर्वोत्तर के राज्यों में सीमा और जातीय संघर्ष

पूर्वोत्तर का मौजूदा राजनीतिक नक्शा कई दशकों में हुए प्रशासनिक बदलावों का परिणाम है. नागालैंड 1963 में असम से अलग हुआ. मेघालय 1972 में राज्य बना, जबकि मिजोरम 1972 में केंद्रशासित प्रदेश और 1986 में राज्य बना. अरुणाचल प्रदेश 1972 में केंद्रशासित प्रदेश और 1987 में राज्य बना.

असम सरकार के आंकड़ों का हवाला देते हुए लेख में कहा गया है कि 2001 के बाद नागालैंड ने असम की 19,819.619 हेक्टेयर, अरुणाचल प्रदेश ने 5,756.02 हेक्टेयर और मेघालय ने 65.62 हेक्टेयर जमीन पर अतिक्रमण किया. असम और अरुणाचल के बीच विवाद को लेकर 1983 में अरुणाचल सरकार ने 1,085.82 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर दावा किया था. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सीमा पहचानने के लिए आयोग गठित किया. 2009 में अरुणाचल के 1,119.279 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अपने राज्य में शामिल करने के प्रस्ताव को असम ने खारिज कर दिया था.

लेखक अरुणाचल प्रदेश की जनसंख्या वृद्धि को भी केंद्र की रणनीति से जोड़ते हैं. उनके अनुसार, 1961 में क्षेत्र की आबादी 3.36 लाख थी, जो 2011 में बढ़कर 13.84 लाख और 2024 में अनुमानित 16.8 लाख हो गई. वह इस वृद्धि के लिए शरणार्थियों, पूर्व सैनिकों, नेपाली आबादी, बाहरी मजदूरों और केंद्रीय कर्मचारियों की मौजूदगी को जिम्मेदार मानते हैं. ये लेखक के अपने दावे और विश्लेषण हैं.

मणिपुर हिंसा और अफस्पा

लेख में मणिपुर के मैतेई-कुकी संघर्ष को पूर्वोत्तर की गंभीर आंतरिक समस्या बताया गया है. इसमें लगभग 260 लोगों की मौत, 1,100 से अधिक लोगों के घायल होने और करीब 70,000 लोगों के विस्थापित होने का उल्लेख है. लेखक राज्य की तत्कालीन भाजपा सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हैं.

पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने 24 अक्टूबर 2026 के साक्षात्कार में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) का बचाव किया. उन्होंने कहा कि पहले हालात सुधारने की जरूरत है. उनके अनुसार, सेना का प्राथमिक काम देश की रक्षा करना है, न कि नागरिकों के बीच तैनात रहना. उन्होंने यह भी कहा कि अफस्पा सेना को अपराध करने की छूट नहीं देता.

इस संदर्भ में लेख नागालैंड के ओटिंग गांव में 4 दिसंबर 2021 को हुई गोलीबारी का उल्लेख करता है. सेना के एक विशेष दस्ते ने छह कोयला मजदूरों को मार दिया था. सेना और केंद्र ने इसे गलत पहचान का मामला बताया. इसके बाद ग्रामीणों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़प में सात अन्य ग्रामीणों और एक जवान की मौत हुई. अगले दिन विरोध प्रदर्शन के दौरान एक और नागरिक मारा गया.

नागालैंड पुलिस की विशेष जांच टीम ने कहा था कि सैनिकों ने पहचान सुनिश्चित किए बिना गोलीबारी की. तत्कालीन पुलिस महानिदेशक टी. जॉन लॉन्गकुमेर के अनुसार, 21 पैरा स्पेशल फोर्स के 30 जवानों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया. हालांकि, अभियोजन की केंद्रीय मंजूरी नहीं मिली. जुलाई 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की कार्यवाही पर रोक लगा दी. पीड़ित परिवारों की याचिका 2023 से लंबित बताई गई है.

असम-अरुणाचल और भारत-म्यांमार सीमा पर तनाव

10 अगस्त 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, असम के धेमाजी जिले में मिंगमांग बदाती के पास कथित गोलीबारी में 18 ग्रामीण घायल हुए थे. इनमें तीन की हालत गंभीर थी. घायलों ने आरोप लगाया कि अरुणाचल प्रदेश की ओर से आए सादे कपड़ों वाले पुलिसकर्मियों ने गोली चलाई. दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों के बीच बातचीत हुई थी.

इसके अलावा, मणिपुर में भारत-म्यांमार सीमा के प्रस्तावित पुनर्निर्धारण के खिलाफ कुकी समुदाय के लोगों ने खेंगजांग और मोलचम गांवों में प्रदर्शन किया. 11 अगस्त 2026 को हजारों प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सीमा स्तंभ 65 से 68 के पुनर्निर्धारण से उनकी पुश्तैनी जमीन और आजीविका प्रभावित हो सकती है. उन्होंने केंद्र और मणिपुर सरकार से स्थानीय समुदायों की सहमति के बिना सीमा में बदलाव नहीं करने की मांग की.

लेखक का निष्कर्ष है कि भारत में चीन के साथ एलएसी विवाद पर राजनीतिक और मीडिया बहस के मुकाबले पूर्वोत्तर के आंतरिक सीमा विवादों, जातीय संघर्षों, सैन्य तैनाती और नागरिक अधिकारों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता. उनके अनुसार, इन समस्याओं का समाधान किए बिना क्षेत्र में स्थायी शांति संभव नहीं है.

(रामकृष्णन राजनीतिक मामलों के विश्लेषक और काउंटरकरंट्स के नियमित लेखक हैं. यह उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी रूपांतरण है.)

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