भारत में हर 3 में से 1 जेन जी युवा काम से बाहर. वजह सिर्फ कौशल की कमी नहीं

भारत की युवा आबादी को अक्सर देश की सबसे बड़ी ताकत बताया जाता है. लेकिन रोजगार और शिक्षा से जुड़े आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं. ‘द क्विंट’ में प्रकाशित अपने लेख में औनिंद्यो चक्रवर्ती ने सरकारी आंकड़ों और श्रम सर्वेक्षणों के आधार पर सवाल उठाया है कि आखिर भारत की जेन जी पीढ़ी का बड़ा हिस्सा शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार से बाहर क्यों है. उनका तर्क है कि समस्या केवल युवाओं के पास कौशल की कमी की नहीं, बल्कि रोजगार के सीमित अवसरों, सामाजिक बाधाओं और खासकर महिलाओं के खिलाफ मौजूद संरचनात्मक भेदभाव की भी है.

युवा महिलाओं के बीच असली संकट

15 से 29 वर्ष की उम्र के युवाओं को देखें तो स्थिति चिंताजनक है. 2020-21 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब 33 प्रतिशत युवा न शिक्षा में थे, न प्रशिक्षण में और न ही किसी रोजगार में. हालांकि कोविड काल के कारण उस समय की स्थिति अधिक खराब थी, लेकिन बाद के आंकड़े भी बड़ी चुनौती की ओर इशारा करते हैं.

2025 के पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे के अनुसार 15-29 आयु वर्ग के करीब 25 प्रतिशत युवा नीट श्रेणी में हैं, यानी वे न रोजगार में हैं, न शिक्षा में और न प्रशिक्षण ले रहे हैं. साप्ताहिक रोजगार की कसौटी पर यह आंकड़ा करीब 29 प्रतिशत तक पहुंच जाता है.

लेकिन इन औसत आंकड़ों के पीछे सबसे बड़ी असमानता महिलाओं की स्थिति में दिखाई देती है. युवा पुरुषों में नीट का अनुपात लगातार कम हुआ है, जबकि युवा महिलाओं के बीच यह अब भी बेहद ऊंचा है. 2025 में करीब 48 प्रतिशत युवा महिलाएं न शिक्षा में थीं और न किसी लाभकारी रोजगार में. लेख के अनुसार इनमें बड़ी संख्या उन महिलाओं की है जो घर और परिवार की जिम्मेदारियों में लगी हुई हैं.

अवैतनिक घरेलू काम महिलाओं की बेरोजगारी को छिपा रहा है

लेख एक महत्वपूर्ण सवाल उठाता है कि सरकार रोजगार को किस तरह मापती है. यदि किसी व्यक्ति ने साल में सीमित अवधि तक भी काम किया है, तो उसे रोजगार प्राप्त माना जा सकता है. इसी तरह परिवार के खेत या छोटे कारोबार में बिना वेतन काम करने वाली महिलाओं को भी रोजगार की श्रेणी में शामिल किया जाता है.

औनिंद्यो चक्रवर्ती का तर्क है कि भारत जैसे देश में यह तस्वीर वास्तविक बेरोजगारी को पूरी तरह नहीं दिखाती. खासकर कृषि क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग परिवार के साथ काम तो करते हैं, लेकिन उनके पास नियमित आय या स्वतंत्र रोजगार नहीं होता. इसे अक्सर छिपी हुई बेरोजगारी के रूप में देखा जाता है.

सीएमआईई के अपेक्षाकृत सख्त मानकों का हवाला देते हुए लेख बताता है कि कामकाजी उम्र की महिलाओं में वास्तविक रोजगार की स्थिति और भी कमजोर दिखाई देती है. बड़ी संख्या में महिलाएं न तो रोजगार में हैं और न ही सक्रिय रूप से नौकरी तलाश रही हैं.

शिक्षित महिलाओं को भी व्यवस्था से बाहर किया जा रहा है

यह मान लेना गलत होगा कि घर पर रहने वाली महिलाएं काम नहीं करना चाहतीं. लेख के मुताबिक घरेलू काम और परिवार की देखभाल में महिलाओं का भारी श्रम लगता है. सामाजिक जिम्मेदारियां, सुरक्षा की चिंता और परिवार की अपेक्षाएं उन्हें घर से बाहर रोजगार करने से रोकती हैं.

समस्या शिक्षित महिलाओं के सामने भी खत्म नहीं होती. 2025 में महिला स्नातकों और डिप्लोमा धारकों का बड़ा हिस्सा भी नीट श्रेणी में था. नौकरी तलाश रही शिक्षित महिलाओं में बेरोजगारी का अनुपात भी काफी ऊंचा पाया गया.

इसलिए केवल यह कहना कि युवाओं, खासकर महिलाओं, के पास उद्योग की जरूरत के मुताबिक कौशल नहीं है, पूरी तस्वीर नहीं बताता. लेख के अनुसार सामाजिक बाधाएं और भर्ती प्रक्रिया में भेदभाव भी महिलाओं को श्रम बाजार से बाहर कर रहे हैं.

भारत युवाओं को उन नौकरियों के लिए प्रशिक्षित कर रहा है जो मौजूद ही नहीं हैं

लेख कौशल विकास की मौजूदा नीति पर भी सवाल उठाता है. औनिंद्यो चक्रवर्ती के अनुसार भारत की समस्या केवल "स्किल गैप" नहीं, बल्कि पर्याप्त और बेहतर रोजगार के अवसरों की कमी भी है. 2024 के एक सरकारी अध्ययन में बड़ी संख्या में ITI प्रशिक्षित युवाओं के बेरोजगार रहने की बात सामने आई.

इसका मतलब यह है कि देश युवाओं को प्रशिक्षित तो कर रहा है, लेकिन अर्थव्यवस्था और खासकर विनिर्माण क्षेत्र उतनी संख्या में गुणवत्तापूर्ण नौकरियां पैदा नहीं कर पा रहा है. कम वेतन वाली औद्योगिक नौकरियों की तुलना में कई युवा दूसरे असंगठित या सेवा क्षेत्र के कामों को अधिक लाभकारी मानते हैं.

भारत की जेन जी के सामने चुनौती सिर्फ कौशल की नहीं है. युवाओं को ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जो उनकी शिक्षा और प्रशिक्षण के अनुरूप रोजगार पैदा करे. वहीं युवा महिलाओं के लिए रोजगार की चर्चा केवल नौकरी और कौशल तक सीमित नहीं रह सकती. सामाजिक बंधनों, घरेलू जिम्मेदारियों और कार्यस्थल पर भेदभाव को दूर किए बिना भारत अपनी आधी युवा आबादी की क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाएगा.

Previous
Previous

पेंगुइन इंडिया ने सोनिया गांधी के संस्मरण में मोदी, आरएसएस और चीन से जुड़े अंशों में कटौती की मांग की थी

Next
Next

'उसके बिना घर, घर जैसा नहीं लगता'. बांग्लादेश भेजी गई बंगाल की मुस्लिम महिला की वापसी का इंतजार