एक महीने में 30% महंगी हुई चीनी, मौसम के झटकों से खाद्य महंगाई का बढ़ा खतरा

‘डाउन टू अर्थ’ के मुताबिक, देश में चीनी की कीमतों में पिछले एक महीने के दौरान करीब 30 प्रतिशत की तेज बढ़ोतरी ने खाद्य महंगाई को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 24 जुलाई को चीनी का औसत खुदरा मूल्य 48.73 रुपये प्रति किलो था, जो 24 अगस्त तक बढ़कर 63.05 रुपये प्रति किलो पहुंच गया. यह तेजी ऐसे समय आई है जब भारतीय रिजर्व बैंक लगातार चेतावनी देता रहा है कि बार-बार आने वाले और अधिक तीव्र मौसम संबंधी झटके खाद्य महंगाई को लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं.

केंद्र सरकार ने कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे अत्यधिक बारिश, जलभराव और गन्ने की फसल में फैली बीमारियों को प्रमुख कारण बताया है. रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों के साथ ज्यादा बारिश ने गन्ने के उत्पादन को प्रभावित किया है. इसका असर चीनी उत्पादन के अनुमान पर पड़ा है. मौजूदा सत्र में चीनी उत्पादन अब करीब 30.6 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जबकि शुरुआत में गन्ना उत्पादक राज्यों ने लगभग 34.3 मिलियन टन उत्पादन का अनुमान लगाया था.

गन्ने की उपलब्धता कम होने से चीनी मिलों का उत्पादन प्रभावित होता है और बाजार में आपूर्ति पर दबाव बढ़ता है. यदि व्यापारी भविष्य में कीमतें और बढ़ने की आशंका में स्टॉक रोकते हैं तो स्थिति और गंभीर हो सकती है. सरकार ने त्योहारी मांग, वैश्विक स्तर पर आपूर्ति में कमी और सट्टेबाजी के उद्देश्य से स्टॉक जमा करने को भी कीमतों में तेजी के कारणों में शामिल किया है.

हालांकि सरकार का कहना है कि अक्टूबर में नया पेराई सत्र शुरू होने तक घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए देश में पर्याप्त चीनी स्टॉक मौजूद है. कीमतों को नियंत्रित करने के लिए 1 अगस्त से 30 नवंबर तक चीनी डीलरों के लिए 400 टन की स्टॉक सीमा लागू की गई है. 1 सितंबर से बड़े उपभोक्ताओं को 15 दिनों की खपत से अधिक चीनी स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी. सरकार ने मिलों के स्टॉक का भौतिक सत्यापन कराने और 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की भी अनुमति दी है.

सरकार ने राज्यों और चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की सलाह दी है, ताकि त्योहारी सीजन के दौरान बाजार में उपलब्धता बढ़ाई जा सके. साथ ही सरकार ने यह तर्क खारिज किया है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के इस्तेमाल से मौजूदा कीमतों में तेजी आई है. 2022-23 में एथेनॉल के लिए करीब 12 प्रतिशत चीनी का उपयोग होता था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 9 प्रतिशत रह गया है.

वैश्विक बाजार भी कीमतों पर दबाव बढ़ा रहा है. सरकार के अनुमान के अनुसार 2026-27 में दुनिया में करीब 3.3 मिलियन टन चीनी की कमी हो सकती है. 30 जून से 20 अगस्त के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमत 474 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 552 डॉलर प्रति टन पहुंच गई.

RBI लंबे समय से कहता रहा है कि अत्यधिक बारिश, सूखा, हीटवेव और बेमौसम बारिश जैसी घटनाएं फसल उत्पादन को प्रभावित करती हैं और कम आपूर्ति का असर सीधे खाद्य कीमतों पर पड़ता है. भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में खाद्य वस्तुओं का बड़ा हिस्सा है. इसलिए चीनी जैसी जरूरी वस्तु की कीमत में करीब 30 प्रतिशत की वृद्धि केवल एक उत्पाद की महंगाई नहीं, बल्कि मौसम, आपूर्ति, वैश्विक बाजार और जमाखोरी से पैदा होने वाले व्यापक खाद्य महंगाई के खतरे की ओर भी संकेत करती है.

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