पांच दिन में निर्वासन, एक साल बाद वापसी: छह बंगाली अब नागरिकता साबित करने की नई लड़ाई में

‘आर्टिकल 14’ की रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के पाइकड़ गांव में 8 जुलाई 2026 की रात असाधारण थी. रात करीब 10.30 बजे जब स्वीटी बीबी अपने दो बेटों के साथ घर लौटीं तो रिश्तेदार और पड़ोसी टॉर्च लेकर उनका इंतजार कर रहे थे. कुछ दूरी पर दानिश शेख के घर के बाहर भी ऐसा ही दृश्य था. यह सिर्फ घर वापसी नहीं थी, बल्कि भारत से कथित तौर पर गलत तरीके से बांग्लादेश भेजे गए छह लोगों की लगभग एक साल बाद वापसी थी.

स्वीटी बीबी, उनके बेटे कुर्बान और इमाम, दानिश शेख और उनकी पत्नी सुनाली खातून तथा बेटा साबिर जून 2025 में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के बाद बांग्लादेश भेज दिए गए थे. पुलिस ने उन्हें कथित अवैध बांग्लादेशी प्रवासी मानते हुए हिरासत में लिया था. परिवार लगातार कहता रहा कि वे पश्चिम बंगाल के निवासी और भारतीय नागरिक हैं.

सुनाली और उनके आठ वर्षीय बेटे को दिसंबर 2025 में भारत लौटने की अनुमति मिल गई थी, लेकिन दानिश, स्वीटी और उनके दो बेटों को जुलाई 2026 तक बांग्लादेश में रहना पड़ा. दानिश जब घर लौटे तो पहली बार अपने नवजात बेटे को देख सके.

दिल्ली की झुग्गी से बांग्लादेश तक

18 जून 2025 को दिल्ली के रोहिणी इलाके की बंगाली बस्ती में पुलिस ने कथित अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की तलाश में कार्रवाई की. सुनाली के पति दानिश को हिरासत में लिया गया. पड़ोस से स्वीटी और उनके दो बेटे भी पकड़े गए. दो दिन बाद पति के बारे में जानकारी लेने पुलिस स्टेशन पहुंचीं सुनाली और उनके बेटे साबिर को भी हिरासत में ले लिया गया.

सभी को विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय के सामने पेश किया गया और 26 जून को उनके निर्वासन का आदेश जारी कर दिया गया. परिवारों का आरोप है कि उन्हें पश्चिम बंगाल में रहने वाले रिश्तेदारों को सूचना देने या नागरिकता साबित करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला.

बाद में परिवारों को पता चला कि छह लोगों को असम ले जाकर सीमा पार बांग्लादेश भेज दिया गया. उनके पास न पैसा था, न पहचान पत्र और न खाने का सामान. सुनाली और दानिश के अनुसार, उन्हें जंगल के पास छोड़कर सीमा की ओर भागने के लिए कहा गया.

कई दिनों तक वे जंगलों में भटकते रहे. भूख और प्यास से परेशान बच्चों के साथ यह समूह आखिरकार बांग्लादेश के कुरिग्राम जिले के एक गांव पहुंचा. वहां से उन्हें बांग्लादेशी सीमा बल के पास ले जाया गया. भारत लौटने की कोशिश में वे दोबारा सीमा पार करने लगे, लेकिन बीएसएफ ने उन्हें पकड़ लिया और कथित तौर पर पिटाई के बाद वापस बांग्लादेश भेज दिया गया.

अदालत ने उठाए निर्वासन पर सवाल

परिवारों ने कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. 26 सितंबर 2025 को हाईकोर्ट ने हिरासत और निर्वासन की प्रक्रिया को अवैध बताते हुए केंद्र सरकार को उन्हें वापस लाने का निर्देश दिया. अदालत ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को विदेशी नहीं माना जा सकता और राज्य के पास संदेह का कोई ठोस आधार होना चाहिए.

परिवारों ने अदालत में जमीन के पुराने दस्तावेज और अन्य रिकॉर्ड पेश किए. पाइकड़ पुलिस की जांच में भी परिवार के गांव का निवासी होने की पुष्टि हुई थी. हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि पश्चिम बंगाल से भेजी गई जानकारी पर दिल्ली पुलिस की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली.

केंद्र सरकार इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गई. सुप्रीम कोर्ट ने पहले सुनाली और उनके बेटे को मानवीय आधार पर भारत लौटने की अनुमति दी. मई 2026 में केंद्र ने दानिश, स्वीटी और उनके बच्चों को भी नागरिकता सत्यापन के लिए वापस लाने पर सहमति जताई, हालांकि सरकार ने कहा कि इसे भविष्य के मामलों का उदाहरण नहीं माना जाए.

अब घर लौटने के बाद भी खत्म नहीं हुई लड़ाई

भारत लौटने के बावजूद इन परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल अभी भी नागरिकता साबित करने का है. सुनाली के माता-पिता के नाम पुराने मतदाता रिकॉर्ड में मौजूद हैं और उनके पास आधार कार्ड सहित अन्य दस्तावेज हैं, लेकिन जन्म प्रमाणपत्र नहीं है. दिल्ली में मतदाता के रूप में दर्ज होने के बावजूद अब उनका नाम वहां की मतदाता सूची में नहीं मिल रहा.

स्वीटी और दानिश की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है. उनके परिवारों के पास जमीन, मतदाता सूची, आधार और अन्य दस्तावेज हैं, लेकिन नागरिकता की औपचारिक जांच अभी बाकी है. बच्चों की नागरिकता भी माता-पिता की स्थिति से जुड़ी हुई है.

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2 मई 2025 के गृह मंत्रालय के दिशानिर्देशों के अनुसार, यदि कोई संदिग्ध व्यक्ति खुद को किसी दूसरे भारतीय राज्य का निवासी बताता है तो उस राज्य से सत्यापन किया जाना चाहिए. यह प्रक्रिया 30 दिनों में पूरी होनी चाहिए. लेकिन इन छह लोगों के मामले में हिरासत के सिर्फ पांच दिन के भीतर निर्वासन आदेश जारी कर दिया गया.

एक साल तक बांग्लादेश में भटकने और जेल में रहने के बाद परिवार वापस तो आ गए हैं, लेकिन उनकी असली लड़ाई अभी बाकी है. सवाल वही है जो उन्हें भारत से निकालने से पहले पूछा और जांचा जाना चाहिए था: क्या वे भारतीय नागरिक हैं?

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