जलवायु ‘फीडबैक लूप्स’ से ग्लोबल वार्मिंग में 30% तक की बढ़ोतरी हो सकती है: अध्ययन

‘द गार्डियन’ में ऑलिवर मिलमैन की यह रिपोर्ट ‘एनवायरनमेंटल रिसर्च लेटर्स’ में प्रकाशित एक नए अध्ययन पर आधारित है, जो चेतावनी देता है कि प्राकृतिक ‘फीडबैक लूप्स’ के कारण ग्लोबल वार्मिंग में 30% तक की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है.

जीवाश्म ईंधनों के उपयोग से बढ़ते तापमान के कारण उच्च अक्षांशों में जमी बर्फ (पर्माफ्रॉस्ट) पिघल रही है, जंगलों की आग बढ़ रही है और आर्द्रभूमियां (वेटलैंड्स) तथा झीलें गर्म हो रही हैं. इन प्राकृतिक परिवर्तनों से मिट्टी और पेड़ों में जमा मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें वायुमंडल में छूट रही हैं, जिससे जलवायु संकट और गंभीर हो रहा है.

वैज्ञानिक लंबे समय से इन प्राकृतिक प्रक्रियाओं को जानते हैं, लेकिन वर्तमान जलवायु मॉडलों और नीतियों में इन्हें काफी हद तक शामिल नहीं किया गया है. वैज्ञानिकों के अनुसार, ये प्राकृतिक स्रोत इस सदी के अंत तक वैश्विक हीटिंग में 20% से 30% तक का बढ़ावा दे सकते हैं, जिससे औसत तापमान में 0.2°C से 0.4°C तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी होगी.

अध्ययन के अनुसार, तापमान में मामूली वृद्धि से भी भीषण लू, बाढ़ और सूखे जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ जाता है. संयुक्त राष्ट्र ने भी माना है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखने का लक्ष्य जल्द ही टूट जाएगा. यदि यह चक्र जारी रहा, तो पृथ्वी ऐसे 'टिपिंग पॉइंट' या 'पॉइंट ऑफ नो रिटर्न' पर पहुँच सकती है, जहाँ जलवायु प्रणाली पूरी तरह मानवीय नियंत्रण से बाहर हो जाएगी.

'क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर' का अनुमान है कि वर्तमान सरकारी नीतियों से तापमान 2.6°C तक बढ़ सकता है, जिससे अरबों लोगों का जीवन प्रभावित होगा. हालाँकि, वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन में तेजी से कटौती की जाए, तो प्राकृतिक स्रोतों से होने वाली इस अतिरिक्त वार्मिंग को कम किया जा सकता है.

यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि जलवायु मॉडल में प्राकृतिक उत्सर्जन को शामिल करना अनिवार्य है. जीवाश्म ईंधन के उत्सर्जन में तेजी से कटौती करना अब और भी अधिक आवश्यक हो गया है ताकि इस अनियंत्रित वैश्विक हीटिंग की प्रक्रिया को रोका जा सके.

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