देवांगी दुगर और एस. सुसंथिका | भारत की 3.1% बेरोजगारी दर के पीछे छिपी हकीकत

मार्च 2026 में जारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में भारत की बेरोजगारी दर 3.1 प्रतिशत रही. पहली नजर में यह आंकड़ा रोजगार के मोर्चे पर अच्छी स्थिति का संकेत देता है. लेकिन युवाओं, खासकर शिक्षित युवाओं के आंकड़ों पर नजर डालने से तस्वीर बदल जाती है. राष्ट्रीय औसत बेरोजगारी की वास्तविक चुनौती को पूरी तरह नहीं दर्शाता, क्योंकि इसका सबसे अधिक असर युवाओं और पढ़े-लिखे लोगों पर दिखाई देता है.

सर्वेक्षण के अनुसार, 15 से 29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर 9.9 प्रतिशत और शहरी युवाओं में 13.6 प्रतिशत रही. माध्यमिक या उससे अधिक शिक्षा प्राप्त 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों में यह दर 6.5 प्रतिशत थी, जो राष्ट्रीय औसत से दोगुने से भी अधिक है. इसका अर्थ है कि रोजगार की समस्या उन युवाओं के बीच अधिक गंभीर है, जिनसे देश की आर्थिक वृद्धि और उत्पादकता बढ़ाने की उम्मीद की जाती है.

कम बेरोजगारी दर का दूसरा पहलू

बेरोजगारी दर कम होने का अर्थ यह नहीं है कि लोगों को पर्याप्त या अच्छी आय वाला काम मिल रहा है. कम पढ़े-लिखे और आर्थिक रूप से कमजोर लोग लंबे समय तक बेरोजगार नहीं रह सकते. परिवार चलाने के लिए उन्हें कम वेतन वाला या अस्थायी काम भी स्वीकार करना पड़ता है. दूसरी ओर, आर्थिक सहयोग मिलने पर कोई शिक्षित युवा बेहतर नौकरी की तलाश में कुछ समय तक बेरोजगार रह सकता है. इस कारण गरीबों में दर्ज बेरोजगारी दर कम होने के बावजूद उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो सकती है.

बेरोजगारी दर की गणना में केवल उन लोगों को शामिल किया जाता है, जो काम कर रहे हैं या सक्रिय रूप से काम तलाश रहे हैं. सर्वेक्षण के मुताबिक, 15 से 29 वर्ष की आयु के लगभग 25 प्रतिशत युवा न रोजगार में हैं, न शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और न ही किसी प्रशिक्षण से जुड़े हैं. इस श्रेणी को अंग्रेजी में ‘नीट’ (एनईईटी) कहा जाता है. इसमें बेरोजगार युवाओं के साथ वे लोग भी शामिल हैं, जो न पढ़ रहे हैं और न काम तलाश रहे हैं. इनमें घर और बच्चों की देखभाल में लगी कई युवा महिलाएं भी शामिल हैं. इस तरह, कम बेरोजगारी दर के बावजूद युवाओं का एक बड़ा हिस्सा कमाई और कौशल विकास, दोनों से बाहर रह सकता है.

रोजगार की गुणवत्ता भी एक बड़ी चुनौती है. देश में केवल 23.6 प्रतिशत कामगार नियमित वेतन वाली नौकरियों में हैं. लगभग 56.2 प्रतिशत स्वरोजगार से जुड़े हैं, जबकि करीब पांचवां हिस्सा दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर है. लगभग 43 प्रतिशत कामगार कृषि क्षेत्र में कार्यरत हैं, जहां कई बार उपलब्ध काम की तुलना में श्रमिकों की संख्या अधिक होती है. ऐसी स्थिति को छिपी हुई बेरोजगारी कहा जाता है. इसमें कुछ लोगों के काम छोड़ देने पर भी कुल उत्पादन में बहुत कमी नहीं आती. इसलिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि कितने लोगों को काम मिला; यह भी देखना जरूरी है कि काम कितना उत्पादक है और उससे पर्याप्त आय होती है या नहीं.

शिक्षा और रोजगार के बीच दूरी

भारत ने शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने में प्रगति की है. सर्वेक्षण के अनुसार, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के स्कूल जा चुके लोगों ने औसतन लगभग दस वर्ष की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की है. लेकिन शिक्षा तभी रोजगार के अवसर बढ़ाती है, जब उससे ऐसे कौशल विकसित हों जिनकी नियोक्ताओं को जरूरत हो. आंकड़ों के मुताबिक, 15 से 29 वर्ष की आयु के केवल पांच प्रतिशत लोगों ने औपचारिक व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त किया है या प्राप्त कर रहे हैं.

यही अंतर रोजगार बाजार में समस्या पैदा करता है. कंपनियां कहती हैं कि उन्हें काम के लिए तैयार उम्मीदवार नहीं मिलते, जबकि स्नातक युवाओं की शिकायत है कि उनके लिए पर्याप्त नौकरियां नहीं हैं. जब पढ़ाई में हासिल कौशल और उद्योगों की जरूरतों के बीच तालमेल नहीं होता, तो डिग्री होने के बावजूद रोजगार पाना मुश्किल हो जाता है.

हालांकि, 2025 के आंकड़ों में पिछले वर्ष की तुलना में कुछ सुधार भी दर्ज किए गए. युवाओं में बेरोजगारी दर 10.3 प्रतिशत से घटकर 9.9 प्रतिशत और शिक्षित लोगों में 7 प्रतिशत से घटकर 6.5 प्रतिशत रही. नियमित वेतन वाली नौकरियों की हिस्सेदारी 22.4 प्रतिशत से बढ़कर 23.6 प्रतिशत हुई. विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़कर 12.1 प्रतिशत पहुंची, जबकि कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी घटकर 43 प्रतिशत रह गई. फिर भी विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार का हिस्सा सीमित है. इसलिए अच्छी नौकरियों के बड़े पैमाने पर सृजन के लिए ऐसे उद्योगों को बढ़ावा देना होगा, जो अधिक श्रमिकों को रोजगार दे सकें.

महिलाओं की कम श्रम भागीदारी भी चिंता का विषय है. 2025 में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर 40 प्रतिशत रही, जबकि पुरुषों में यह 79.1 प्रतिशत थी. श्रम बल से बाहर रहने वाली महिलाओं में 44.4 प्रतिशत ने बच्चों की देखभाल या घरेलू जिम्मेदारियों को इसका प्रमुख कारण बताया. इससे स्पष्ट है कि महिलाओं के रोजगार में घरेलू कामकाज और देखभाल की जिम्मेदारियां बड़ी बाधा हैं.

रोजगार बढ़ाने के लिए क्या किया जाए?

शिक्षा को रोजगार से जोड़ने के लिए कॉलेजों में वेतनयुक्त इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप कार्यक्रमों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है. सरकार और निजी कंपनियां मिलकर इनका खर्च उठा सकती हैं. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी व्यावसायिक शिक्षा और इंटर्नशिप पर जोर दिया गया है, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन की जरूरत है.

इसके साथ ही जिलों की औद्योगिक जरूरतों के अनुसार कौशल प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए. कपड़ा उद्योग वाले जिले में जिस तरह के प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी, वह लॉजिस्टिक्स या खाद्य प्रसंस्करण पर निर्भर जिले से अलग होगी. स्थानीय उद्योगों को कॉलेजों के पाठ्यक्रम तय करने में भागीदारी देनी चाहिए, ताकि युवाओं को ऐसे कौशल मिलें जिनकी बाजार में मांग है.

कपड़ा, जूते, खाद्य प्रसंस्करण और छोटे उद्योग बड़ी संख्या में रोजगार पैदा कर सकते हैं. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को आसान ऋण उपलब्ध कराना और नियमों के अनुपालन को सरल बनाना इस दिशा में उपयोगी कदम हो सकते हैं. महिलाओं के लिए किफायती बाल देखभाल केंद्र, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन और काम के लचीले घंटे उपलब्ध कराना भी जरूरी है.

सरकार को रोजगार संबंधी आंकड़ों में केवल कुल बेरोजगारी दर नहीं, बल्कि युवाओं की बेरोजगारी, रोजगार, शिक्षा और प्रशिक्षण से बाहर युवाओं की हिस्सेदारी तथा अल्परोजगार जैसे संकेतकों को भी प्रमुखता देनी चाहिए. इससे रोजगार की वास्तविक स्थिति को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा.

भारत की 3.1 प्रतिशत बेरोजगारी दर अपने आप में गलत आंकड़ा नहीं है. यह बताती है कि श्रम बल में शामिल कितने लोग काम तलाश रहे हैं, लेकिन उन्हें काम नहीं मिला. यह नहीं बताती कि कितने लोगों को उनकी शिक्षा और कौशल के अनुरूप नौकरी मिली, उनकी आय पर्याप्त है या नहीं और कितने युवा शिक्षा तथा रोजगार, दोनों से बाहर हैं. देश की युवा आबादी को आर्थिक लाभ में बदलने के लिए लक्ष्य केवल लोगों को किसी भी काम में लगाना नहीं, बल्कि उन्हें सम्मानजनक आय और बेहतर भविष्य देने वाले रोजगार उपलब्ध कराना होना चाहिए.

(देवांगी दुगर क्राइस्ट विश्वविद्यालय, दिल्ली-एनसीआर के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज में बीएससी अर्थशास्त्र (ऑनर्स) की तृतीय वर्ष की छात्रा हैं. एस. सुसंथिका इसी संस्थान में सहायक प्राध्यापक हैं. मूल लेख अंग्रेजी में ‘काउंटरकरंट्स’ में पढ़ा जा सकता है. )

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