‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने ब्राजील के साओ पाउलो से वरिष्ठ पत्रकार शोभन सक्सेना के साथ ब्राजील के चुनावी नतीजों, लूला की जीत और दुनिया भर में दक्षिणपंथी राजनीति के बदलते रुझानों पर चर्चा की.
शोभन सक्सेना के अनुसार, ब्राजील में लूला की जीत केवल चुनावी परिणाम नहीं, बल्कि सामाजिक कल्याण की नीतियों और लोकतांत्रिक मूल्यों के समर्थन का संकेत है. उन्होंने बताया कि पहले दौर में फ्लावियो बोल्सोनारो आगे थे, लेकिन दूसरे दौर में लूला ने बढ़त हासिल कर ली. उनके मुताबिक, इस बदलाव में युवाओं, मजदूर संगठनों और बुजुर्ग मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही.
सक्सेना ने कहा कि ब्राजील के युवाओं को आशंका थी कि बोल्सोनारो की सत्ता में वापसी से सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है. इसी चिंता ने छात्रों को विरोध-प्रदर्शनों में भाग लेने और चुनावी प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने बताया कि लूला ने भी युवाओं से संवाद बढ़ाया और सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया. उनके अनुसार, मतदाताओं ने केवल एक नेता का समर्थन नहीं किया, बल्कि उन सामाजिक योजनाओं को बचाने की कोशिश भी की, जिनसे बड़ी आबादी को लाभ मिलता है.
बातचीत में ब्राजील के चुनाव को अमेरिका, हंगरी और अन्य देशों में दक्षिणपंथी राजनीति के उभार के संदर्भ में भी देखा गया. सक्सेना का मानना है कि वैश्वीकरण के लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंचे. आर्थिक असमानता और राजनीतिक व्यवस्था से बढ़ती निराशा ने कई देशों में ऐसे नेताओं के प्रति समर्थन बढ़ाया, जो मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ बोलते हैं. हालांकि, उनके अनुसार, इन नेताओं के भाषणों और उनकी नीतियों के बीच अक्सर अंतर दिखाई देता है.
सक्सेना ने ब्राजील में सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि सामाजिक कल्याण से जुड़ी नीतियां चुनावी फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं. उन्होंने लूला की उम्र और उनके लंबे राजनीतिक अनुभव का उल्लेख करते हुए यह सवाल भी उठाया कि उनके बाद नेतृत्व कौन संभालेगा. उनके मुताबिक, आने वाले वर्षों में सरकार की नीतियां और पार्टी के भीतर उभरने वाले नए नेता उत्तराधिकार की दिशा तय करेंगे.
बातचीत में यह बात उभरकर आई कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है. आर्थिक असमानता, सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता और नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी भी उसकी मजबूती तय करती हैं. सक्सेना के अनुसार, ब्राजील का चुनाव उन लोगों के लिए उम्मीद का संकेत है, जो सामाजिक अधिकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा को जरूरी मानते हैं.
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