हॉर्मुज संकट के छह महीनों में जीवाश्म ईंधन आयात बिल 330 अरब डॉलर से ज्यादा बढ़ा: रिपोर्ट  

'डाउन टू अर्थ' में प्रकाशित पूजा दास की रिपोर्ट के मुताबिक, हॉर्मुज संकट शुरू होने के बाद दुनिया भर में तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल ने जीवाश्म ईंधन आयात करने वाले देशों पर भारी आर्थिक बोझ डाल दिया है. सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की नई रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2026 के अंत से शुरू हुए संकट के बाद छह महीनों में आयातक देशों को जीवाश्म ईंधन के लिए 330 अरब डॉलर से अधिक अतिरिक्त खर्च करना पड़ा.

रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च से अगस्त 2026 के बीच देशों ने औसतन हर महीने करीब 55 अरब डॉलर अतिरिक्त चुकाए. सीआरईए ने इसे 1990 के खाड़ी युद्ध के बाद तेल और गैस की कीमतों में आया सबसे बड़ा और लंबे समय तक जारी रहने वाला झटका बताया है.

इस संकट का असर भारत पर भी गंभीर पड़ा है. 170 देशों के विश्लेषण में भारत दूसरा सबसे बड़ा अतिरिक्त भुगतान करने वाला देश रहा. भारत को मार्च से अगस्त 2026 के बीच जीवाश्म ईंधन आयात पर करीब 22.5 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च करना पड़ा. चीन 35.5 अरब डॉलर के अतिरिक्त खर्च के साथ पहले स्थान पर रहा, जबकि अमेरिका को 16.5 अरब डॉलर अतिरिक्त चुकाने पड़े.

रिपोर्ट में बताया गया कि वैश्विक शिपिंग में व्यवधान के बाद कच्चे तेल, डीजल, पेट्रोल, एलएनजी और जेट ईंधन की कीमतें युद्ध से पहले बाजार की अपेक्षाओं की तुलना में काफी बढ़ गईं. अतिरिक्त खर्च में अकेले कच्चे तेल का हिस्सा 164 अरब डॉलर रहा. कच्चे तेल की कीमतें संकट से पहले के अनुमान से औसतन 35 प्रतिशत अधिक रहीं.

डीजल और गैसोइल की कीमतों में 59 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिससे आयात बिल में करीब 74 अरब डॉलर अतिरिक्त जुड़ गए. पेट्रोल की कीमतें 43 प्रतिशत बढ़ीं और इससे 36 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ा. एलएनजी की कीमतें अटलांटिक क्षेत्र में 60 प्रतिशत और प्रशांत क्षेत्र में 75 प्रतिशत तक बढ़ीं, जिससे करीब 38 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च हुआ. जेट ईंधन की कीमतों में 59 प्रतिशत वृद्धि से 20 अरब डॉलर का अतिरिक्त भार पड़ा.

डीजल ने बढ़ाया महंगाई का दबाव

डीजल की कीमतों में वृद्धि का असर सबसे व्यापक रहा क्योंकि उद्योग, माल परिवहन और कृषि जैसे क्षेत्र बड़े पैमाने पर इस ईंधन पर निर्भर हैं. सीआरईए के विश्लेषण में शामिल 170 देशों में से 134 देशों को डीजल के लिए युद्ध से पहले के बाजार अनुमानों से अधिक कीमत चुकानी पड़ी.

डीजल की बढ़ी कीमतें सीधे तौर पर परिवहन और उत्पादन लागत को प्रभावित करती हैं, जिसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों तक पहुंच सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, पांच महीनों तक डीजल का अतिरिक्त मूल्य 55 प्रतिशत से ऊपर रहा. जून में यह 43 प्रतिशत तक गिरा, लेकिन अगस्त में फिर बढ़कर 65 प्रतिशत हो गया.

इस संकट का बोझ गरीब और निम्न आय वाले देशों पर अपेक्षाकृत अधिक पड़ा है. निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों ने अतिरिक्त जीवाश्म ईंधन लागत पर अपने 2024 के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का करीब 1 प्रतिशत खर्च किया. इसके मुकाबले उच्च आय वाले देशों पर यह बोझ 0.45 प्रतिशत रहा.

स्वच्छ ऊर्जा ने बचाए अरबों डॉलर

सीआरईए का कहना है कि 2020 के बाद जोड़ी गई स्वच्छ ऊर्जा क्षमता ने इस संकट के दौरान आयातक देशों को कुछ राहत भी दी. संकट के शुरुआती पांच महीनों में स्वच्छ बिजली उत्पादन की वजह से कोयला, तेल और गैस के आयात पर अनुमानित 36 अरब डॉलर की बचत हुई. इसमें 10.6 अरब डॉलर की बचत केवल युद्धकाल में बढ़ी हुई कीमतों पर जीवाश्म ईंधन खरीदने से बचने के कारण हुई.

रिपोर्ट यह भी बताती है कि परिवहन और हीटिंग जैसे क्षेत्रों में बिजली आधारित तकनीकों के विस्तार से तेल की मांग कम हो सकती है. इलेक्ट्रिक वाहनों का बढ़ता इस्तेमाल भविष्य में तेल आयात पर निर्भरता घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

सीआरईए के ऊर्जा विश्लेषक ल्यूक विकेंडेन के अनुसार, तेल और गैस की कीमतें लंबे समय से वैश्विक अर्थव्यवस्था और घरेलू बजट के लिए एक कमजोर कड़ी रही हैं. उनका तर्क है कि पिछली ऊर्जा कीमतों की संकटपूर्ण स्थितियों के बाद जिन देशों ने स्वच्छ ऊर्जा में निवेश किया, वे अरबों डॉलर की बचत कर सके.

सीआरईए ने यह विश्लेषण समुद्री मार्ग से आने वाले कच्चे तेल, ईंधन और गैस की वास्तविक कीमतों की तुलना युद्ध से पहले के बाजार अनुमानों से की है. रिपोर्ट में पाइपलाइन गैस, कोयला, ईंधन तेल, नेफ्था, मालभाड़ा और युद्ध जोखिम बीमा जैसी लागतों को शामिल नहीं किया गया है. इसलिए वास्तविक आर्थिक बोझ इससे भी अधिक हो सकता है.

हॉर्मुज संकट ने एक बार फिर दिखाया है कि जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भरता केवल पर्यावरण का सवाल नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा का भी मुद्दा है. भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए बढ़ता आयात बिल यह संकेत देता है कि ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा में निवेश अब केवल भविष्य की नीति नहीं, बल्कि मौजूदा आर्थिक जरूरत बन चुका है.

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