फातिमा अल्ताफ | कुछ भारतीय महिलाओं के लिए नौकरी करना क्यों होता जा रहा है महंगा
23 वर्षीय आयशा ने सामाजिक विज्ञान में मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करने के बाद 2024 में दिल्ली में एक कॉर्पोरेट नौकरी हासिल की. लेकिन 40 हजार रुपये की शुरुआती मासिक सैलरी के साथ एक साल के भीतर ही उसके लिए शहर में टिके रहना मुश्किल होने लगा. सुरक्षित इलाके में पीजी, खाना, यात्रा, राशन और घर पैसे भेजने के बाद उसके पास मुश्किल से एक हजार रुपये की बचत रह जाती थी.
भारत में महिलाओं की कार्यबल भागीदारी बढ़ी है. 2025 के वार्षिक पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे के अनुसार यह 40 प्रतिशत तक पहुंच गई. लेकिन इस आंकड़े के पीछे एक अलग सच्चाई भी छिपी है. बड़ी संख्या में पहली पीढ़ी की दलित और मुस्लिम महिलाएं परिवार और सामाजिक बाधाओं को पार कर शहरों में नौकरी तक तो पहुंच जाती हैं, लेकिन नौकरी पर बने रहने के लिए उन्हें अतिरिक्त आर्थिक और सामाजिक कीमत चुकानी पड़ती है.
लेखिका इसे "इंटरसेक्शनल टैक्स" कहती हैं. यानी जाति, धर्म, लिंग और सामाजिक पृष्ठभूमि से जुड़ी कई असमानताओं की वह अतिरिक्त कीमत, जो कुछ महिलाओं को अपनी आय और बचत से चुकानी पड़ती है.
सुरक्षा की कीमत
दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे शहरों में अकेले काम करने आने वाली महिलाओं के लिए सुरक्षित आवास एक बड़ी जरूरत है. गेटेड पीजी, सुरक्षा गार्ड, मेट्रो के पास घर और ऐसा इलाका जहां रात में लौटने पर डर न हो, इन सबकी कीमत ज्यादा होती है. जबकि शुरुआती स्तर की नौकरियों में वेतन अक्सर 30 से 40 हजार रुपये के बीच होता है.
दिल्ली में काम करने वाली एक युवा मुस्लिम महिला ने सुरक्षित आवास के लिए 16 हजार रुपये मासिक किराया देने की बात कही. इसके बाद उसके पास मुश्किल से दो हजार रुपये बचते थे. देर रात साझा ऑटो के बजाय कैब लेने जैसी जरूरतें भी अतिरिक्त खर्च बन जाती हैं. लेखिका के अनुभव और बातचीत के अनुसार, ये अलग-अलग खर्च किसी नई नौकरी करने वाली महिला की मासिक आय का 10 से 15 प्रतिशत तक हो सकते हैं.
रहने के लिए घर ढूंढना भी चुनौती
दलित और मुस्लिम महिलाओं के लिए आवास बाजार में जाति और धर्म से जुड़ा भेदभाव इन खर्चों को और बढ़ा सकता है. मकान मालिकों की पसंद, नाम और पहचान को लेकर सवाल, कुछ इलाकों तक सीमित कर देना और अधिक शर्तें लगाना जैसी समस्याएं उनके सामने आती हैं.
इसका नतीजा केवल किराया नहीं, बल्कि लंबी यात्रा, ज्यादा परिवहन खर्च, बार-बार ब्रोकर को भुगतान और मानसिक तनाव के रूप में सामने आता है. लेखिका ने जिन मुस्लिम महिलाओं से बातचीत की, उनमें कई ने मुंबई जैसे शहरों में नौकरी लेने से सिर्फ इसलिए परहेज किया क्योंकि वहां घर ढूंढना बेहद कठिन था. उनके लिए नौकरी का सवाल केवल रोजगार का नहीं, बल्कि शहर में सम्मान और सुरक्षा के साथ रहने का भी था.
कामकाजी जीवन की दूसरी कीमतें
महिलाओं के लिए मासिक धर्म से जुड़ी जरूरतें भी कार्यस्थल पर एक अलग चुनौती बनती हैं. भारत में राष्ट्रीय स्तर पर मेंस्ट्रुअल लीव की कोई नीति नहीं है. कई निजी कंपनियों में सीमित संख्या में अर्जित, बीमार और आकस्मिक छुट्टियां मिलती हैं. ऐसे में जिन महिलाओं को हर महीने दर्द या स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण छुट्टी की जरूरत पड़ती है, उनके पास साल के अंत तक निजी कामों या घर जाने के लिए बहुत कम छुट्टियां बचती हैं.
एक जैसी सैलरी, लेकिन अलग वास्तविकता
कल्पना कीजिए कि दो महिलाओं को दिल्ली में 40 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता है. एक सामाजिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि से आती है और दूसरी पहली पीढ़ी की दलित या मुस्लिम महिला है. दोनों की सैलरी समान है, लेकिन सुरक्षित घर, यात्रा, सामाजिक भेदभाव और सीमित समर्थन नेटवर्क जैसी परिस्थितियों के कारण दूसरी महिला की वास्तविक आर्थिक स्थिति कहीं अधिक कठिन हो सकती है.
यही अंतर समय के साथ बचत और भविष्य के अवसरों को प्रभावित करता है. कम बचत का मतलब है आगे की पढ़ाई में निवेश करना मुश्किल होना, बेरोजगारी के दौरान टिके रहना कठिन होना या खराब नौकरी छोड़ने का जोखिम न उठा पाना.
भारत में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने की चर्चा अक्सर कौशल, परिवार और पितृसत्तात्मक बाधाओं तक सीमित रहती है. लेकिन असली समानता के लिए यह समझना भी जरूरी है कि कुछ महिलाओं को नौकरी पाने के बाद भी कार्यबल में बने रहने के लिए अतिरिक्त कीमत क्यों चुकानी पड़ती है.
नीतियों में शहरी दलित और मुस्लिम महिलाओं जैसी अलग सामाजिक श्रेणियों के अनुभवों को समझे बिना औसत आंकड़ों के आधार पर समाधान अधूरे रहेंगे. सवाल केवल महिलाओं को नौकरी तक पहुंचाने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का भी है कि उनके लिए नौकरी करना और उस पर टिके रहना आर्थिक रूप से असंभव न बन जाए.
(फातिमा अल्ताफ सार्वजनिक नीति और सरकारी परामर्श के क्षेत्र में अनुभव रखने वाली विकास क्षेत्र की पेशेवर हैं. यह 'स्क्रोल' में प्रकाशित उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है. )

