डॉ. माडभूषि श्रीधर | पत्थर के जवाब में ऐके-47? न्यायपालिका और विधायिका को ‘हम भारत के लोग’ का सामना करना होगा
दिल्ली में छात्र प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई ने राज्य की ताकत, पुलिस के बल प्रयोग और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर गंभीर बहस खड़ी कर दी है. सवाल यह है कि अगर प्रदर्शन के दौरान भीड़ की ओर से पत्थरबाजी होती है, तो जवाब में राज्य कितनी ताकत का इस्तेमाल कर सकता है? क्या कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर ऐसी कार्रवाई उचित है, जो किसी सैन्य अभियान जैसी दिखाई दे? और आखिर “न्यूनतम बल” की सीमा कौन तय करेगा?
20 जुलाई, 2026 को सिविल सेवा परीक्षाओं में कथित पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर आयोजित “संसद चलो” मार्च के दौरान रैपिड एक्शन फोर्स यानी आरएएफ की कार्रवाई इस बहस के केंद्र में है. पूर्व आईपीएस अधिकारी और इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व विशेष निदेशक यशोवर्धन झा आजाद तथा घायल छात्र प्रदर्शनकारियों की ओर से आरोप लगाया गया कि सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर पंप-एक्शन गन से धातु के छर्रों का इस्तेमाल किया. याचिका में दावा किया गया कि इससे पहले पानी की बौछार जैसे कम कठोर उपायों का पर्याप्त इस्तेमाल नहीं किया गया और जब कुछ छात्र हाथ ऊपर करके पीछे हट रहे थे, तब भी उनकी ओर छर्रे दागे गए.
इन आरोपों ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पैदा किया है. पुलिस और सुरक्षाकर्मियों को अपनी रक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है. भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 34 से 44 निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का कानूनी ढांचा निर्धारित करती हैं. धारा 37 इस सिद्धांत को रेखांकित करती है कि प्रतिरक्षा में जरूरत से अधिक नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता. वहीं धारा 38 उन गंभीर परिस्थितियों को निर्धारित करती है, जिनमें निजी प्रतिरक्षा का अधिकार हमलावर की मृत्यु कारित करने तक विस्तारित हो सकता है. इनमें मृत्यु या गंभीर चोट की आशंका, बलात्कार, अपहरण और एसिड हमले जैसी स्थितियां शामिल हैं.
इसी आधार पर सवाल उठता है कि प्रदर्शनकारियों से निपटते समय राज्य की प्रतिक्रिया खतरे के अनुपात में थी या नहीं. आत्मरक्षा का उद्देश्य आसन्न खतरे को रोकना है, न कि दंड देना या बदला लेना. यदि प्रदर्शनकारी पीछे हट रहे हों और उनके खिलाफ गंभीर चोट पहुंचाने में सक्षम हथियार इस्तेमाल किए जाएं, तो कार्रवाई की आवश्यकता और आनुपातिकता की जांच जरूरी हो जाती है.
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने केंद्र सरकार को जंतर-मंतर पर तैनात आरएएफ कर्मियों के गोला-बारूद संबंधी रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश दिया. दिल्ली सरकार को घायल याचिकाकर्ताओं और समान रूप से प्रभावित लोगों के लिए तत्काल और पर्याप्त चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित करने को भी कहा गया. इन निर्देशों का महत्व इसलिए है क्योंकि इससे घटनास्थल पर हुए बल प्रयोग की मात्रा और प्रकृति से जुड़े साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की कोशिश हुई.
हालांकि अदालत ने पैलेट गन पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग को लेकर सावधानी भी दिखाई. अदालत के सामने यह बात आई कि पुलिस के दिशा-निर्देश असाधारण परिस्थितियों में “चरणबद्ध प्रतिक्रिया” के तहत ऐसे हथियारों के इस्तेमाल की अनुमति देते हैं. अदालत ने यह भी इंगित किया कि मौजूदा याचिका में इन हथियारों के इस्तेमाल को अधिकृत करने वाले मूल नियमों को सीधे चुनौती नहीं दी गई है. इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ या नहीं, बल्कि यह भी है कि उस समय ऐसी परिस्थितियां मौजूद थीं या नहीं, जिनमें उनका इस्तेमाल आवश्यक और आनुपातिक माना जा सके.
इस विवाद की गूंज संसद में भी सुनाई दी. 30 जुलाई को राज्यसभा सांसद मुकुल वासनिक ने छात्रों के खिलाफ हुई कार्रवाई को लेकर सरकार की आलोचना की. उन्होंने आरोप लगाया कि युवाओं पर लाठियां चलाई गईं, पैलेट गन और आंसू गैस का इस्तेमाल हुआ. उन्होंने संसद भवन परिसर में आधुनिक स्वचालित हथियारों के साथ सुरक्षा बलों की तैनाती का जिक्र करते हुए कहा कि माहौल ऐसा दिखाई दे रहा था, मानो किसी आतंकवादी खतरे का सामना करने की तैयारी हो. वासनिक के मुताबिक, दिल्ली की सड़कों पर हुई घटनाओं ने केंद्र सरकार की राजनीतिक विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया है.
पूरे विवाद का केंद्रीय प्रश्न “न्यूनतम बल” के सिद्धांत से जुड़ा है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में परीक्षा, रोजगार, शिक्षा या राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दों पर नागरिकों का प्रदर्शन सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती हो सकता है, लेकिन उसे सैन्य संघर्ष की तरह नहीं देखा जा सकता. कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल प्रयोग आवश्यक हो सकता है, लेकिन उसकी वैधता आवश्यकता, आनुपातिकता और जवाबदेही पर निर्भर करती है.
राज्य के पास नागरिकों से कहीं अधिक शक्ति और संसाधन होते हैं. इसलिए उस पर संयम की जिम्मेदारी भी अधिक होती है. अगर “चरणबद्ध प्रतिक्रिया” का सिद्धांत व्यवहार में अत्यधिक बल प्रयोग में बदल जाए, तो सवाल केवल पुलिस कार्रवाई का नहीं रहता, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक और राज्य के रिश्ते का बन जाता है.
जंतर-मंतर की घटना की अंतिम कानूनी तस्वीर न्यायिक प्रक्रिया और साक्ष्यों से स्पष्ट होगी. लेकिन इससे उठा बुनियादी सवाल अभी भी कायम है कि विरोध कर रहे नागरिकों से निपटने के लिए राज्य कितनी ताकत इस्तेमाल कर सकता है. लोकतंत्र में कानून-व्यवस्था जरूरी है, लेकिन उसकी रक्षा कानून के शासन, आनुपातिकता और जवाबदेही से होनी चाहिए, हथियारों की छाया से नहीं.
मीडिया लॉ के प्रोफेसर डॉ. माडभूषि श्रीधर का यह लेख काउंटरकरेंट्स में प्रकाशित हुआ है. मूल अंग्रेजी लेख यहां पढ़ सकते हैं.

