एम. राजशेखर | भारत अपने डेटा सेंटरों को ऊर्जा कैसे दे?

‘कार्बनकॉपी’ में प्रकाशित अपने विश्लेषण में पत्रकार एम. राजशेखर ने भारत में तेजी से बढ़ रहे डेटा सेंटर उद्योग और उससे जुड़ी बिजली, पानी, पर्यावरण तथा सार्वजनिक संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभावों की पड़ताल की है. उनका कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ देश में डेटा सेंटरों की क्षमता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इस विकास के साथ कई गंभीर नीतिगत और पर्यावरणीय चुनौतियां भी सामने आ रही हैं.

नए खिलाड़ियों की एंट्री.

भारत में डेटा सेंटर उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है. आंध्र प्रदेश का विशाखापत्तनम इस दौड़ का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभर रहा है, जहां गूगल, रिलायंस, आरएमजेड-कोल्ट और सिफी जैसी कंपनियां बड़े डेटा सेंटर स्थापित कर रही हैं. अकेले इस जिले में करीब 6 गीगावॉट (जीडब्ल्यू) क्षमता के डेटा सेंटर विकसित होने की संभावना है, जबकि 2025 तक पूरे भारत की कुल स्थापित क्षमता लगभग 2.2 जीडब्ल्यू थी.

अब वैश्विक टेक कंपनियां खुद डेटा सेंटर विकसित करने के बजाय अडानी, रिलायंस और आरएमजेड जैसे भारतीय समूहों के साथ साझेदारी कर रही हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह जमीन, बिजली, पानी और सरकारी मंजूरियों तक उनकी आसान पहुंच है. इससे भारत का डेटा सेंटर बाजार दो हिस्सों में बंटता दिखाई दे रहा है. एक ओर बड़े कारोबारी समूह हैं, जबकि दूसरी ओर तकनीकी विशेषज्ञ पारंपरिक डेटा सेंटर ऑपरेटर.

सौ मेगावॉट बनाम एक गीगावॉट.

करीब 100 मेगावॉट (एमडब्ल्यू) तक के डेटा सेंटर मौजूदा बिजली ग्रिड से संचालित किए जा सकते हैं, लेकिन 1 जीडब्ल्यू या उससे बड़े डेटा सेंटरों के लिए नई बिजली व्यवस्था तैयार करनी होगी. इतनी बिजली किसी एक स्रोत से उपलब्ध नहीं हो सकती. इसके लिए कई बिजली उत्पादकों, ऊर्जा भंडारण और अलग ट्रांसमिशन नेटवर्क की जरूरत पड़ेगी.

इसी वजह से आंध्र प्रदेश ने गूगल-अडानी परियोजना को अपनी बिजली वितरण व्यवस्था संचालित करने की अनुमति दी है. उत्तर प्रदेश भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है, जबकि तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्य डेटा सेंटरों को सरकारी बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के जरिए दोहरी बिजली आपूर्ति देने की नीति अपना रहे हैं.

डिस्कॉम बनाम 'डीम्ड डिस्कॉम'.

दुनिया के कई देशों में बड़े डेटा सेंटर अब बिजली ग्रिड से अलग होकर अपनी ऊर्जा व्यवस्था विकसित कर रहे हैं. अमेरिका में माइक्रोसॉफ्ट ने परमाणु ऊर्जा संयंत्र से बिजली लेने का फैसला किया, जबकि गूगल, मेटा और अमेजन जैसी कंपनियां प्राकृतिक गैस और कोयले से भी बिजली खरीद रही हैं.

भारत में भी यही सवाल खड़ा हो रहा है कि यदि डेटा सेंटर अपनी अलग बिजली व्यवस्था बनाएंगे तो वे नवीकरणीय ऊर्जा अपनाएंगे या फिर कोयला और गैस आधारित बिजली पर निर्भर होंगे. यदि दूसरा विकल्प चुना गया तो भारत के कार्बन उत्सर्जन में बढ़ोतरी हो सकती है.

कई राज्य सरकारें डेटा सेंटरों को बिजली शुल्क, ट्रांसमिशन शुल्क और अन्य करों में भारी छूट दे रही हैं. आंध्र प्रदेश ने गूगल और रिलायंस को 15 वर्षों तक रियायती दर पर बिजली देने का फैसला किया है. विश्लेषण में आगाह किया गया है कि इन रियायतों और नई बिजली लाइनों का खर्च अंततः आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है.

आयरलैंड का उदाहरण भी दिया गया है, जहां डेटा सेंटर अब देश की कुल बिजली का लगभग 22 प्रतिशत इस्तेमाल करते हैं. बढ़ती मांग के कारण वहां बिजली की लागत बढ़ी और घरेलू उपभोक्ताओं के बिलों पर भी असर पड़ा. इसके बाद सरकार को डेटा सेंटरों के लिए नए नियम बनाने पड़े.

बड़े भाषा मॉडल बनाम छोटे भाषा मॉडल.

डेटा सेंटरों की भविष्य की मांग काफी हद तक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पर निर्भर करेगी. पारंपरिक क्लाउड सर्वर की तुलना में एआई सर्वर कई गुना अधिक बिजली की खपत करते हैं.

हालांकि फिलहाल भारत में एआई की वास्तविक मांग उतनी बड़ी नहीं दिख रही, जितनी परियोजनाओं की घोषणाओं से अनुमान लगाया जा रहा है. कई कंपनियां 100 एमडब्ल्यू क्षमता वाले डेटा सेंटर की घोषणा कर रही हैं, लेकिन शुरुआत केवल 10 एमडब्ल्यू से कर रही हैं. यदि भविष्य में स्मॉल लैंग्वेज मॉडल (एसएलएम) अधिक प्रभावी साबित होते हैं और लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) पर उनकी निर्भरता बढ़ती है, तो बिजली और कंप्यूटिंग की मांग भी अनुमान से कम रह सकती है.

ऊर्जा कंपनी या रियल एस्टेट का खेल?

भारत के बड़े कारोबारी समूह अब केवल डेटा सेंटर नहीं बना रहे, बल्कि उनके पास बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन, सौर ऊर्जा, कोयला खदान और वितरण नेटवर्क भी मौजूद हैं. ऐसे में अडानी और ग्रीनको जैसी कंपनियों को पारंपरिक डेटा सेंटर ऑपरेटरों की तुलना में बड़ा प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सकता है.

यदि भविष्य में डेटा सेंटरों की मांग अनुमान से कम रही, तब भी इन कंपनियों के पास जमीन, पानी और सरकारी रियायतों जैसी मूल्यवान परिसंपत्तियां बनी रहेंगी. इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा और सार्वजनिक निवेश, दोनों पर असर पड़ सकता है.

बिजली की तरह पानी का भी सवाल.

एक 100 एमडब्ल्यू डेटा सेंटर को ठंडा रखने के लिए प्रतिदिन लगभग 20 लाख लीटर पानी की जरूरत पड़ सकती है. राष्ट्रीय स्तर पर यह मात्रा कृषि की तुलना में बहुत कम है, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह गंभीर चुनौती बन सकती है.

विशाखापत्तनम, नवा रायपुर और मुंबई जैसे शहर पहले से जल संकट का सामना कर रहे हैं. ऐसे क्षेत्रों में बड़े डेटा सेंटरों को लगातार पानी उपलब्ध कराना स्थानीय आबादी के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है.

लेख में यह भी बताया गया है कि विशाखापत्तनम के प्रस्तावित कई डेटा सेंटर वन्यजीव अभयारण्यों के बेहद करीब बनाए जा रहे हैं, जिससे पर्यावरण संबंधी चिंताएं बढ़ रही हैं. इसके बावजूद केंद्र और राज्य सरकारें इस क्षेत्र को हजारों करोड़ रुपये की रियायतें दे रही हैं, जबकि इन परियोजनाओं से अपेक्षाकृत कम रोजगार पैदा होंगे और भारत को एआई तकनीक में निर्णायक बढ़त मिलने की भी कोई गारंटी नहीं है.

अंत में एम. राजशेखर निष्कर्ष निकालते हैं कि भारत फिलहाल डेटा सेंटरों को आकर्षित करने की होड़ में ऊर्जा, पानी, पर्यावरण और सार्वजनिक संसाधनों पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों का पर्याप्त आकलन नहीं कर रहा है. उनके मुताबिक यदि स्पष्ट नीतियां और संतुलित नियमन नहीं बनाए गए तो डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार का आर्थिक और पर्यावरणीय बोझ अंततः आम नागरिकों को उठाना पड़ सकता है.

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