दिल्ली एसआईआर में 47.7 लाख मतदाता बाहर, कमजोर मतदाताओं की सुरक्षा के अपने ही नियमों की अनदेखी करता चुनाव आयोग
‘आर्टिकल-14’ में पत्रकार अरित्रि दास की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के बाद जारी मसौदा मतदाता सूची से 47.7 लाख मतदाताओं को बाहर कर दिया गया. यह राजधानी के लगभग हर तीन मतदाताओं में से एक के नाम के बाहर होने के बराबर है. रिपोर्ट में ऐसे घरेलू कामगारों, कबाड़ संग्रहकर्ताओं और झुग्गी में रहने वाले लोगों के मामले सामने आए हैं, जिनके पास मतदाता पहचान पत्र है और जो पहले चुनावों में मतदान कर चुके हैं, लेकिन इस बार उन्हें फॉर्म और सत्यापन प्रक्रिया में पर्याप्त सहायता नहीं मिली.
फॉर्म और सत्यापन की मुश्किल
दक्षिण-पूर्वी दिल्ली की बंगाली कॉलोनी में रहने वाली 42 वर्षीय घरेलू कामगार मीनू चौधरी का नाम भी मसौदा सूची से बाहर है. उनका कहना है कि तुगलकाबाद के बीएलओ ने उनसे उनके पति के मतदाता पहचान पत्र की जानकारी मांगी, लेकिन पिछले 18 वर्षों से उनका पति से कोई संपर्क नहीं है. उनका नाम एएसडीडी सूची में ‘अनुपस्थित’ श्रेणी में दर्ज किया गया.
एसआईआर के दौरान मतदाताओं को अपनी पहचान और पात्रता की पुष्टि के लिए गणना फॉर्म भरना था. इसमें मौजूदा मतदाता पहचान पत्र और 2002 की मतदाता सूची में माता-पिता या पति-पत्नी से जुड़े विवरण जैसी जानकारी मांगी गई. रिपोर्ट के अनुसार, रोजाना मजदूरी करने वाले, प्रवासी, सीमित साक्षरता वाले और बेघर लोगों के लिए यह प्रक्रिया विशेष रूप से कठिन रही.
बेघर मतदाताओं के लिए क्या हैं नियम
चुनाव आयोग के मार्च 2023 के मैनुअल के नियम 7.5 और 8.5 में बेघर मतदाताओं के पंजीकरण और सत्यापन के लिए विशेष प्रावधान हैं. बीएलओ को बिना सामान्य निवास के दस्तावेज के भी ऐसे मतदाताओं का नाम दर्ज करने और उनके बताए पते पर जाकर यह सत्यापित करने की जिम्मेदारी दी गई है कि वे वहां एक रात से अधिक समय बिताते हैं.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत के मुताबिक, पहले बीएलओ और चुनाव पंजीकरण अधिकारी मतदान केंद्रों पर रविवार को शिविर लगाकर फॉर्म भरने और समस्याओं के समाधान में मदद करते थे. उनके अनुसार, जिन क्षेत्रों में अधिकारियों ने ऐसी सहायता की, वहां विलोपन 5% से अधिक नहीं रहा.
तुगलकाबाद में 48% नाम बाहर
दिल्ली में एसआईआर से पहले भी मतदाता सूची में बड़ा बदलाव हुआ था. 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद करीब 13 लाख मतदाता हटाए गए और 1.6 लाख जोड़े गए, जिससे मतदाताओं की संख्या में लगभग 11 लाख की शुद्ध कमी हुई.
रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के पहले छह महीनों में एसआईआर शुरू होने से पहले अकेले तुगलकाबाद विधानसभा क्षेत्र में 16,500 से अधिक नाम हटाए गए. 31 अगस्त को जारी एसआईआर के मसौदे में तुगलकाबाद में 48% मतदाता बाहर रह गए, जो दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में सबसे अधिक था.
जीवित लोगों को ‘मृत’, विस्थापितों को ‘स्थानांतरित’
चांदनी चौक के एक मतदान केंद्र पर 729 में से 728 मतदाताओं को एएसडीडी सूची में डाल दिया गया. इनमें यमुना के किनारे डीडीए की कार्रवाई के बाद आसपास रहने वाले लोग भी शामिल थे. रिपोर्ट में ऐसे मामले भी दर्ज हैं जहां जीवित मतदाताओं को ‘मृत’ और फॉर्म जमा नहीं होने वाले लोगों को ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’ बताया गया.
एसआईआर के मसौदे में शामिल 47.7 लाख मतदाताओं में 30 लाख से ज्यादा को ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’ और करीब 11.7 लाख को ‘अनुपस्थित/पता नहीं चला’ श्रेणी में रखा गया. रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मामलों में बीएलओ की रिपोर्ट और अंतिम एएसडीडी सूची में दर्ज कारणों के बीच भी अंतर मिला.
झुग्गियों और प्रवासी मजदूरों पर असर
यमुना के बाढ़ क्षेत्र की झुग्गी बस्ती में रहने वाली 26 वर्षीय घरेलू कामगार प्रीति और उनकी मां माया देवी के नाम भी ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’ श्रेणी में डाल दिए गए. दोनों के पास मतदाता पहचान पत्र होने और पहले मतदान करने के बावजूद उनका दावा है कि उन्हें गणना फॉर्म नहीं दिया गया.
बिहार से दिल्ली आकर आठ वर्षों से रह रहे 40 वर्षीय कबाड़ संग्रहकर्ता पिंटू कुमार का नाम भी ‘अनुपस्थित/पता नहीं चला’ श्रेणी में रखा गया. उनका कहना है कि काम के कारण वह फॉर्म जमा करने की समय-सीमा से चूक गए और उन्हें यह पता नहीं चला कि बीएलओ उनके घर आया था या नहीं.
अब सुनवाई और अपील का चरण
दिल्ली में मसौदा सूची पर दावे और आपत्तियां दर्ज करने की प्रक्रिया जारी है. रिपोर्ट के अनुसार, मसौदा सूची में शामिल करीब 30% मतदाताओं को दस्तावेज सत्यापन और सुनवाई के लिए नोटिस दिए जा रहे हैं. इनमें 19 लाख मतदाता सॉफ्टवेयर द्वारा चिन्हित 11 ‘तार्किक विसंगतियों’ और 13 लाख ‘अनमैप्ड’ मतदाता शामिल हैं.
एएसडीडी सूची में शामिल लोग 30 सितंबर तक दावा और आपत्ति दाखिल कर सकते हैं. अंतिम मतदाता सूची 4 नवंबर को प्रकाशित होने वाली है. इस पूरी प्रक्रिया में बड़ा सवाल यही है कि जिन मतदाताओं के नाम हटे हैं, उन्हें अपने मताधिकार को साबित करने और सूची में वापस आने के लिए चुनाव आयोग से कितनी प्रभावी सहायता मिलती है.

