हार्वर्ड के मित्तल संस्थान ने नौ दिवसीय हिंदू कथा की बुकिंग में मदद की, फिर उसके अपने फ़ैकल्टी ने विरोध कर दिया
अगस्त के महीने में नौ दिनों तक प्रतिदिन लगभग 1,000 श्रद्धालुओं की भीड़ हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के ऐतिहासिक 'सैंडर्स थिएटर' में एक भारतीय आध्यात्मिक गुरु द्वारा भगवान राम के जीवन चरित्र का पाठ सुनने के लिए उमड़ी. यह एक भक्तिमय मैराथन थी, जिसे भारतीय मीडिया आउटलेट्स ने हार्वर्ड के लिए एक ऐतिहासिक क्षण के रूप में कवर किया.
लेकिन पर्दे के पीछे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी हफ्तों से इस आयोजन से अपना नाम पूरी तरह अलग करने की जद्दोजहद में लगी हुई थी, जैसा कि ‘द क्रिमसन’ में अमन्न एस. महाजन की रिपोर्ट में बताया गया है.
15 से 23 अगस्त तक आयोजित यह "राम कथा" भारतीय आध्यात्मिक गुरु मोरारी बापू के मार्गदर्शन में हुई. इसका वित्तपोषण 'हाउस ऑफ लॉर्ड्स' के कंजर्वेटिव सदस्य लॉर्ड डोलर पोपट के बेटे पावन पोपट द्वारा संचालित एक ब्रिटिश चैरिटी संस्था ने किया था. इस धार्मिक आयोजन के साथ प्राचीन महाकाव्य रामायण पर एक अकादमिक सम्मेलन भी प्रस्तावित था. इसे व्यवस्थित करने, प्रचारित करने और सैंडर्स थिएटर की बुकिंग कराने में हार्वर्ड के 'साउथ एशिया इंस्टीट्यूट' (2003 में स्थापित और इस्पात उद्योगपति लक्ष्मी एन. मित्तल से $2.5 करोड़ के दान के बाद 2017 में 'लक्ष्मी मित्तल एंड फैमिली साउथ एशिया इंस्टीट्यूट' नामांकित) ने शुरुआती मदद की थी.
हालाँकि, गर्मियों के दौरान मित्तल इंस्टीट्यूट की अपनी संचालन समिति (स्टीयरिंग कमेटी) के सदस्यों और हार्वर्ड के कई वरिष्ठ फ़ैकल्टी सदस्यों ने तीखा विरोध शुरू कर दिया. उनका तर्क था कि एक अकादमिक संस्था को ऐसे नौ दिवसीय भक्ति आयोजन से अपना नाम नहीं जोड़ना चाहिए, जिसका मुख्य उद्देश्य गैर-हार्वर्ड दर्शक हैं और जिसके भारत में गहरे राजनीतिक प्रभाव हैं.
विवाद बढ़ता देख यह मामला हार्वर्ड के शीर्ष कानूनी सलाहकारों (ओजीसी) और जनसंपर्क कार्यालय (एचपीएसी) तक पहुँचा. जुलाई के अंत तक संस्थान ने इस आयोजन से पूरी तरह पीछे हटने का फैसला कर लिया. संस्थान ने अपने वेब पेज से सम्मेलन का ब्योरा हटा दिया और सैंडर्स थिएटर की बुकिंग से भी अपना नाम वापस ले लिया. यहाँ तक कि कथा का प्रचार करने वाली एक वेबसाइट के यूआरएल से "atHarvard" शब्द भी हटा दिया गया.
संस्थान के कार्यकारी निदेशक हितेश राठी ने ‘द क्रिमसन’ को बताया, "सभी हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद यह सहमति बनी कि पूरा आयोजन संस्थान से स्वतंत्र रहकर अपनी पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार ही आगे बढ़ेगा."
कथा के आयोजन की योजना और शुरुआती बाधाएँ
आयोजन की पृष्ठभूमि 2024 की शुरुआत से बनती है, जब उद्यमी पावन पोपट ने हार्वर्ड के विभिन्न विभागों से संपर्क साधना शुरू किया. पोपट ने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल, मित्तल इंस्टीट्यूट और यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट कार्यालय सहित 10 से 15 प्रोफेसरों व प्रशासकों से बात की. कई लोगों ने विचार को सराहा, लेकिन कहा कि इतने बड़े पैमाने के आयोजन को संभालना उनके लिए संभव नहीं होगा.
आयोजन का आकार ही एकमात्र बाधा नहीं था. डिविनिटी स्कूल के प्रोफेसर फ्रांसिस एक्स. क्लूनी के अनुसार, उन्होंने आयोजकों से कहा था कि कथा जैसा भक्ति आयोजन किसी यूनिवर्सिटी परिसर के बजाय मंदिर में अधिक उपयुक्त रहेगा और अगस्त का महीना फ़ैकल्टी व छात्रों की उपस्थिति के लिहाज़ से कठिन है. वहीं, हिंदू अध्ययन के सहायक प्रोफेसर स्वयं बगारिया ने स्पष्ट किया कि हार्वर्ड किसी विशुद्ध सांस्कृतिक या धार्मिक कार्यक्रम की मेजबानी नहीं कर सकता.
हालाँकि, पोपट ने इन दावों का खंडन करते हुए कहा कि क्लूनी ने स्वयं कथा के एक शाम के सत्र में वक्तव्य दिया था और बगारिया भी आयोजन से कुछ सप्ताह पहले तक जुड़े हुए थे.
मित्तल इंस्टीट्यूट की मुख्य रुचि रामायण पर केंद्रित अकादमिक सम्मेलन में थी. हितेश राठी मुख्य संपर्क व्यक्ति बने रहे, बगारिया ने वक्ताओं की सूची तैयार की और जुलाई 2025 में संस्थान की अंतरिम फ़ैकल्टी निदेशक बनीं प्रोफेसर डायना एक भी बाद में इससे जुड़ गईं. आयोजकों को पहले ही चेताया गया था कि विद्वानों के विचार पारंपरिक श्रद्धालुओं को असहज कर सकते हैं, जिस पर पोपट ने सहमति व्यक्त की थी.
शुरुआत में पोपट 2025 का समय चाहते थे, लेकिन सैंडर्स थिएटर का निर्माण कार्य टलने से अगस्त 2024 का स्लॉट मिल गया. राठी ने भारत में पोपट और मोरारी बापू से मुलाकात कर रूपरेखा तय की, लेकिन स्पष्ट कर दिया कि इस आयोजन को "हार्वर्ड का आधिकारिक आयोजन" बनाकर प्रचारित नहीं किया जा सकता.
वित्तपोषण का पूरा भार पावन पोपट की यू.के. पंजीकृत चैरिटी 'TRUDANA' और अमेरिका की 'ट्रुथ लव एंड कम्पैशन' संस्था ने उठाया. उन्होंने अकादमिक सम्मेलन का खर्च उठाने का भी प्रस्ताव दिया.
"मूल रूप से एक धार्मिक और विशिष्ट वर्गीय आयोजन"
जब मित्तल इंस्टीट्यूट ने फ़ैकल्टी सदस्यों को ईमेल भेजकर कथा और अकादमिक सम्मेलन को एक पैकेज के रूप में प्रस्तुत किया, तो यूनिवर्सिटी के भीतर तुरंत विरोध के स्वर उभरने लगे.
इतिहास की प्रोफेसर माया आर. जसनाव ने इस पर चिंता जताई कि यह विशुद्ध रूप से एक भक्ति कार्यक्रम है. उन्होंने तर्क दिया, "हार्वर्ड में पोप लियो या दलाई लामा जैसे धार्मिक नेताओं को व्याख्यान के लिए आमंत्रित करना पूरी तरह से हमारे अकादमिक सिद्धांतों के अनुकूल है. लेकिन किसी विशिष्ट धार्मिक संप्रदाय के अनुयायियों के लिए नौ दिनों तक भक्ति आयोजन की मेजबानी करना इससे बिल्कुल अलग बात है."
एक अन्य फ़ैकल्टी सदस्य, इतिहास के प्रोफेसर अनुराभ घोष ने कहा, "मेरी मुख्य चिंता यह है कि यह मूल रूप से एक धार्मिक और विशिष्ट वर्गीय आयोजन है. हार्वर्ड जैसे तटस्थ संस्थान को इससे किसी भी रूप में नहीं जुड़ना चाहिए."
16 जुलाई को प्रोफेसर जसनाव और अन्य फ़ैकल्टी सदस्यों ने अंतरराष्ट्रीय मामलों के वाइस प्रोवोस्ट मार्क सी. इलिऑट और प्रोवोस्ट जॉन एफ. मैनिंग को पत्र लिखकर हार्वर्ड की 'संस्थागत तटस्थता नीति' का हवाला दिया. यह नीति यूनिवर्सिटी नेतृत्व और विभागों को ऐसे सार्वजनिक व संवेदनशील मामलों पर आधिकारिक रुख अपनाने से रोकती है जो हार्वर्ड के मुख्य अकादमिक कार्यक्षेत्र से बाहर आते हैं.
राम पूजा पिछले तीन दशकों से भारतीय राजनीति का अत्यंत संवेदनशील विषय रही है. 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ढाँचे को ढहाए जाने, उसके बाद हुए दंगों, 2019 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और जनवरी 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राम मंदिर के उद्घाटन के घटनाक्रमों के बीच, मोरारी बापू द्वारा मंदिर निर्माण हेतु 11.3 करोड़ रुपये का दान देना भी सुर्खियों में रहा था. जसनाव ने आशंका जताई कि इस आयोजन से जुड़कर हार्वर्ड भारत के एक अत्यंत विवादास्पद राजनीतिक मुद्दे में एक 'पक्ष' बनता हुआ दिखेगा.
हार्वर्ड का पीछे हटना और स्वतंत्र अनुबंध
विवाद बढ़ता देख 19 जुलाई को एक ज़ूम बैठक आयोजित की गई. शुरुआत में कथा और सम्मेलन को अलग-अलग करने का प्रस्ताव रखा गया. लेकिन जब फ़ैकल्टी ने पूछा कि अकादमिक सम्मेलन का वित्तपोषण कौन कर रहा है, तो पता चला कि वही दानदाता अकादमिक वक्ताओं का खर्च भी उठा रहा है. इससे हितों के टकराव का सवाल खड़ा हो गया.
कानूनी सलाहकारों (ओजीसी) से परामर्श के बाद, 29 जुलाई को हितेश राठी ने संचालन समिति को सूचित किया कि मित्तल इंस्टीट्यूट इस आयोजन से अपना नाम, ब्रांडिंग और संबद्धता पूरी तरह वापस ले रहा है.
संबद्धता समाप्त होने के बाद पावन पोपट के संगठन को सैंडर्स थिएटर के साथ एक स्वतंत्र व्यावसायिक संस्था के रूप में नया अनुबंध करना पड़ा, जिसके लिए उन्हें गैर-अकादमिक और व्यावसायिक दरों पर काफी अधिक भुगतान करना पड़ा.
ब्रांडिंग मिटाने की कोशिश और अंतिम विवाद
कथा शुरू होने से पहले हार्वर्ड प्रशासन ने आयोजन के सभी प्रचार माध्यमों से हार्वर्ड का नाम हटाने का दबाव बनाया. तुलनात्मक साहित्य के प्रोफेसर होमी के. भाभा के विरोध के बाद "atHarvard" वाले यूआरएल को इंटरनेट से हटा दिया गया. आयोजकों ने यह भी प्रतिबद्धता जताई कि मंच पर कोई भी राजनीतिक वक्ता या राजनीतिक दल का पदाधिकारी शामिल नहीं होगा. इसके बावजूद, उद्घाटन सत्र में हितेश राठी और डायना एक ने व्यक्तिगत क्षमता में भाग लिया और अपने विचार रखे.
हालाँकि हार्वर्ड ने आधिकारिक तौर पर नाम वापस ले लिया था, लेकिन भारतीय मीडिया में सैंडर्स थिएटर और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का नाम छाया रहा. आयोजन के पहले दिन लॉर्ड डोलर पोपट ने मंच से सैंडर्स थिएटर में राम कथा के आयोजन को "इतिहास रचने वाला" और "एक सपने का सच होना" करार दिया.
21 अगस्त को 'कास्टलेस कॉकस' नामक छात्र समूह ने हार्वर्ड के कानूनी कार्यालय को पत्र लिखकर सवाल उठाया कि जब कोई प्रतिष्ठित संस्थान ऐसे सांस्कृतिक पाठ को मंच देता है जो जाति और लिंग के पदानुक्रम को बल देता है, तो उसकी निष्पक्षता पर क्या प्रभाव पड़ता है? इसके जवाब में डायना एक ने स्पष्ट किया कि वाल्मीकि रामायण, भगवद-गीता, बाइबिल और टोरा जैसे प्राचीन ग्रंथों में सामाजिक पदानुक्रम के मुद्दे शामिल हैं, लेकिन एक शिक्षक के रूप में उनका अध्ययन और व्याख्या करना अकादमिक रुचि का विषय है.
संस्थान द्वारा बनाए गए तमाम अकादमिक अंतर और तटस्थता के दावों के बावजूद, कथा के नौवें और अंतिम दिन मोरारी बापू ने व्यासपीठ से घोषणा करते हुए सब कुछ समेट दिया: "मैं यह पूरी राम कथा हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को समर्पित करता हूँ."

