यूपी एमएलसी चुनाव से बीजेपी के लिए सबक; उसे अपने 50% से अधिक विधायकों के टिकट काटने पड़ सकते हैं

निस्तुला हेब्बार के अनुसार, स्नातक और शिक्षक दोनों निर्वाचन क्षेत्रों की 11 सीटों पर उत्तर प्रदेश विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव के परिणामों ने राज्य बीजेपी के लिए अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सोचने-समझने के लिए काफी सामग्री छोड़ दी है. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि पार्टी को आगे बढ़ते हुए अपने आधे से अधिक मौजूदा विधायकों का टिकट काटना पड़ सकता है.

यद्यपि बीजेपी ने चुनावी मैदान में मौजूद 11 में से छह सीटों पर कब्जा जमाया है और अपने प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी (सपा) से बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन इस बड़े परिदृश्य के भीतर बीजेपी के लिए चिंताएं छिपी हुई हैं.

बीजेपी के लिए पहला बड़ा सबक यह है कि एमएलसी चुनाव के नतीजे बताते हैं कि 2024 के लोकसभा परिणाम कोई तुक्का या इत्तेफाक नहीं थे—जब सपा ने 37 सीटें जीतकर बीजेपी के 2014 के 71 सीटों और 2019 के 62 सीटों के शानदार आंकड़ों को 2024 में घटाकर 33 सीटों पर ला दिया था. एमएलसी चुनाव में, सपा ने न केवल वाराणसी शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की अपनी सीटें बरकरार रखीं, बल्कि लखनऊ स्नातक और आगरा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र जैसी सीटों को बीजेपी से छीनकर अपने नाम कर लिया, जो पहले बीजेपी के पास थीं.

यहां तक कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गढ़ माने जाने वाले गोरखपुर-फैजाबाद सीट पर भी बीजेपी की जीत का अंतर महज 307 वोटों का था. ऐसा प्रतीत होता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव से चली आ रही कुछ शिकायतों का असर अब भी बना हुआ है, जिनका निवारण अभी तक नहीं किया गया है.

आगरा के बीजेपी के एक जिला पदाधिकारी ने कहा कि आगरा और लखनऊ में पार्टी का सीटें हारना चिंताजनक है. उन्होंने कहा, "कांग्रेस का अच्छा प्रदर्शन न करना कोई हैरानी की बात नहीं है—उस छात्र की तरह जो केवल परीक्षा की पूर्व संध्या पर पढ़ाई करता है. लेकिन बीजेपी वह पढ़ाकू छात्र है जो साल भर पढ़ाई करता है, इसलिए यह प्रदर्शन हमारी तैयारियों से मेल नहीं खाता."

2024 के चुनाव के बाद यूपी के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए बीजेपी के भीतर यह निष्कर्ष निकला था कि कई सांसद उम्मीदवारों को न बदलना पार्टी को भारी पड़ा था. इसलिए, चर्चा है कि पार्टी की अंतिम उम्मीदवार सूची में कई मौजूदा विधायकों के टिकट काटे जा सकते हैं, जिससे पार्टी को एक नया अवसर (साफ स्लेट) मिल सके.

यूपी में एमएलसी चुनाव से बीजेपी के लिए सबक का यह सिर्फ एक हिस्सा है. विधानसभा या लोकसभा चुनावों की तुलना में एमएलसी चुनाव स्वभाव से एक सीमित चुनावी प्रक्रिया होती है, लेकिन एमएलसी चुनाव लड़ने और मतदाता बनने दोनों के लिए आवश्यक शैक्षणिक योग्यताएं बीजेपी के प्रति शिक्षित/प्रबुद्ध वर्ग की असहजता की ओर इशारा करती हैं.

आगरा के विशेष मामले में, सपा ने उच्च जाति के वैश्य समुदाय से आकाश अग्रवाल को मैदान में उतारा, जिसे आमतौर पर बीजेपी के वोट बैंक की रीढ़ माना जाता है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने बाद में यह दावा भी किया कि उनके 'पीडीए' (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) के सूत्र में अक्षर 'ए' का विस्तार अग्रवाल/वैश्य समुदाय को शामिल करने के लिए भी किया जा सकता है. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के सामाजिक समानता नियमों को लेकर उच्च जातियों में गुस्सा अभी भी सुलग रहा है और इस पर ध्यान देने की जरूरत है.

जातिगत और पहचान की राजनीति से परे, इन नतीजों ने स्थानीय स्तर की नाराजगी और चिंताओं के महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं. सतह के नीचे क्या पक रहा है, इसके आकलनों के आधार पर पार्टी के लिए एक सुधारात्मक कदम उठाना जरूरी हो सकता है—और बीजेपी सुधार करने से कभी पीछे नहीं हटती.

Previous
Previous

‘वोट चोरी’ से आगे, मोदी सरकार का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को व्यापक रणनीति की जरूरत

Next
Next

गुजरात में गोहत्या के मामले में तीन को उम्रकैद, कोर्ट ने ‘मनुस्मृति’ का हवाला दिया और कहा- ‘चारों वेदों के प्रतीक हैं गाय के पैर’