‘वोट चोरी’ से आगे, मोदी सरकार का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को व्यापक रणनीति की जरूरत

त्योहारों के कारण मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरोध में चल रहे आंदोलन पर फिलहाल विराम लगा है. इस बीच, कांग्रेस 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस’ (इंडिया) गठबंधन की रैली के जरिए शक्ति प्रदर्शन की तैयारी कर रही है.

हालांकि, रैली से इतर, कांग्रेस और व्यापक विपक्ष को कथित ‘वोट चोरी’ अभियान पर अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने की आवश्यकता हो सकती है. संदीप फुकन के अनुसार, इस मुद्दे ने आम मतदाताओं के दैनिक जीवन को प्रभावित करने वाले विषयों—जैसे महंगाई, बेरोजगारी, युवाओं की परेशानी और कथित भ्रष्टाचार—को पीछे धकेल दिया है.

19 अगस्त को कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक आयोजित की गई थी. यह बैठक पेपर लीक के खिलाफ छात्रों के विरोध प्रदर्शन और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के बाद हुई थी. इसमें सीडब्ल्यूसी ने कई मुख्य मुद्दों की पहचान की थी. जैसे- युवाओं की “दुर्दशा”, अयोध्या के राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी, अरुणाचल प्रदेश में चीनी घुसपैठ की खबरें और ई20 पेट्रोल से मिलने वाले कम माइलेज, वाहनों की अनुकूलता से जुड़े जोखिम तथा उपभोक्ताओं के पास विकल्पों की कमी से जुड़ी चिंताएं.

हालांकि, जब से यह खबरें सामने आईं कि दो चुनाव आयुक्तों के मतदाता सूची के एसआईआर के क्रियान्वयन को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ मतभेद थे, तब से मुख्य विपक्षी दल और 'इंडिया' गठबंधन का पूरा ध्यान लगभग पूरी तरह से कथित 'वोट चोरी' और एसआईआर के जरिए चुनावी हेरफेर पर ही केंद्रित हो गया है.

12 अक्टूबर को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 'वोट चोरी' के खिलाफ विपक्ष के विरोध प्रदर्शन की तुलना भगवान शिव के तांडव से की थी. उन्होंने कहा था, “किसी योजना की जरूरत नहीं है. एक नृत्य चल रहा है, भगवान शिव का तांडव. और 'शिवजी की बारात' में कोई भी शामिल हो सकता है.”

हालांकि विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त और एसआईआर के खिलाफ सड़कों पर अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं, लेकिन साथ ही इस बात का अहसास भी है कि भारत निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ लड़ाई लंबी खींच सकती है.

विपक्ष को उन मुद्दों को भी उठाने की जरूरत है जो लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी के करीब हैं या तत्काल सरकार को रक्षात्मक स्थिति में लाने का माद्दा रखते हैं. उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव एसआईआर के साथ-साथ अयोध्या में चढ़ावा चोरी के मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करने के इच्छुक हैं.

13 अक्टूबर को राहुल गांधी के आधिकारिक आवास पर आयोजित 'चाय पे चर्चा' में विपक्षी नेताओं ने अन्य मुद्दों को उठाने पर चर्चा की, लेकिन गति (मोमेंटम) न टूटे, इसके लिए 'वोट चोरी' अभियान को ही अग्रिम मोर्चे पर बनाए रखने पर सहमति जताई.

हालांकि, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के हालिया सोशल मीडिया पोस्ट्स में एक सूक्ष्म बदलाव देखा जा सकता है, जहां त्योहारों के मौसम में महंगाई को 'वोट चोरी' से जोड़ा जा रहा है. खड़गे ने बुधवार (28 अक्टूबर 2026) को 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा, “वोट का अधिकार छीनने के लिए आमादा मोदी सरकार अब जीने का हक भी खत्म कर देना चाहती है. त्योहारों के बीच, कमरतोड़ महंगाई कमाई के हर एक पैसे को निगल रही है.”

गुरुवार (29 अक्टूबर 2026) को, चार राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों पर मतपत्रों (बैलेट पेपर) से हुए चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तंज का जवाब देते हुए कांग्रेस के संचार महासचिव जयराम रमेश ने उनसे अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी और आरएसएस के गढ़ नागपुर में बीजेपी की हार पर विचार करने को कहा.  उन्होंने मोदी से महंगाई, बेरोजगारी और ठप पड़े निजी निवेश पर ध्यान देने का आग्रह किया. रमेश ने 'एक्स' पर लिखा, “अहंकार छोड़िए और इन मुद्दों पर आत्मचिंतन कीजिए!”

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